1याकूब को पता चला कि मिस्र में अनाज मिलता है। इसलिए उसने अपने पुत्रों से कहा, ''तुम लोग एक दूसरे का मुँह क्यों देख रहे हो?'' 2फिर उसने कहा, ''देखो, मैंने सुना है कि मिस्र में अनाज मिल रहा है। इसलिए वहाँ जा कर अपने लिए अनाज ख़रीद लाओ, जिससे हमारे प्राण बच जायें और हम मरें नहीं''। 3इसलिए यूसुफ़ के भाइयों में से दस भाई अनाज खरीदने मिस्र गये। 4याकूब ने यूसुफ़ के भाई बेनयामीन को उसके अन्य भाइयों के साथ नहीं भेजा। उसे भय था कि कहीं वह किसी विपत्ति में न पड़ जाये। 5इस्राएल के पुत्र दूसरे लोगों के साथ अनाज ख़रीदने आये, क्योंकि कनान देश में अकाल था। 6उस समय यूसुफ़ समस्त मिस्र का शासन करता था और सभी निवासियों को अनाज बेचता था। यूसुफ़ के भाई उसके पास आये और उन्होंने उसे दण्डवत् किया। 7यूसुफ़ ने उन्हें देखते ही पहचान लिया, किन्तु उसने उनसे अपरिचित होने का स्वाँग भर कर कठोर स्वर में पूछा, ''तुम लोग कहाँ से आये हो?'' उन्होंने उत्तर दिया, ''कनान देश से; अनाज खरीदने के लिए''। 8यूसुफ़ तो अपने भाइयों को पहचान गया, किन्तु उन्होंने उसे नहीं पहचाना। 9तब यूसुफ़ को अपने उन स्वप्नों की याद आयी, जो उसने उनके विषय में देखे थे। उसने उन से कहा, ''तुम लोग गुप्तचर हो। तुम लोग इस देश की कमजोरियों का पता लगाने आये हो! 10उन्होंने उत्तर दिया, ''नहीं महोदय! हम, आपके दास अनाज खरीदने आये हैं। 11हम सब एक ही व्यक्ति के पुत्र है। हम ईमानदार आदमी हैं। हम, आपके दास, गुप्तचर नहीं हैं।'' 12परन्तु उसने उन्हें उत्तर दिया, ''नहीं, तुम लोग केवल इसलिए आये हो कि इस देश की कमजोरियों का पता लगा लो''। 13उन्होंने उत्तर दिया, ''हम, आपके दास, कनान-निवासी एक ही व्यक्ति के पुत्र, बारह भाई हैं। सबसे छोटा भाई हमारे पिता के पास है, और एक नहीं रहा।'' 14यूसुफ़ ने उन्हें उत्तर दिया, ''मैंने तुम से जो कहा, वही ठीक है : तुम गुप्तचर हो! 15तुम्हारी इस प्रकार परीक्षा की जायेगी : फिराउन की शपथ खा कर मैं तुम से कहाता हूँ कि जब तक तुम्हारा सब से छोटा भाई भी यहाँ नहीं आ जायेगा, तब तक तुम यहाँ से नहीं जा सकोगे। 16अपने भाई को लाने के लिए अपने में से किसी को भेजो। इस बीच तुम कैद में रहोगे, जिससे इस बात की परीक्षा की जाये कि तुम सच कहते हो या नहीं। फिराउन की शपथ! तुम लोग गुप्तचर ही हो!'' 17यूसुफ़ ने उन्हें तीन दिन तक कैद में डाल दिया। 18तीसरे दिन उसने उन से कहा, ''यदि तुम जीवित रहना चाहते हो, तो मैं तुम से जो कहने जा रहा हूँ, वही करो; क्योंकि मैं ईश्वर पर श्रद्धा रखता हूँ। 19यदि तुम सच्चे हो, तो तुम में से एक भाई यहाँ कैद में रहेगा। दूसरे अपने भूखे परिवारों के लिए अनाज ले कर जा सकते हैं, 20लेकिन तुम्हें अपने कनिष्ठ भाई को मेरे पास ले आना होगा। तभी तुम्हारी बात सच निकलेगी और तुम लोग जीवित रहोगे।'' उन्होंने ऐसा ही किया और 21एक दूसरे से कहा, ''हमने अपने भाई के साथ जो अन्याय किया, उसका दण्ड हम भोग रहे है। उसने हम से दया की याचना की और हमने उसकी दुर्गति देख कर भी उसे ठुकराया। इसी से हम यह विपत्ति भोग रहे हैं।'' 