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कोलकोत्ता की धन्य मदर तेरेसा

सितंबर 5

जन्म और बचपन

धन्य मदर तेरेसा का जन्म 26 अगस्त 1910 को आज के मकेदुनिया गणतंत्र की राजधानी स्कोप्जे (Skopje) शहर में हुआ। निकोला (Nikola) और द्राना बोयाक्स्यू (Drana Bojaxhiu) उनके माता-पिता थे। जन्म के दूसरे दिन ही उनको बपतिस्मा संस्कार दिया गया और उनका नाम गोन्क्सा आग्नस (Gonxha Agnes) रखा गया। गोन्क्सा का अल्बनियानी भाषा में अर्थ फूल की कली है। आग्नस पाँच बच्चों में सब से छोटी थी। आग्नस के पिता एक व्यापारी थे और उनके घर के पास ही उनकी दुकान भी थी। आग्नस की माँ द्राना विश्वास में धनी थी और उन्होंने अपने बच्चों को बचपन से ही ईश्वर को प्रेम करना तथा उनसे प्रार्थना करना सिखाया। उन्होंने अपने बच्चों को पडोसी प्रेम भी सिखाया और उनके घर जो भी सहायता माँगने आते थे, उन्हें वे कभी भी खाली हाथ नहीं लौटाती थी। द्राना ने अपने बच्चों को अनुशासन भी सिखाया ताकि बच्चे झूठ, चुगली तथा अन्य बुराईयों से दूर रहें।

जब आग्नस नौ साल की थी, उसके पिताजी का देहान्त हो गया। यह पूरे परिवार के लिए बडे दुख का कारण बन गया। बच्चों की देखरेख की पूरी जिम्मेदारी द्राना के कंधों पर रखी गयी। उन्होंने बूटेदार कपडे बेचने का धन्धा शुरू किया, परन्तु उन्हें जीवन की परिस्थितियों से बहुत संघर्ष करना पड़ा। यह उन्हें और उनके बच्चों को ईश्वर के और निकट ले आया। आग्नस सुन्दर, सजीव और अध्ययनशील थी। वह पढ़ना, गाना और अभिनय करना पसन्द करती थी। वह गिरजेघर की गायक-मण्डली की सदस्य भी थी। वह अपनी माता के साथ रोज मिस्सा बलिदान में भाग लेती थी।

धर्मबहन बनने की बुलाहट

बारह साल की आयु में आग्नस ने पहली बार अपने हृदय में महसूस किया कि येसु उन्हें अपना अनुसरण करने के लिए बुला रहे हैं। उन्हें लगा कि मुझे घर परिवार छोड कर एक मिशनरी बन कर मिशन देशों में सेवा करनी है। भारत में सेवा करने की उनकी बडी इच्छा थी। उन्हें पता चला कि लोरेतो धर्मबहनें भारत में सेवा करती हैं। इसलिए भारत में मिशनरी कार्य करने के उद्देश्य से अठारह साल की उम्र में उन्होंने लोरेतो धर्मबहनों के संस्थान को उनके संस्थान में शामिल होकर सेवा करने की इच्छा प्रकट करते हुए चिट्ठी लिखी। अपनी प्यारी माता को छोडना और इतने दूर जाना उन के लिए बहुत ही कठिन था। विदा लेने से पहले उनकी माता ने उनसे कहा था, “येसु के हाथ को थामना और उनके साथ हमेशा चलना और कभी पीछे नहीं देखना”।

धर्मसंघीय प्रशिक्षण

सितंबर 1928 में रेल्वेस्टेशन पर आँसु भरी आँखों से विदा लेकर रेलगाडी में वे आयरलैंड के डब्लिन शहर में स्थित राथफ़ार्नहाम मठ (Rathfarnham Abbey) के लिए रवाना हो गयी। सबसे पहले उन्हें दो महीने तक अंग्रेज़ी सीखने का मौका मिला। उनको वहाँ पर तेरेसा नाम दिया गया। यह एक नया जीवन शुरू करने का प्रतीक था। अपने परिजनों से दूर, उस नये देश में, नई भाषा बोलने वालों के बीच में भी तेरेसा ने अपने हृदय में एक अगाध आनन्द और शांति का अनुभव किया।

