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जनवरी 16

संत योसेफ वाज़

Joseph Vazयोसेफ वाज़ का जन्म 21 अप्रैल सन् 1651 को गोवा में हुआ था। उन्होंने अपने पिता के गाँव, सान्कोयाले में पुर्तगाली भाषा तथा अपनी माता के गाँव, बौलिम में लातीनी भाषा की शिक्षा ग्रहण की। तत्पश्चात्‍ उन्होंने येसु-समाजी महाविध्यालय में वग्मिता का और सन्त थॉमस अक्वीनास महाविध्यालय में दर्शनशास्त्र तथा ईशशास्त्र का अध्ययन किया। सन 1676 में उनका पुरोहिताभिषेक हुआ और वे एक अच्छे धर्मोपदेशक तथा पापमोचक गुरु (Confessor) साबित हुए। हॉलैंड द्वारा शासित श्रीलंका के काथलिक विश्वासियों की दयनीय हालात के बारे जान कर उन्होंने वहाँ जा कर लोगों की सेवा करने की इच्छा प्रकट की। परन्तु वे कन्नडा मिशन के अधिकारी बनाये गये। लगभग तीन वर्ष तक उन्होंने इस पद से कलीसिया की सेवा की। सन्‍ 1684 में गोवा लौट आ कर उन्होंने गाँव-गाँव में सुसमाचार का प्रचार किया तथा ओरातोरियन (Oratorian) धर्म-समाज के सदस्य बने। कुछ ही दिन में वे इस धर्मसमाज के उच्च अधिकारी बने।
सन्‍ 1686 में उन्होंने इस पद को त्यागने का अनुमति पाने पर श्रीलंका के लिए रवाना हो गये। जाफ्ना पहुँचने पर उन्हें मालूम पडा कि वहाँ पर कट्टर कैल्विनवादी विचारधारा के प्रचार के चलते काथलिक धर्मावलंबियों पर अत्याचार हो रहा था। इसलिए उन्हें वेष बदल कर गुप्त रीती से अपना काम करना पडा। वे सिल्लाले नामक गाँव में रहने लगे। वहाँ पर काफी संख्या में काथलिक विश्वासी रहते थे और वे विश्वास में दृढ़ भी थे। इस कार्य में ईश्वर उन्हें बडी सफलता प्रदान की। जब उनके कार्यों पर हॉलैंड निगरानी कड़ी की जाने पर उन्हें वहाँ से पुत्लाम जा कर रहना पडा जहाँ उन्होंने एक साल का समय सफलतापूर्वक बिताया। वहाँ से वे नये स्वतंत्र राज्य के राजधानी शहर कान्डी गये। वहाँ पहुँचने पर उन्हें पुर्तगाली गुप्तचर मान कर जेल भेजा गया। वहाँ के काथलिक विश्वासियों ने उनसे संपर्क किया और उनके द्वारा उन्होंने अपना प्रेरितिक कार्य को जारी रखा। अन्त में उन्हें राजा का समर्थन प्राप्त हुआ और वे अपने कार्य को बढ़ाते गये।
सन 1699 में कई ओरातोरियन धर्मसमाजी उनकी सहायता करने के लिए श्रीलंका भेजे गये। उनके कार्यों की सफलता की खबर रोम पहुँची। इस पर सन्त पापा के प्रतिनिधि, मोन्सिन्जोर दे तुर्नोन (Msgr. De Tournon) को निर्देश दिया गया कि वे फादर योसेफ वाज़ से संपर्क करें। मोन्सिन्जोर तुर्नोन ने श्रीलंका में एक धर्मप्रान्त की स्थापना कर फादर वाज़ को उसका प्रथम धर्माध्यक्ष नियुक्त करने का प्रस्ताव रखा, परन्तु फादर वाज़ ने उन्हें उस कार्य से रोका। उनका सास्थ्य बिगड गया और सन्‍ 1710 में वे इतने कमजोर हो गये कि वे कान्डी के बाहन न जा सके। 16 जनवरी 1711 में कान्डी में ही उनकी मृत्यु हुई। श्रीलंका के कोलंबो में सन् 1995 में सन्त पिता योहन पौलुस द्वितीय ने उन्हें धन्य घोषित किया। संत पिता फ्रांसिस ने 14 जनवरी 2015 को उन्हें संत घोषित किया। संत योसेफ वाज़ श्रीलंका का पहला काथलिक संत हैं।


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