📖 - स्तोत्र ग्रन्थ

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अध्याय 119

1) धन्य हैं वे, जो निर्दोष जीवन बिताते हैं, जो प्रभु की संहिता के मार्ग पर चलते हैं!

2) धन्य हैं वे, जो उसके आदेशों का पालन करते और उन्हें हृदय से चाहते हैं,

3) जो अधर्म नहीं करते और उसके बताये हुए मार्ग पर चलते हैं!

4) तूने इसलिए अपना विधान घोषित किया कि हम उसका पूरा-पूरा पालन करें।

5) ओह! मैं तेरे आदेश पूरे करने में सदा दृढ़ बना रहूँ।

6) यदि मैं तेरी आज्ञाओं का ध्यान करता रहूँगा, तो मुझे कभी हताश नहीं होना पड़ेगा।

7) मैं तेरे न्यायसंगत निर्णयों का अध्ययन करते हुए निष्कपट हृदय से तेरा स्तुतिगान करता रहूँगा।

8) मैं तेरे आदेशों का पालन करता हूँ, तू कभी मेरा परित्याग न कर।


9) तेरी शिक्षा का पालन करने से ही नवयुवक निर्दोष आचरण कर सकता है।

10) मैं सारे हृदय से तुझे खोजता रहा, मुझे अपनी आज्ञाओं के मार्ग से भटनके न दे।

11) मैंने तेरी शिक्षा अपने हृदय में सुरिक्षत रखी, जिससे मैं तेरे विरुद्ध पाप न करूँ।

12) प्रभु! तू धन्य है। मुझे अपनी संहिता की शिक्षा दे।

13) मेरा कण्ठ तेरे सब नियमों का बखान करता रहा।

14) धन-सम्पत्ति की अपेक्षा मुझे तेरे आदेशों के पालन से अधिक आनन्द मिला।

15) मैं तेरी विधियों का मनन करूँगा, मैं तेरे मार्गों का ध्यान रखूँगा।

16) तेरी संहिता मुझे अपार आनन्द प्रदान करती है, मैं तेरी शिक्षा कभी नहीं भुलाऊँगा।


17) अपने सेवक को आशिष प्रदान कर, जिससे मैं जीवित रहूँ और तेरी शिक्षा का पालन करूँ।

18) मेरी आँखों को ज्योति प्रदान कर, जिससे मैं तेरी संहिता की महिमा देख सकूँ।

19) मैं पृथ्वी पर परदेशी हूँ, अपनी आज्ञाओं को मुझ से न छिपा।

20) मेरी आत्मा सदा-सर्वदा तेरे नियमों के लिए तरसती है।

21) तू उन घमण्डी शापितों को धमकाता है, जो तेरी आज्ञाओं से दूर भटक जाते हैं।

22) मुझे अपमानित और तिरस्कृत न होने दें, क्योंकि मैंने तेरे आदेशों का पालन किया।

23) चाहे शासक मिल कर मेरी निन्दा करें, किन्तु मैं, तेरा सेवक तेरी संहिता का मनन करता हूँ।

24) तेरे आदेश मुझे अपार आनन्द प्रदान करते हैं, तेरा विधान मेरा परामर्शदाता है।


25) मेरी आत्मा धूल में पड़ी हुई है, अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मुझे नवजीवन प्रदान कर।

26) मैंने अपना आचरण तेरे सामने खोल कर रख दिया और तूने मुझे उत्तर दिया। अब मुझे अपनी संहिता की शिक्षा प्रदान कर।

27) मुझे अपनी आज्ञाओं का मार्ग समझा और मैं तेरे अपूर्व कार्यों का मनन करूँगा।

28) मेरी आत्मा दुःख के आँसू बहाती है; अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मुझे सान्त्वना दे।

29) कपट के मार्ग से मुझे दूर रख और अपनी संहिता पर चलने की कृपा प्रदान कर।

30) मैंने सत्य का मार्ग चुना और तेरे निर्णयों को हृदयंगम किया है।

31) मैं तेरे आदेशों का पालन करता हूँ। प्रभु! मुझे निराश न होने दे।

32) मैं तेरी आज्ञाओं के मार्ग पर चलता हूँ, क्योंकि तू मुझ में नवजीवन का संचार करता है।


