📖 - उत्पत्ति ग्रन्थ

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अध्याय - 30

1) जब राहेल ने देखा कि उससे याकूब को कोई पुत्र नहीं हुआ है, तब वह अपनी बहन से जलने लगी और उसने याकूब से कहा, ''मुझे बाल-बच्चे दो, नहीं तो मैं मर जाऊँगी''

2) याकूब को राहेल पर क्रोध आ गया। वह कहने लगा, ''मैं क्या ईश्वर बन सकता हूँ। उसी ने तो तुम्हें सन्तान से वंचित किया।''

3) वह बोली, ''यह मेरी दासी बिल्हा है। तुम इसे रख लो, जिससे उसके माध्यम से मेरी गोद में बच्चे खेल सकें।''

4) इसलिए उसने अपनी दासी बिल्हा को उपपत्नी के रूप में उसे दिया। याकूब का उस से संसर्ग हुआ।

5) बिल्हा गर्भवती हुई और याकूब से उसे एक पुत्र हुआ।

6) राहेल ने कहा, ''ईश्वर ने मेरे साथ न्याय किया है, उसी ने मेरी प्रार्थना स्वीकार कर मुझे एक पुत्र दिया है।'' इसलिए उसने उसका नाम दान रखा।

7) राहेल की दासी बिल्हा फिर गर्भवती हुई और याकूब से उसे एक दूसरा पुत्र हुआ।

8) तब राहेल ने कहा, ''बड़े संघर्ष के बाद मैं अपनी बहन को पराजित कर सकी हूँ''। इसलिए उसने उसका नाम नफ्ताली रखा।

9) लेआ ने जब देखा कि उसके सन्तान होना बन्द हो गया है, तब उसने अपनी दासी जिलपा को उपपत्नी के रूप में याकूब को दिया।

10) लेआ की दासी जिलपा से याकूब को एक पुत्र हुआ।

11) तब लेआ बोली, ''मेरा कितना सौभाग्य है।'' इसलिए उसने उसका नाम गाद रखा।

12) इसके बाद लेआ की दासी जिलपा से याकूब को एक और पुत्र हुआ।

13) अब लेआ ने कहा, ''मैं कितनी धन्य हूँ! स्त्रियाँ मुझे धन्य कहेंगी।'' इसलिए उसने उसका नाम आशेर रखा।

14) गेहूँ की कटनी के समय रूबेन खेत गया। वहाँ उसे लक्ष्मणा फल मिले, जिन्हे ला कर उसने अपनी माँ लेआ को दिया। तब राहेल ने लेआ से कहा, ''कृपया मुझे अपने पुत्र के लाये हुए लक्ष्मणा फलों में से थोड़ा दे दो''।

15) परन्तु उसने उत्तर दिया, ''क्या इस से तुम्हारा जी नहीं भरा कि तुमने मुझ से मेरा पति छीन लिया है? और अब तुम मेरे पुत्र के लक्ष्मणा फल भी छीन लेना चाहती हो?'' राहेल ने कहा, ''तुम्हारे पुत्र के लाये लक्ष्मणा फलों के बदले में वह आज रात को तुम्हारे साथ सो सकते हैं''।

16) जब शाम को याकूब खेत से वापस घर आया, तब लेआ उस से मिलने को निकली और कहने लगी, ''तुम्हें मेरे साथ सोना पड़ेगा, क्योंकि अपने पुत्र के लक्ष्मणा फलों के बदले मैंने तुम्हें किराये पर ले लिया है''। इसलिए वह रात उसने उसके साथ बितायी।

17) ईश्वर ने लेआ की सुन ली। वह गर्भवती हुई और उसने याकूब के लिए पाँचवें पुत्र को जन्म दिया।

18) लेआ बोली, ''मैंने अपनी पति को अपनी दासी दे दी थी, इसलिए ईश्वर ने मुझे यह पुरस्कार दिया है''। इसलिए उसने उसका नाम इस्साकार रखा।

19) लेआ फिर गर्भवती हुई और उस से याकूब का छठा पुत्र उत्पन्न हुआ।

20) तब लेआ बोली, ''ईश्वर ने मुझे अच्छा वरदान दिया है। अब मेरे पति मेरे साथ रहेंगे, क्योंकि मैं उनके लिए छह पुत्रों को जन्म दे चुकी हूँ।'' इसलिए उसने उसका नाम ज़बुलोन रखा।

21) बाद में उसने एक पुत्री को भी जन्म दिया और उसका नाम दीना रखा।

22) तब ईश्वर को राहेल को ध्यान आया। ईश्वर ने उसकी विनती स्वीकार की और उस को सन्तान उत्पन्न करने की शक्ति दी।

23) वह गर्भवती हुई और उसने एक पुत्र को जन्म दिया। वह बोली, ''ईश्वर ने मेरा कलंक दूर कर दिया है''