सन 1928, दिसंबर महीने की शुरुआत में तीन अन्य धर्मबहनों के साथ तेरेसा बंगाल के लोरेतो मठ को लक्ष्य बना कर जहाज में रवाना हो गयी। रास्ते में कोलोंबो और मद्रास में रुक कर 6 जनवरी 1929 को वे कोलकत्त्ता पहुँच गयीं। उन्होंने अपनी डायरी में लिखा, “हम ने अकथनीय खुशी के साथ बंगाल की धरती पर अपने पैर रखे।

तेरेसा को दार्जिलिंग भेजा गया। वहाँ पर दो साल के नवदीक्षा काल को उन्होंने प्रार्थना, अध्ययन तथा प्रशिक्षण में बिताया। साथ-साथ उन्होंने बंगाली और हिन्दी भी सीखी। आखिरकार वह दिन आया जब तेरेसा ने अपने जीवन को ईश्वर के लिए समर्पित किया। 25 मई 1931 को तेरेसा ने अपना पहला व्रतधारण किया तथा धर्मसंघीय वस्त्र धारण किया। सिस्टर तेरेसा ने ईश्वर से वादा किया कि वे निर्धनता, ब्रह्मचर्य तथा आज्ञाकारिता के व्रतों का पालन करेंगी तथा बच्चों को शिक्षा देंगी।

सिस्टर तेरेसा के सेवा-कार्य

व्रतधारण के बाद सिस्टर तेरेसा को कोलकोत्ता के लोरेतो मठ में भेजा गया। उन्होंने वहाँ के सेंट मेरीस बंगाली मीडियम स्कूल में भूगोल और धर्मशिक्षा सिखाना शुरू किया। वे एक अनुशासित, प्रभावशाली तथा दयालु शिक्षिका थी। उन्होंने विद्यार्थियों को खेलकूद में भी प्रशिक्षण दिया। अवसर मिलने पर उन्होंने विद्यार्थियों को ईश्वर के प्रेम तथा बलिदानों के मूल्य पर महत्वपूर्ण शिक्षा दी। कभी-कभी उन्होंने बच्चों को आसपास की झुग्गी-झोपडियों में ले जाकर गरीबों की दयनीय हालात से उन्हें अवगत कराया तथा अपना भोजन भूखे लोगों के साथ बाँट कर खाने के लिए उन्हें प्रेरित किया। सिस्टर तेरेसा के व्यवहार और जीवनशैली का विद्यार्थियों पर बहुत गहरा प्रभाव पडा। 24 मई 1937 को सिस्टर तेरेसा ने अपना अंतिम व्रतधारण किया। उसी दिन से वे मदर तेरेसा के नाम से जानी जाने लगी। कई सालों तक सेंट मेरी स्कूल में एक शिक्षिका की भूमिका निभाने के बाद वे उस स्कूल की प्राध्यापिका बन गयी।

बुलाहट के अन्तर्गत बुलाहट

10 सितंबर 1946 को मदर तेरेसा वार्षिक आध्यात्मिक साधना में भाग लेने एक रेलगाडी से दार्जिलिंग जा रही थी। उन्होंने उस यात्रा के समय येसु की आवाज सुनी जिन्होंने उनसे लोरेतो मठ को भी छोड कर झुग्गी-झोपडियों में गरीबों से गरीबों में येसु की सेवा करने को कहा। येसु प्रेम के लिए प्यासे थे। इस अनुभव ने उन्हें एक नई बुलाहट प्रदान की। जब वापस कोलकोत्ता आयी, तब उन्होंने अपने आध्यात्मिक गुरू फादर सेलेस्टे वान एक्सेम (Father Celeste Van Exem) से इस विषय में परामर्श किया। उन्होंने मदर तेरेसा को छ: महीनों तक मौन धारण कर इंतजार करने का सुझाव दिया। इस अवधि उन्हें कई बार येसु तथा माता मरियम के दर्शन हुए। इन दर्शनों के द्वारा वे अपनी बुलाहट को स्पष्ट रूप से समझने लगी। अपने आध्यात्मिक गुरु के कहने पर मदर तेरेसा ने कोलकोत्ता के महाधर्माध्यक्ष फेर्डिनान्ड पेरिएर (Archbishop Ferdinand Perier) को चिट्ठी लिखी। उन्होंने मदर को इंतज़ार करने को कहा। हालाँकि मदर के लिए इंतज़ार करना कठिन था, फिर भी उन्होंने आज्ञापालन का प्रमाण दिया। कुछ समय बाद महाधर्माध्यक्ष ने लोरेतो धर्मसमाज के अधिकारियों से परामर्श करने के बाद मदर तेरेसा को लोरेतो मठ को छोड कर गरीबों की सेवा में अपना नया मिशन कार्य शुरू करने की अनुमति दी।