33) प्रभु! मुझे अपने विधान के मार्ग की शिक्षा प्रदान कर, मैं जीवन भर उस पर चलता रहूँगा।

34) मुझे ऐसी शिक्षा दे, जिससे मैं सारे हृदय से तेरी संहिता का पालन करता रहूँ।

35) मुझे अपनी आज्ञाओं के मार्ग पर ले चल; क्योंकि वे मुझे आनन्द प्रदान करती हैं।

36) मेरे हृदय में धन-सम्पत्ति का नहीं, बल्कि अपने आदेशों का अनुराग रोपने की कृपा कर।

37) संसार की माया से मेरी दृष्टि हटा, मुझे अपने मार्ग द्वारा नवजीवन प्रदान कर।

38) अपने सेवक के लिए अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर और लोग तुझ पर श्रद्धा रखेंगे।

39) मुझ से अपमान दूर कर, मैं उस से डरता हूँ; क्योंकि तेरे निर्णय कल्याणकारी हैं।

40) मुझे तेरी आज्ञाएँ हृदय से प्रिय हैं; तू अपने न्याय के अनुरूप मुझे नवजीवन प्रदान कर।


41) प्रभु! तेरा प्रेम मुझे मिलता रहे अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मेरा उद्धार कर।

42) तब मैं अपने निन्दकों को निरुत्तर कर दूँगा। मैं तेरी प्रतिज्ञा पर निर्भर रहता हूँ।

43) मेरे मुख को सत्य-वचन से वंचित न कर, क्योंकि मुझे तेरे नियमों का भरोसा है।

44) मैं निरन्तर और सदा-सर्वदा तेरी संहिता का पालन करूँगा।

45) मैं सहज रूप से आगे बढ़ता रहूँगा, क्योंकि मैं तेरी विधियों का मनन करता हूँ।

46) मैं राजाओं के सामने तेरे आदेशों का बखान करूँगा। मुझे किसी प्रकार का संकोच नहीं होगा।

47) तेरी आज्ञाएँ मुझे अपार आनन्द प्रदान करती हैं। मैं उन्हें सारे हृदय से चाहता हूँ।

48) मैं तेरी आज्ञाओं को करबद्ध प्रणाम करता हूँ। मैं तेरी संहिता का मनन करूँगा।


49) अपने सेवक से की हुई प्रतिज्ञा को स्मरण कर। इसके द्वारा तूने मुझे आशा प्रदान की।

50) यह विपत्ति में मेरी सान्त्वना है, क्योंकि तेरी शिक्षा मुझे नवजीवन प्रदान करती है।

51) घमण्डियों ने मुझ पर व्यंग्य किया, किन्तु मैं तेरी संहिता से विमुख नहीं हुआ।

52) प्रभु! मैं तेरे प्राचीन नियमों का स्मरण करता हूँ, इन से मुझे सान्त्वना मिलती है।

53) विधर्मी तेरी संहिता की उपेक्षा करते हैं, यह देख कर मुझे क्शोभ होता है।

54) पृथ्वी पर मेरे अस्थायी निवास में तेरी संहिता मेरे भजनों का विषय बन गयी है।

55) प्रभु! मैं रात को तेरा नाम स्मरण करता हूँ, जिससे मैं तेरी संहिता के अनुसार जीवन बिताऊँ।

56) यही मेरे लिए उचित है कि मैं तेरे नियमों का पालन करूँ।


57) प्रभु! मैंने कहा: मेरा भाग्य यह है कि मैं तेरी शिक्षा का पालन करूँ।

58) मैं सारे हृदय से तुझ से प्रार्थना करता हूँ। अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मुझ पर कृपा दृष्टि कर।

59) मैंने अपने आचरण का विचार किया। मैंने तेरे नियमों के अनुसार चलने का संकल्प किया।

60) मैंने विलम्ब नहीं किया। मैं तेरी आज्ञाओं का पालन करने के लिए तत्पर रहा।

61) विधर्मियों ने मुझे अपने जाल में फँसा लिया, किन्तु मैंने संहिता को नहीं भुलाया।