24) और यह कहते हुए कि ''प्रभु मुझे एक और पुत्र दे'', उसने उसका नाम यूसुफ़ रखा।

25) जब राहेल यूसूफ़ को जन्म दे चुकी, तब याकूब ने लाबान से कहा, ''मुझे विदा कीजिए, जिससे मैं अपने घर, अपनी जन्मभूमि लौट जाऊँ।

26) मुझे मेरी पत्नियाँ और सन्तानें भी दीजिए, जिनके लिए मैंने आपकी सेवा की है। मुझे जाने की आज्ञा दीजिए, क्योंकि मैंने आपकी जो सेवा की है, वह तो आप को अच्छी तरह मालूम है''

27) लाबान ने उसे उत्तर दिया, ''यदि तुम्हें पसन्द है, तो मेरे यहाँ रहो। प्रभु ने तुम्हारे कारण ही मुझे भी आशीर्वाद दिया है। मैंने ऐसा अनुभव किया है''।

28) आगे उसने कहा, ''तुम अपनी जो मज़दूरी बतलाओ, मैं तुम्हें दे दूँगा''।

29) याकूब ने उस को उत्तर दिया, ''मैंने आपकी जो सेवा की है और आपका पशुधन मेरे रहते किस प्रकार बढ़ गया, वह आप स्वयं जानते हैं।

30) मेरे आने से पहले आपके पास जो थोड़ा-सा था, वह बढ़ कर आज कितना अधिक हो गया है! और जहाँ भी मैं जाता रहा, वहाँ प्रभु ने आप को आशीर्वाद दिया है। लेकिन अब मैं अपनी घर-गृहस्थी के लिए कब काम करूँगा?''

31) उसने उत्तर दिया, ''मुझे तुम को क्या देना चाहिए?'' याकूब ने कहा, ''आप को मुझे कुछ नहीं देना चाहिए। आगे भी मैं आपकी भेड़-बकरियों को चराऊँगा और उनकी देखरेख करूँगा।

32) आप मेरे लिए बस इतना कीजिए कि आज मैं आपकी भेड़बकरियों के बीच जाऊँ और उन में से चित्तीदार और चितकबरी-सभी भेड़ों को, मेमनों में से सभी काले मेमने और बकरियों में से चित्तीदार और चितकबरी बकरियाँ छाँट लूँ। ये मेरी मज़दूरी हों।

33) जब आप मेरी मज़दूरी में प्राप्त उन पशुओं को देखने आयेंगे, तब आप को मेरी ईमानदारी का परिचय मिल जायेगा। यदि उन में चित्तीदार या चितकबरी बकरियाँ या काले रंग के मेमनों के अलावा और कुछ मिलेगा, तो वह चुराया हुआ समझा जायेगा''।

34) लाबान ने कहा, ''ठीक है। तुमने जैसा कहा है, वैसा ही करो।

35) तब उसी दिन लाबान ने धारीदार और चितकबरे बकरों और सब चित्तीदार और चितकबरी बकरियों को, अर्थात् जिन पर कुछ सफेद चिन्ह थे, और प्रत्येक काले मेमने को अलग कर उन्हें अपने पुत्रों के सुपुर्द कर दिया।

36) उसने अपने और याकूब के बीच तीन दिन के मार्ग की दूरी निश्चित की। याकूब लाबान की शेष भेड़-बकरियों को चराने लगा।

37) याकूब ने चिनार, बदाम और अमोन के वृक्षों की हरी डालियाँ ली और उनकी छाल से छल्ले काट कर भीतर की सफेदी उघाड़ी, जिससे उन पर सफेद धारियाँ दिख पड़ीं।

38) उसने इस प्रकार छिली हुई लकडियाँ पानी की नाँदों और नालियों में पशुओं के सामने वहाँ रख दीं, जहाँ वे पानी पीने आते थे।

39) जब मादा पशु वहाँ पानी पीने आते थे, तो वहाँ गाभिन हो जाते और फिर धारीदार, चित्तीदार, चितकबरे बच्चे पैदा करते थे।

40) याकूब ने मेमनों को अलग कर दिया और दूसरे पशुओं को लाबान के धारीदार और काले पशुओं के पीछे-पीछे हाँका। इस प्रकार उसने अपना निजी झुण्ड तैयार किया और उसे लाबान के झुण्ड से नहीं मिलने दिया।

41) जब-जब हष्ट-पुष्ट भेड़-बकरियाँ गाभिन होने को होतीं, याकूब उन डालियों को नाँदों में रख देता था, जिससे वे डालियों को देख कर गाभिन हो जायें।

42) लेकिन वह झुण्ड की कमजोर भेड़-बकरयों के सामने उन्हें नहीं रखता। इस तरह लाबान को कमजोर और याकूब को हष्ट-पुष्ट पशु मिल जाते थे।

43) इस से वह बहुत अधिक धनी हो गया। उसके पास बहुत-सी भेड़-बकरियाँ, दास-दासियाँ, ऊँट और गधे हो गये।



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