अगस्त 1948 में मदर तेरेसा ने लोरेतो मठ को छोड कर काले रंग के अपने धर्मसंघीय वस्त्र को त्याग कर नीली क्यारी की सफेद सूती साडी को अपनाया। उस समय उनकी उम्र 38 साल की थी। सबसे पहले उन्होंने पटना जाकर मेडिकल मिशन की धर्मबहनों के साथ कुछ समय रह कर मरीजों की सेवाकार्य करने का आवश्यक प्रशिक्षण प्राप्त किया। तीन महीने बाद जब वे वापस आयी तो रहने के लिए उनके पास कोई जगह नहीं थी। वे गरीब वयस्कों की सेवा करने वाली कुछ धर्मबहनों के साथ उनके निवास स्थान पर रहने लगी। वे रोज गलियों में जाकर गरीबों, रोगियों तथा कुष्ठरोगियों की सेवा करने लगी। जो बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे थे, उन्हें वे पेडों के नीचे बिठा कर पढ़ाने लगी। कुछ स्वयंसेवक शिक्षा तथा स्वास्थ्य-सेवा कार्य में उनकी मदद करने लगे। इस दौरान वे रहने के लिए एक जगह की खोज भी कर रही थी। सन 1949 फरवरी महीने में उन्होंने गोम्स भाईयों के मकान की दूसरी मंजिल में रहना शुरू किया। अब वे अकेली थी। वे माता मरियम की मध्यस्थता से प्रार्थना करने लगी कि वे उनके साथ सेवा करने के लिए युवतियों को भेजें। एक महीने के बाद सन 1949 मार्च में सुभाषिनी दास नाम की एक युवती जो सेंट मेरी स्कूल में मदर तेरेसा की एक विध्यार्थिनी थी, आ पहुँची। उन्होंने सिस्टर आग्नस नाम को स्वीकार किया। इसके बाद मग्देलेन पोल्टन आयी जो सिस्टर गेट्रूड बन गयी। धीरे-धीरे अन्य युवतियाँ भी आने लगीं। सन 1950 के जून महीने तक 12 युवतियाँ मदर तेरेसा के साथ थीं। 7 अक्टूबर 1950 को महाधर्माध्यक्ष पेरिएर ने औपचारिक रीति से प्रेम की मिशनरियों (मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी) की एक धर्मसंघ के रूप में स्थापना की। सन 1951 में मदर तेरेसा ने भारतीय नागरिकता प्राप्त की। “तुमने मेरे भाइयों में से किसी एक के लिए, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो, जो कुछ किया, वह तुमने मेरे लिए ही किया“ (मत्ती 25:40)। पवित्र ग्रन्थ के इस कथन से प्रेरणा पाकर मदर तेरेसा और उनकी धर्मबहनें गरीबों की सेवा करने लगीं। भूखों को खिलाना, नंगों को पहनाना, बेघरों को आश्रय देना, अनपढ़ बच्चों को पढ़ाना, मरीजों का इलाज करना आदि उन बहनों के दैनिक कार्य बन गये। कोलकोत्ता की नगरपालिका ने उन्हें काली मंदिर में आने वाले भक्तों के लिए बने हुए धर्मशाला का उपयोग करने दिया। 22 अगस्त 1952 को मदर तेरेसा ने कोलकत्ता के कालीघाट इलाके में अपना पहला भवन खोला जिसका नाम ’निर्मल हृदय’ रखा गया। उस भवन की मदर तेरेसा के हृदय में विशेष जगह थी। वे रोज वहाँ के सबसे निम्न स्तर कामों को करने में रुचि दिखाती थी जैसे शौचालयों तथा नालियों को साफ करना।