62) तेरे न्यायसंगत निर्णयों के कारण मैं आधी रात को उठ कर तेरी स्तुति करता हूँ।

63) मैं तेरे श्रद्धालु भक्तों का सत्संग करता हूँ, जो तेरी आज्ञाओं का पालन करते हैं।

64) प्रभु! पृथ्वी तेरी सत्यप्रतिज्ञता से परिपूर्ण है। मुझे अपनी संहिता की शिक्षा प्रदान कर।


65) प्रभु! तूने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार अपने सेवक का उपकार किया है।

66) मुझे विवेक और ज्ञान प्रदान कर; क्योंकि मुझे तेरी आज्ञाओं पर विश्वास है।

67) मैं अपमानित होने से पहले भटक गया था। अब मैं तेरे आदेशों का पालन करता हूँ।

68) तू भला है, हितकारी है। मुझे अपनी संहिता की शिक्षा प्रदान कर।

69) घमण्डियों ने मुझ पर झूठे आरोप लगाये; किन्तु मैं सारे हृदय से तेरे विधान का पालन करता हूँ।

70) उनकी बुद्धि जड़ और कुण्ठित है। तेरी संहिता मुझे अपार आनन्द प्रदान करती है।

71) अच्छा हुआ कि मुझे अपमानित किया गया, मैंने तेरी आज्ञाओं का पालन करना सीखा।

72) सोने-चाँदी की सहस्रों मुहरों की अपेक्षा मुझे तेरी संहिता कहीं अधिक वांछनीय है।


73) तेरे हाथों ने मुझे बनाया और गढ़ा; मुझे सद्बुद्धि प्रदान कर और मैं तेरी आज्ञाओं का अध्ययन करूँगा।

74) तेरे भक्त मुझे देख कर आनन्दित हैं; क्योंकि मुझे तेरी प्रतिज्ञा का भरोसा है।

75) प्रभु! मैं मानता हूँ कि तेरे निर्णय न्यायसंगत हैं। यह उचित ही हुआ कि मुझे अपमानित किया गया।

76) तेरा प्रेम मुझे सान्त्वना प्रदान करता रहे, जैसा कि तूने अपने सेवक से प्रतिज्ञा की है।

77) तेरी असीम अनुकम्पा मुझे मिलती रहे, जिससे मैं जीवित रहूँ; क्येांकि तेरी संहिता मुझे परमप्रिय है।

78) घमण्डियों ने मुझ पर झूठा आरोप लगाया, वे निराश हों। मैं तेरी आज्ञाओं का मनन करूँगा।

79) तेरे श्रद्धालु भक्त मेरा साथ दें और वे भी, जो तेरा विधान जानते हैं।

80) मैं तेरी संहिता के पालन में दृढ़ बना रहूँ। कहीं ऐसा न हो कि मुझे निराश होना पड़े।


81) मैं तेरी मुक्ति के लिए तरसता रहता हूँ, मुझे तेरी प्रतिज्ञा का भरोसा है।

82) मेरी आँखें तेरी प्रतिज्ञा की राह देखती रहती है। मैं कहता रहता हूँ: "तू मुझे कब सान्त्वना देगा?"

83) मैं धुँए में सिकुड़ी हुई मशक-जैसा बन गया हूँ; किन्तु मैंने तेरी संहिता नहीं भुलायी।

84) मेरी यह दशा कब तक रहेगी? तू कब मेरे अत्याचारियों का न्याय करेगा?

85) घमण्डियों ने तेरी संहिता की उपेक्षा करते हुए मेरे लिए गड्ढ़ा खोदा।

86) तेरी आज्ञाएँ विश्वसनीय हैं। मेरी सहायता कर; लोग मुझ पर अकारण अत्याचार करते हैं।

87) पृथ्वी पर से मेरा अस्तित्व प्रायः मिट गया है; किन्तु मैंने तेरी आज्ञाओं का परित्याग नहीं किया।

88) अपनी सत्यप्रतिज्ञता के अनुरूप मुझे नवजीवन प्रदान कर और मैं तेरी शिक्षा का पालन करता रहूँगा।


