📖 - पहला इतिहास ग्रन्थ

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अध्याय 17

1) जब दाऊद अपने महल में रहने लगा, तो उसने नबी नातान से कहा, "देखिए, मैं तो देवदार के महल में रहता हूँ, किन्तु प्रभु के विधान की मंजूषा तम्बू में रखी रहती है"।

2) नातान ने दाऊद को यह उत्तर दिया, "आप जो करना चाहते हैं, कीजिए। प्रभु आपका साथ देगा।"

3) उसी रात प्रभु की वाणी नातान को यह कहते हुए सुनाई पड़ीः

4) "मेरे सेवक दाऊद के पास जा कर कहो-प्रभु यह कहता हैः तुम मेरे लिए मन्दिर नहीं बनवाओगे।

5) जिस दिन मैं इस्राएल को निकाल लाया, उस दिन से आज तक मैंने किसी भवन में निवास नहीं किया। मैं एक तम्बू से दूसरे तम्बू, एक निवास से दूसरे निवास जाता रहा।

6) जब तक मैं समस्त इस्राएल के साथ भ्रमण करता रहा, क्या मैंने इस्राएल के किसी न्यायकर्ता से, जिसे मैंने अपनी प्रजा को चराने के लिए नियुक्त किया, कभी यह कहा कि तुमने मेरे लिए देवदार का मन्दिर क्यों नहीं बनाया?

7) "इसलिए मेरे सेवक दाऊद से यह कहो-विश्वमण्डल का प्रभु कहता हैः तुम भेड़ें चराया करते थे और मैंने तुम्हें चरागाह से बुला कर अपनी प्रजा इस्राएल का शासक बनाया।

8) मैंने तुम्हारे सब कार्यों में तुम्हारा साथ दिया और तुम्हारे सामने तुम्हारे सब शत्रुओं का सर्वनाश कर दिया। मैं तुम्हें संसार के महान् पुरुषों-जैसी ख्याति प्रदान करूँगा।

9) मैं अपनी प्रजा इस्राएल के लिए भूमि का प्रबन्ध करूँगा और उसे बसाऊँगा। वह वहाँ सुरक्षित रहेगी। कुकर्मी उस पर अत्याचार नहीं कर पायेंगे। ऐसा पहले हुआ करता था,

10) जब मैंने अपनी प्रजा इस्राएल का शासन करने के लिए न्यायकर्ताओं को नियुक्त किया था। मैं तुम्हारे सब शत्रुओं को तुम्हारे अधीन कर दूँगा। मैंने तुम पर प्रकट किया कि प्रभु तुम्हारे लिए एक घर बनवायेगा।

11) जब तुम्हारे दिन पूरे हो जायेंगे और तुम अपने पूर्वजों से जा मिलोगे, तो मैं तुम्हारे पुत्रों में एक को तुम्हारा उत्तराधिकारी बनाऊँगा और उसका राज्य बनाये रखूँगा।

12) वही मेरे लिए मन्दिर बनवायेगा और मैं उसका सिंहासन सदा के लिए सुदृढ़ बना दूँगा।

13) मैं उसका पिता होऊँगा और वह मेरा पुत्र होगा। मैं उस पर से अपनी कृपा नहीं हटाऊँगा, जैसा कि मैंने तुम्हारे पूर्वाधिकारी के साथ किया।

14) मैं उसे अपने घर और अपने राज्य में सदा के लिए बनाये रखूँगा। उसका सिंहासन अनन्त काल तक सुदृढ़ रहेगा।"

15) नातान ने दाऊद को ये सब बातें और यह सारा दृष्य बताया।

16) इसके बाद राजा दाऊद ने प्रभु के सामने बैठ कर कहाः "प्रभु-ईश्वर! मैं क्या हूँ और मेरा वंश क्या है, जो तू मुझे यहाँ तक लाया है?

17) ईश्वर! यह तेरी दृष्टि में पर्याप्त नहीं हुआ। तू अपने सेवक के वंश के सुदूर भविष्य की प्रतिज्ञा करता है प्रभु-ईश्वर! तूने मुझे महान् मनुष्य माना है।

18) अपने दास को इस प्रकार सम्मानित करने के बाद, दाऊद तुझ से और क्या कहे? तू अपने दास को जानता ही है।

19) प्रभु! अपने इस दास के़ लिए और अपनी इच्छा के अनुसार तूने यह महान् कार्य सम्पन्न किया और अपनी महिमा प्रकट की है।

20) प्रभु! तेरे समान कोई नहीं और तेरे सिवा कोई नहीं, जैसा कि हमने अपने कानों से सुना है।

21) क्या तेरी प्रजा इस्राएल के समान कोई राष्ट्र है? ईश्वर उसे छुडा़ने गया, जिससे वह उसे अपनी प्रजा बनाये। तूने अपना नाम गौरवान्वित करने के लिए अपनी प्रजा को मिस्र से छुड़ाया और उसके सामने राष्ट्रों को भगा दिया।

22) तूने अपनी प्रजा इस्राएल को चुन लिया, जिससे वह सदा के लिए तेरी प्रजा हो और तू, प्रभु! उसका अपना ईश्वर।

23) प्रभु! तूने अपने सेवक और उसके वंश के विषय में जो वचन दिया है, अब उसे सदा के लिए बनाये रख और अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर।

24) तब तेरा नाम सदा के लिए महान् होगा और लोग यह कहेंगेः विश्वमण्डल का प्रभु-ईश्वर इस्राएल का ईश्वर है; वह इस्राएल का ईश्वर है’ और तेरे सेवक दाऊद का वंश तेरे सामने सुदृढ़ रहेगा।

25) मेरे ईश्वर! तूने अपने दास पर प्रकट किया कि तू मेरा वंश बनाये रखेगा; इसलिए तेरे सेवक को तुझ से यह प्रार्थना करने का साहस हुआ।

26) प्रभु! तू ही ईश्वर है। तूने अपने सेवक से कल्याण की यह प्रतिज्ञा की है।

27) प्रभु! अब अपने सेवक के वंश को आशीर्वाद प्रदान कर, जिससे वह सदा तेरे सामने बना रहे; क्योंकि तेरे आशीर्वाद के फलस्वरूप वह वंश सदा ही फलता-फूलता रहेगा।"



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