22रूबेन ने उन से कहा, ''मैने तुम लोगों को कितना समझाया कि बच्चे के साथ अन्याय मत करो; किन्तु तुमने मेरी एक भी नहीं मानी और अब हमसे उसके खून का बदला लिया जा रहा है''। 23उन्होंने एक दुभाषिये का उपयोग किया था, इसलिए उन्हें मालूम नहीं था कि यूसुफ़ उनकी बातें समझ रहा है। 24यूसुफ़ उन से अलग हो गया और रोने लगा। बाद में उसने लौट कर उन से बातचीत की। 25तब यूसुफ़ ने आज्ञा दी कि उनके बोरे अनाज से भर दिये जायें, उनके बोरों में उनके रूपये भी रख दिये जायें और रास्ते के लिए उनको खाद्य सामग्री भी दे दी जाये। ऐसा ही किया गया। 26वे अपने-अपने गधों पर अनाज रख कर वहाँ से चल दिये। 27जब उन में से एक ने सराय में अपना बोरा खोला, जिससे वह अपने गधे को कुछ खाने को दे दे, तो वह देखता क्या है कि उसके रूपये बोरे के ऊपरी भाग में रखे हुए हैं। 28वह अपने भाइयों से बोला, ''मेरे रूपये तो मेरे इसी बोरे के ऊपरी भाग में रखे हैं''। यह सुन वह हक्का-बक्का रह गये। वे काँपते हुए एक-दूसरे से कहने लगे, ''ईश्वर ने हमारे साथ ऐसा क्यों किया''? 29उन्होंने कनान देश में अपने पिता याकूब के पास पहुँच कर उस से सब हाल सुनाते हुए कहा, 30''उस देश के शासक ने हम से कठोर शब्द कहे और हम को उस देश का गुप्तचर समझा। 31लेकिन हमने उस से कहा कि हम ईमानदार आदमी हैं, हम गुप्तचर नहीं हैं। 32हम एक ही पिता के पुत्र बारह भाई हैं। एक जीवित नहीं है और सब से छोटा कनान देश में हमारे पिता के पास है। 33तब उस व्यक्ति ने, जो उस देश का शासक है, हम से कहा - तुम लोग ईमानदार आदमी हो या नहीं, यह मैं इस बात से जानूँगा कि तुम अपने किसी एक भाई को मेरे पास छोड़ जाओ। फिर अपने भूखे घर वालों के लिए अनाज ले कर चले जाओ; 34लेकिन तुम्हें अपने छोटे भाई को मेरे पास लाना ही पड़ेगा। इस से मैं यह मान जाऊँगा कि तुम गुप्तचर नहीं, बल्कि ईमानदार हो। इसके बाद मैं तुम्हें तुम्हारे भाई को लौटा दूँगा और फिर तुम इस देश में कहीं भी आ-जा सकोगे''। 35वे अपने बोरों को खाली करने लगे, तो देखते क्या हैं कि प्रत्येक के रूपयों की थैली उसके बोरे में ही पड़ी है। जब उन्होंने और उनके पिता ने रूपयों की थैलियाँ देखीं, तो वे डर गये। 36उनके पिता याकूब ने उन से कहा, ''तुम लोग तो मुझे सन्तानहीन किये दे रहे हो। यूसुफ़ जीवित नहीं रहा, सिमओन भी नहीं है और तुम अब बेनयामीन को भी ले जाना चाहते हो। मेरे तो बुरे दिन आ गये हैं।'' 37रूबेन ने अपने पिता से कहा, ''यदि मैं उसे आपके पास सुरक्षित न लौटा लाऊँ, तो आप मेरे दोनों पुत्रों को मार डालियेगा। उसे मेरे सुपुर्द कर दीजिए, मैं उसे आपके पास वापस ले आऊँगा।'' 38लेकिन उसने उत्तर दिया, ''मेरा पुत्र तुम्हारे साथ नहीं जायेगा। उसका भाई मर चुका है और वह अकेला बचा है। कहीं रास्ते में उस पर कोई विपत्ति आयी, तो शोक के मारे मुझ-जैसे बूढ़े को तुम अधोलोक पहुँचा दोगे।