89) प्रभु! तेरी प्रतिज्ञा सदा-सर्वदा बनी रहती है। वह आकाश की तरह चिरस्थायी है।

90) तेरी सत्यप्रतिज्ञता पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनी रहती है। तेरे द्वारा स्थापित पृथ्वी आज तक अचल है।

91) तेरी इच्छा से सब कुछ बना हुआ है, क्योंकि विश्व तेरी आज्ञा मानता है।

92) यदि तेरी संहिता से मुझे अपार आनन्द नहीं मिला होता, तो मैं अपनी विपत्ति में मर गया होता।

93) मैं तेरी आज्ञाएँ कभी नहीं भुलाऊँगा; क्योंकि उनके द्वारा तूने मुझे नवजीवन प्रदान किया।

94) मैं तेरा ही हूँ, मेरा उद्धार कर; क्योंकि मैं तेरे आदेशों का पालन करना चाहता हूँ।

95) दुष्ट जन मेरा सर्वनाश करना चाहते थे; किन्तु मैं तेरी आज्ञाओं का मनन करता हूँ।

96) मैंने देखा कि सब पूर्णताएँ ससीम हैं; किन्तु तेरी संहिता की सीमा नहीं।


97) प्रभु! तेरी संहिता मुझे कितनी प्रिय है! मैं प्रतिदिन उसका मनन करता हूँ।

98) तेरे आदेश सदा मेरे सामने रहते हैं, इसलिए मैं अपने शत्रुओं से अधिक समझदार हूँ।

99) मैं तेरी शिक्षा का मनन किया करता हूँ, इसलिए मैं अपने शिक्षकों से अधिक बुद्धिमान् हूँ।

100) मैंने तेरी आज्ञाओं का पालन किया है, इसलिए मैं वयोवृद्धों से अधिक विवेकशील हूँ।

101) तेरे नियमों का पालन करने के लिए मैं कुमार्ग से दूर रहा हूँ।

102) मैं तेरी आज्ञाओं के मार्ग से नहीं भटका हूँ; क्योंकि तूने स्वयं मुझे शिक्षा दी है।

103) मुँह में टपकने वाले मधु की अपेक्षा तेरी शिक्षा मेरे लिए अधिक मधुर है।

104) तेरी आज्ञाओं से मुझे विवेक मिला, इसलिए मैं असत्य के मार्ग से घृणा करता हूँ।


105) तेरी शिक्षा मुझे ज्योति प्रदान करती और मेरा पथ आलोकित करती है।

106) मैंने शपथ खायी और इसपर दृढ़ रहता हूँ कि मैं तेरे न्यायसंगत निर्णयों का पालन करूँगा।

107) प्रभु! मेरा बहुत अधिक अपमान किया गया है, अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मुझे नवजीवन प्रदान कर।

108) प्रभु! मेरी प्रार्थनाएं स्वीकार करने की कृपा कर, मुझे अपने नियमों की शिक्षा प्रदान कर।

109) मैं निरन्तर हथेली पर जान रखता हूँ; लेकिन मैंने तेरी संहिता नहीं भुलायी है।

110) विधर्मियों ने मेरे लिए जाल बिछाया है, किन्तु मैं तेरे आदेशों से नहीं भटका हूँ।

111) तेरी शिक्षा मेरी सदा बनी रहने वाली विरासत है, इस में मेरा हृदय रमता है।

112) मैं सदा, जीवन के अन्त तक, तेरे सपनों पर चलने के लिए दृढ़संकल्प हूँ।


113) मैं कपटी व्यक्तियों से घृणा करता हूँ।

114) तू ही मेरा आश्रय और ढाल है! मुझे तेरी प्रतिज्ञा का भरोसा है।

115) दुष्टो! मुझ से दूर हटो! मैं अपने ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करूँगा।

116) अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मुझे सँभाल और मैं जीवित रहूँगा, मुझे अपनी आशा से निराश न होने दे।

117) मुझे सँभाल और मेरा उद्धार हो जायेगा, मैं तेरी संहिता का मनन करता रहूँगा।

118) जो तेरी संहिता से दूर भटकते हैं, तू उनका तिरस्कार करता है; क्योंकि उनका कपटपूर्व व्यवहार व्यर्थ है।