अनाथ बच्चों की दुर्दशा को देख कर मदर तेरेसा ने शिशु भवन खोला और कुष्ठ्ररोगियों की देखरेख के लिए एक केन्द्र भी। जब धर्मबहनों की संख्या बढ़ी, तो मदर तेरेसा ने अपनी सिस्टरों के साथ फरवरी 1953 में वर्तमान के ए.जे.सी. रोड पर स्थित मकान में रहने लगीं जो अब मदर हाऊस के नाम से जाना जाता है। जैसे-जैसे सिस्टरों की संख्या बढ़ी, उन्होंने कोलकोत्ता के बाहर भवन खोल कर सेवा करना शुरू किया। कोलकोत्ता के बाहर का पहला भवन रांची में मई 1959 में शुरू हुआ। 1963 में जो युवक मदर तेरेसा के कार्यों में हाथ बटाना चाह रहे थे उनके लिए ’मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी ब्रदर्स’ की स्थापना की गयी। 1 फरवरी 1965 को मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी को परमधर्माध्यक्षीय (Papal) धर्मसंघ माना गया।। तत्पश्चात विदेशों में भी उन्होंने अपने सेवा-कार्य शुरू किया। विदेश में मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी का पहला भवन वेनेज़ुएला में जुलाई 1965 में शुरू हुआ।

राष्ट्रीय तथा धार्मिक सीमाओं को पार कर कई लोग मदर तेरेसा के सेवा-कार्य में सहभागी बनना चाहते थे। उनके लिए 1969 में ’मदर तेरेसा के सह-कार्यकर्ताओं का संघ’ (Co-Workers of Mother Teresa) की शुरूआत हुई। पूरा समय प्रार्थना में बिता कर गरीबों के लिए प्रार्थना करने हेतु 1976 में मननशील धर्मबहनों तथा 1979 मननशील धर्मभाईयों के समुदायों की स्थापना की गयी। सन 1984 में पुरोहितों के लिए “मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी फादर्स” शुरु किया गया।

आज मदर तेरेसा की संस्थाओं के कार्य 120 से अधिक देशों में प्रगति पर हैं। मदर को 1962 में पद्म श्री, 1972 में जवाहरलाल नेहरू अवार्ड और 1980 में भारत रत्न की उपाधियाँ मिली। 10 दिसंबर 1979 में नोर्वे के ओस्लो शहर में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से नवारा गया। ओस्लो के नोबेल पुरस्कार समारोह में मदर तेरेसा ने अपना परिचय इस प्रकार दिया: “खूर और उत्पत्ति के अनुसार मैं अल्बेनिया की हूँ। मेरी नागरिकता भारत की है। मैं एक काथलिक धर्मबहन हूँ। मेरी बुलाहट के अनुसार मैं सारी दुनिया की हूँ। मेरे हृदय की बात करूँ, तो मैं पूरी तरह येसु की हूँ।” 700 से ज़्यादा पुरस्कारों से वे अपने जीवन काल में ही नवाजी गयी थीं। वे देश-विदेश में यात्रा करते हुई अपनी धर्मबहनों तथा अन्य कार्यकर्ताओं का मनोबल बढाती रही और येसु की शिक्षा पर अटल रहने का सलाह देती रहीं।

उनकी अंतिम घड़ी

सन 1983 में एक दिन जब वे रोम में अपनी धर्मबहनों से मिलने गयी थी, तब उनके मठ में रहते समय अपने बिस्तर से ज़मीन पर गिर कर घायल हुयी। अस्पताल में जाँच के समय पता चला की मदर हृदय की गंभीर बीमारी का शिकार बन चुकी थी। बार-बार बीमार होने के बावजूद भी वे प्राकृतिक आपदाओं, युध्द तथा औद्योगिक विपत्तियों के शिकार लोगों की सेवा में पहुँच जाती थी। उन्होंने सभी लोगों में येसु को देखा और उनकी सेवा-सुश्रूषा की। अपनी बिगडती हालात को ध्यान में रख कर उन्होंने 13 मार्च 1997 को मिशनरीज़ ऑफ चारिटी के सर्वोच्च अधिकारी के पद को त्याग दिया और सिस्टर निर्मला को उनका उत्तराधिकारी चुना गया। करीब 6 महीने बाद 5 सितंबर 1997 शाम 9.30 बजे मदर तेरेसा का निधन हुआ। उस समय वे 87 वर्ष की थीं। 13 सितंबर को पूरे धार्मिक तथा राष्ट्रीय सम्मान के साथ दुनिया के जाने-माने नेताओं तथा हज़ारों दीन-दुखियों की उपस्थिति में उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनकी कब्र तुरन्त ही बहुत से लोगों का तिर्थ-स्थान बन गयी। वहाँ प्रार्थना करने आने वाले लोगों की भीड़ लगने लगी। संत पिता योहन पौलुस द्वितीय ने 19 अक्टूबर 2003 को उन्हें धन्य घोषित किया।


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