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📖 - निर्गमन ग्रन्थ

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अध्याय - 05

1) इसके बाद मूसा और हारून ने फिराउन के पास जा कर कहा, ''इस्राएलियों का ईश्वर प्रभु यह कहता है : मेरे लोगों को जाने दो, जिससे वे निर्जन प्रदेश जा कर मेरा एक पर्व मना सकें।''

2) फिराउन ने उत्तर दिया, ''वह कौन-सा प्रभु है, जिसकी मैं आज्ञा मानूँ और इस्राएलियों को जाने दें, मैं न तो उस प्रभु को जानता हूँ और न मैं इस्राएलियों को जाने दूँगा।

3) फिर उन्होंने कहा, ''इब्रानियों के ईश्वर ने हमें दर्शन दिये हैं; इसलिए हमें निर्जन प्रदेश जाने दे, जहाँ की यात्रा तीन दिन की है, जिससे हम अपने ईश्वर प्रभु को वहाँ बलि चढ़ा सकें; नहीं तो वह हम पर महामारी भेज देगा या हमें तलवार के घाट उतरवा देगा।''

4) परन्तु मिस्र के राजा ने उन्हें उत्तर दिया, ''मूसा और हारून! तुम लोगों को उनके कामों से क्यों हटा रहे हो? जाओ, अपना बेगार का काम करो।''

5) इसके बाद फिराउन ने कहा, ''देखो, अब देश में लोगों की संख्या बढ़ गयी है और तुम उन्हें उनके बेगार के काम से छुड़ाना चाहते हो!''

6) उसी दिन फिराउन ने लोगों से बेगार करवाने वालों और मेटों को यह आदेश दिया,

7) ''तुम अब तक जिस प्रकार लोगों को बनाने के लिए घास-फूस दिया करते थे, वह आगे मत देना। वे खुद जायें और खुद घास-फूस इकट्ठा करें।

8) फिर भी उतनी ही ईटें उन से बनवाना, जितनी वे अब तक बनाते आये हैं। उनकी संख्या बिलकुल कम मत करना। वे आलसी हैं और इसलिए चिल्ला कर कहते हैं कि हमें अपने ईश्वर को बलि चढ़ाने के लिए जाने दीजिए।

9) उन लोगों का बेगार और भी कठिन बना देना, जिससे वे उस में ही इतने उलझे रहें कि झूठी बातों पर ध्यान न दे सकें।''

10) तब लोगों पर नियुक्त अधिकारियों और मेटों ने उनके पास जा कर यह कहा, ''फिराउन का कहना है कि मैं तुम्हें घास-फूस नहीं दूँगा।

11) तुम खुद जा कर, जहाँ कहीं मिले, घास-फूस लाओ, किन्तु तुम लोगों को पहले जितना सामान तैयार करना है।

12) इसलिए वे मिस्र भर में इधर-उधर दूर-दूर तक भूसा बनाने के लिए डण्ठल बटोरने लगे।

13) अधिकारी यह कहते हुए उन्हें बाध्य करते थें, ''ठीक उसी प्रकार प्रतिदिन अपना निर्धारित काम पूरा करो, जिस प्रकार तब करते थें, जब तुम को भूसा दिया जाता था।''

14) फिराउन द्वारा नियुक्त बेगार करवाने वाले इस्राएली मेटों को पीटते थे और उन से पूछते थे, ''तुमने पहले की तरह क्यों कल या आज ईटों की नियुक्ति की हुई संख्या का काम पूरा नहीं करवाया?''

15) तब इस्राएली मेट फिराउन के पास जा कर यह शिकायत करने लगे कि ''आप अपने दासों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं

16) आपके दासों को घास-फूस तक नहीं दिया जाता है, तब भी वे हम से ईटें बनाने को कहते हैं। आपके दासों को पीटा जाता है, परन्तु दोश आपके अपने लोगों का होता है।''

17) उसने उत्तर दिया, ''तुम लोग आलसी हो; हाँ तुम आलसी हो। इसलिए तुम कहते हो कि हमें प्रभु को बलि चढ़ाने के लिए जाने दीजिए।

18) जाओ, अपना काम करो। तुम्हें भूसा नहीं दिया जायेगा, लेकिन तुम्हें ईटों की निर्धारित संख्या देनी पड़ेगी।''

19) जब इस्राएली मेटों से कहा गया कि तुम प्रतिदिन की ईटों की निर्धारित संख्या कम नहीं करोंगे, तो वे समझ गये कि अब उनकी हालत बहुत बुरी हो गयी है।

20) वे फिराउन के यहाँ से बाहर निकले और मूसा तथा हारून से मिले, जो उनकी प्रतिक्षा कर रहे थे।

21) उन लोगों ने कहा, ''आपने फिराउन और उनके सेवकों की दृष्टि में हमें घृणा का पात्र बना दिया है और आपने हमें मार डालने के लिये उनके हाथों में एक तलवार दे दी हैं। प्रभु आप को दर्शन दे कर आपका न्याय करें।''

22) इस पर मूसा यह कहते हुए प्रभु से दुहाई करने लगा, ''प्रभु तूने इस प्रजा को इतना क्लेश क्यों दिया हैं? तूने मुझे क्यों भेजा है,

23) जिस समय से मैं तेरी आज्ञा से फिराउन के पास बात करने गया, तब से उसने इस प्रजा को और अधिक कष्ट दिया है; लेकिन तूने अपनी प्रजा का उद्धार करने के लिए कुछ भी नहीं किया।''



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