119) पृथ्वी के सब दुर्जनों को तू कूड़ा-करकट समझता है; इसलिए मैं तेरे नियमों को हृदय से चाहता हूँ।

120) तेरे सामने मेरा शरीर आतंक से काँपता है; मुझे तेरे निर्णयों का भय बना रहता है।


121) मैंने न्याय और धार्मिकता का आचरण किया है; मुझे मेरे अत्याचारियों के हाथ न पड़ने दे।

122) अपने सेवक की सुख-शान्ति की रक्षा कर, जिससे घमण्डी मुझ पर अत्याचार न करें।

123) तेरी मुक्ति और तेरी न्यायसंगत प्रतिज्ञा की पूर्ति के लिए मेरी आँखें तरसती रहती हैं।

124) अपनी सत्यप्रतिज्ञता के अनुरूप अपने सेवक से व्यवहार कर और मुझे अपनी संहिता की शिक्षा प्रदान कर।

125) मैं तेरा सेवक हूँ; मुझे विवेकशील बना और मैं तेरे आदेशों का ज्ञान प्राप्त करूँगा।

126) प्रभु! हस्तक्षेप करने का समय आ गया है। तेरी संहिता का उल्लंघन किया जाता है।

127) सोने, परिष्कृत सोने की अपेक्षा मुझे तेरी आज्ञाएँ अधिक प्रिय हैं।

128) मैं तेरे सभी नियम न्यायसंगत मानता और असत्य के सब मार्गों से घृणा करता हूँ।


129) तेरे नियम अपूर्व हैं, इसलिए मैं उनका पालन करता हूँ।

130) तेरी शिक्षा की व्याख्या ज्योति प्रदान करती है; वह अशिक्षितों को भी विवेकशील बनाती है।

131) मैं आह भर कर बड़ी उत्सुकता से तेरी आज्ञाओं के लिए तरसता रहता हूँ।

132) मुझ पर दयादृष्टि कर, जैसा कि तू अपने भक्तों के लिए करता आया है।

133) अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मेरे कदमों को दृढ़ता प्रदान कर। किसी भी बुराई का मुझ पर अधिकार न होने दे।

134) मुझे मनुष्यों के अत्याचार से मुक्त कर, जिससे मैं तेरी आज्ञाओं का पालन करूँ।

135) अपने सेवक पर दयादृष्टि कर; मुझे अपने आदेशों की शिक्षा प्रदान कर।

136) मेरी आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगी, क्योंकि लोग तेरी संहिता का पालन नहीं करते।


137) प्रभु! तू न्यायी है; तेरे निर्णय सही हैं।

138) न्याय के अनुसार और पूरी सच्चाई से तूने अपने आदेशों की घोषणा की है।

139) जब मेरे विरोधी तेरी शिक्षा भुलाते हैं, तो मेरा धर्मोत्साह मुझे खा जाता है।

140) तेरी शिक्षा पूर्ण रूप से विश्वसनीय है, तेरा सेवक उसे प्यार करता है।

141) दीन-हीन और तिरस्कृत होने पर भी मैंने तेरे नियमों को नहीं भुलाया।

142) तेरा न्याय चिरस्थायी न्याय है, तेरी संहिता मूर्तिमान् सत्य है।

143) मैं संकट और दुःख से घिरा हुआ हूँ। तब भी तेरी आज्ञाएँ मुझे आनन्द प्रदान करती हैं।

144) तेरे निर्णय न्याययुक्त और चिरस्थायी हैं। मुझे विवेक प्रदान कर और मैं जीवित रहूँगा।


145) प्रभु! मैंने सारे हृदय से तुझे पुकारा, मेरी सुन। मैं तेरी संहिता का पालन करूँगा।

146) मैंने तेरी दुहाई दी, मेरा उद्धार कर और मैं तेरे आदेशों का पालन करूँगा।

147) मैं भोर से पहले तुझे पुकारता हूँ। मुझे तेरी प्रतिज्ञा का भरोसा है।

148) तेरी शिक्षा का मनन करने के लिए मेरी आँखें रात के पहरों में खुली रहीं।

149) अपनी सत्यप्रतिज्ञता के अनुरूप मेरी सुन। प्रभु! अपने निर्णय के अनुसार मुझे नवजीवन दे।

