📖 - समूएल का दुसरा ग्रन्थ

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अध्याय 05

1) इस्राएल के सभी वंशों ने हेब्रोन में दाऊद के पास आकर कहा, "देखिए, हम आपके रक्त-सम्बन्धी हैं।

2) जब साऊल हम पर राज्य करते थे, तब पहले भी आप ही इस्राएलियों को युद्ध के लिए ले जाते और वापस लाते थे। प्रभु ने आप से कहा है, ‘तुम ही मेरी प्रजा इस्राएल के चरवाहा, इस्राएल के शासक बन जाओगे।"

3) इस्राएल के सभी नेता हेब्रोन में राजा के पास आये और दाऊद ने हेब्रोन में प्रभु के सामने उनके साथ समझौता कर लिया। उन्होंने दाऊद का इस्राएल के राजा के रूप में अभिशेक किया।

4) जब दाऊद राजा बना, तो उसकी उम्र तीस वर्ष की थी और वह चालीस वर्ष तक राज्य करता रहा।

5) उसने हेब्रोन में साढ़े सात वर्ष तक यूदा पर राज्य किया और येरुसालेम में तैंतीस वर्ष तक समस्त इस्राएल और यूदा पर राज्य किया।

6) राजा ने अपने सैनिकों के साथ येरुसालेम जा कर यूबसियों पर, जो वहाँ के निवासी थे, आक्रमण किया। उन्होंने दाऊद से कहा, "तुम यहाँ प्रवेश नहीं करोगे। अन्धे और लँगड़े तुम को भगा देंगे।" कहने का अभिप्राय यह था कि दाऊद यहाँ कभी प्रवेश नहीं कर सकेग।

7) किन्तु दाऊद ने सियोन के क़िले पर अधिकार कर लिया और उसका नाम दाऊदनगर रखा।

8) उस दिन दाऊद ने कहा, "जो यबूसियों को पराजित करना चाहता है, उसे पानी की सुरंग से प्रवेश करना होगा। दाऊद उन लँगड़ों और अन्धों से घृणा करता है।" इसीलिए लोग कहते हैं - अन्धे और लँगड़े मन्दिर में नहीं आ सकते।

9) दाऊद उस गढ़ में रहने लगा और उसने उसका नाम दाऊदनगर रखा। दाऊद ने मिल्लों से ले कर गढ़ के चारों ओर नगर बनवाया।

10) दाऊद की शक्ति निरन्तर बढ़ती गयी, क्योंकि प्रभु, विश्वमण्डल का ईश्वर उसका साथ देता रहा।

11) तीरूस के राजा हीराम ने देवदार की लकड़ी, बढ़इयों और शिल्पकारों के साथ दाऊद के पास दूत भेजे और उन्होंने दाऊद के लिए महल बनाया।

12) अब दाऊद जान गया कि प्रभु ने उसे इस्राएल का राजा बना दिया है और अपनी प्रजा इस्राएल के कारण उसका राज्य महान् बना दिया।

13) हेब्रोन से आने के बाद दाऊद ने येरुसालेम में अन्य उपपत्नियाँ-पत्नियाँ रख लीं और उसके और पुत्र-पुत्रियाँ उत्पन्न हुए।

14) येरुसालेम में उत्पन्न उसके पुत्रों के नाम ये हैं: शम्मूआ, शोबाब, नातान, सुलेमान,

15) यिभार, एलीशूआ, नेफ़ेग, याफ़ीआ,

16) एलीशामा, एलयादा और एलीफ़ेलेट।

17) जब फ़िलिस्तियों ने सुना कि दाऊद का इस्राएलियों के राजा के रूप में अभिशेक हुआ है, तो वे सभी दाऊद की खोज में निकले। यह सुनकर दाऊद ने किले में आश्रय लिया।

18) फ़िलिस्ती आये और रफ़ाईम के मैदान में फैल गये।

19) तब दाऊद ने प्रभु से पूछा, "क्या मैं फ़िलिस्तियों पर आक्रमण करूँ? क्या तू उन्हें मेरे हाथ दे देगा?" प्रभु ने दाऊद को उत्तर दिया, "हाँ, आक्रमण करो। मैं फ़िलिस्तियों को अवश्य तुम्हारे हाथ दे दूँगा।"

20) दाऊद ने उन्हें बाल-परासीम जा कर पराजित किया। उस समय उसने कहा, "प्रभु ने मेरे सामने मेरे शत्रुओं की पंक्ति इस प्रकार तोड़ डाली है, जैसे पानी बाँध को तोड़ डालता है।" इसलिए उस स्थान का नाम बाल-परासीम पड़ गया।

21) फ़िलिस्तियों ने वहाँ अपनी देवमूर्तियाँ छोड़ दी; दाऊद और उसके आदमी उन्हें वहाँ से ले गये।

22) फ़िलिस्ती फिर आये और रफ़ाईम के मैदान में फैल गये।

23) दाऊद को प्रभु से पूछने पर उत्तर मिला, "उन पर सीधे आक्रमण मत करो, बल्कि चक्कर काट कर उनके पीछे पहुँचो और मोखा वृक्षों की ओर से चढ़ाई करो।

24) जैसे तुम मोखा वृक्षों के शिखरों में चलने की आवाज़ सुनोगे, तो आक्रमण करोगे; क्योंकि तब फ़िलिस्तियों की सेना को पराजित करने के लिए प्रभु तुम्हारे आगे-आगे जा रहा होगा।"

25) दाऊद ने प्रभु की आज्ञा का पालन किया और फ़िलिस्तियों को गेबा से ले कर गेजे़र तक मार भगाया।



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