150) तेरी संहिता की उपेक्षा करने वाले दुष्ट अत्याचारी मेरे निकट आ रहे हैं।

151) प्रभु! तू भी तो निकट है। तेरी सब आज्ञाएँ विश्वसनीय हैं।

152) मैं बहुत पहले से यह जानता हूँ कि तूने सदा के लिए अपनी शिक्षा स्थापित की है।


153) मेरी विपत्ति पर दृष्टि डाल और मेरा उद्धार कर; क्योंकि मैंने तेरी संहिता को नहीं भुलाया।

154) मेरे पक्ष का समर्थन कर और मेरी रक्षा कर; अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मुझे नवजीवन प्रदान कर।

155) मुक्ति विधर्मियों से दूर है; क्योंकि उन्होंने तेरी संहिता की उपेक्षा की।

156) प्रभु! तेरी कृपा असीम है; अपने निर्णय के अनुसार मुझे नवजीवन दे।

157) मेरे अत्याचारी और विरोधी अनेक हैं, किन्तु मैं तेरी संहिता से विमुख नहीं हुआ।

158) विश्वासघातियों को देख कर मुझे घृणा होती है; क्योंकि उन्होंने तेरी शिक्षा का पालन नहीं किया।

159) देख कि मैं तेरे आदेशों से कितना अनुराग करता हूँ। प्रभु! अपनी सत्यप्रतिज्ञता के अनुरूप मुझे नवजीवन दे।

160) तेरी शिक्षा सत्य पर आधारित है, तेरे न्याय का प्रत्येक निर्णय अपरिवर्तनीय है।


161) शासकों ने मुझ पर अकारण अत्याचार किया, किन्तु मेरा हृदय केवल तेरी शिक्षा का उल्लंघन करने से डरता है।

162) मैं तेरी प्रतिज्ञा के कारण वैसे ही आनन्दित हूँ, जैसे कोई, बड़ा खजाना मिलने पर आनन्दित है।

163) मैं सारे हृदय से असत्य से घृणा करता हूँ, तेरी संहिता ही मुझे परमप्रिय है।

164) तेरे न्यायमुक्त निर्णयों के कारण मैं दिन में सात बार तेरी स्तुति करता हूँ।

165) तेरी संहिता के प्रेमियों को अपार शान्ति प्रिय है, वे कभी विचलित नहीं होते।

166) प्रभु! तुझ से मुक्ति का भरोसा है; मैं तेरी आज्ञाओं का पालन करता रहा।

167) मैं तेरे आदेशों को पूरा करता रहा, मैं उन को बहुत प्यार करता हूँ।

168) तू मेरा आचरण जानता है; तू जानता है कि मैं तेरी संहिता का पालन करता आया हूँ।


169 प्रभु! मेरी पुकार तेरे पास पहुँचे, अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मुझे विवेक प्रदान कर।

170) मेरी विनती तेरे पास पहुँचे, अपने वचन के अनुसार मेरा उद्धार कर।

171) मेरा कण्ठ तेरा स्तुतिगान करता रहे, क्योंकि तू मुझे अपनी संहिता की शिक्षा देता है।

172) मेरी वाणी तेरे आदेशों का स्तुतिगान करती रहे, क्योंकि तेरी सब आज्ञाएँ न्यायमुक्त हैं।

173) तेरा हाथ मेरी सहायता के लिए तत्पर रहे, क्योंकि मैंने तेरे नियम चुने हैं।

174) प्रभु! मुझे तुझ से मुक्ति का भरोसा है; मुझे तेरी संहिता से अपार आनन्द मिलता है।

175) मैं तेरी स्तुति करने के लिए जीवित रहूँ। तेरी आज्ञाएँ मेरा पथप्रदर्शन करती रहें।

176) मैं खोयी हुई भेड़ की तरह भटक रहा हूँ, अपने सेवक को खोज ले; क्योंकि मैंने तेरी आज्ञाएँ नहीं भुलायीं।



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