1इसके बाद मूसा और हारून ने फिराउन के पास जा कर कहा, ''इस्राएलियों का ईश्वर प्रभु यह कहता है : मेरे लोगों को जाने दो, जिससे वे निर्जन प्रदेश जा कर मेरा एक पर्व मना सकें।'' 2फिराउन ने उत्तर दिया, ''वह कौन-सा प्रभु है, जिसकी मैं आज्ञा मानूँ और इस्राएलियों को जाने दें, मैं न तो उस प्रभु को जानता हूँ और न मैं इस्राएलियों को जाने दूँगा। 3फिर उन्होंने कहा, ''इब्रानियों के ईश्वर ने हमें दर्शन दिये हैं; इसलिए हमें निर्जन प्रदेश जाने दे, जहाँ की यात्रा तीन दिन की है, जिससे हम अपने ईश्वर प्रभु को वहाँ बलि चढ़ा सकें; नहीं तो वह हम पर महामारी भेज देगा या हमें तलवार के घाट उतरवा देगा।'' 4परन्तु मिस्र के राजा ने उन्हें उत्तर दिया, ''मूसा और हारून! तुम लोगों को उनके कामों से क्यों हटा रहे हो? जाओ, अपना बेगार का काम करो।'' 5इसके बाद फिराउन ने कहा, ''देखो, अब देश में लोगों की संख्या बढ़ गयी है और तुम उन्हें उनके बेगार के काम से छुड़ाना चाहते हो!'' 6उसी दिन फिराउन ने लोगों से बेगार करवाने वालों और मेटों को यह आदेश दिया, 7''तुम अब तक जिस प्रकार लोगों को बनाने के लिए घास-फूस दिया करते थे, वह आगे मत देना। वे खुद जायें और खुद घास-फूस इकट्ठा करें। 8फिर भी उतनी ही ईटें उन से बनवाना, जितनी वे अब तक बनाते आये हैं। उनकी संख्या बिलकुल कम मत करना। वे आलसी हैं और इसलिए चिल्ला कर कहते हैं कि हमें अपने ईश्वर को बलि चढ़ाने के लिए जाने दीजिए। 9उन लोगों का बेगार और भी कठिन बना देना, जिससे वे उस में ही इतने उलझे रहें कि झूठी बातों पर ध्यान न दे सकें।'' 10तब लोगों पर नियुक्त अधिकारियों और मेटों ने उनके पास जा कर यह कहा, ''फिराउन का कहना है कि मैं तुम्हें घास-फूस नहीं दूँगा। 11तुम खुद जा कर, जहाँ कहीं मिले, घास-फूस लाओ, किन्तु तुम लोगों को पहले जितना सामान तैयार करना है। 12इसलिए वे मिस्र भर में इधर-उधर दूर-दूर तक भूसा बनाने के लिए डण्ठल बटोरने लगे। 13अधिकारी यह कहते हुए उन्हें बाध्य करते थें, ''ठीक उसी प्रकार प्रतिदिन अपना निर्धारित काम पूरा करो, जिस प्रकार तब करते थें, जब तुम को भूसा दिया जाता था।'' 14फिराउन द्वारा नियुक्त बेगार करवाने वाले इस्राएली मेटों को पीटते थे और उन से पूछते थे, ''तुमने पहले की तरह क्यों कल या आज ईटों की नियुक्ति की हुई संख्या का काम पूरा नहीं करवाया?'' 15तब इस्राएली मेट फिराउन के पास जा कर यह शिकायत करने लगे कि ''आप अपने दासों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं 16आपके दासों को घास-फूस तक नहीं दिया जाता है, तब भी वे हम से ईटें बनाने को कहते हैं। आपके दासों को पीटा जाता है, परन्तु दोष आपके अपने लोगों का होता है।'' 17उसने उत्तर दिया, ''तुम लोग आलसी हो; हाँ तुम आलसी हो। इसलिए तुम कहते हो कि हमें प्रभु को बलि चढ़ाने के लिए जाने दीजिए। 18जाओ, अपना काम करो। तुम्हें भूसा नहीं दिया जायेगा, लेकिन तुम्हें ईटों की निर्धारित संख्या देनी पड़ेगी।'' 19जब इस्राएली मेटों से कहा गया कि तुम प्रतिदिन की ईटों की निर्धारित संख्या कम नहीं करोंगे, तो वे समझ गये कि अब उनकी हालत बहुत बुरी हो गयी है। 20वे फिराउन के यहाँ से बाहर निकले और मूसा तथा हारून से मिले, जो उनकी प्रतिक्षा कर रहे थे। 21उन लोगों ने कहा, ''आपने फिराउन और उनके सेवकों की दृष्टि में हमें घृणा का पात्र बना दिया है और आपने हमें मार डालने के लिये उनके हाथों में एक तलवार दे दी हैं। प्रभु आप को दर्शन दे कर आपका न्याय करें।'' 22इस पर मूसा यह कहते हुए प्रभु से दुहाई करने लगा, ''प्रभु तूने इस प्रजा को इतना क्लेश क्यों दिया हैं? तूने मुझे क्यों भेजा है, 23जिस समय से मैं तेरी आज्ञा से फिराउन के पास बात करने गया, तब से उसने इस प्रजा को और अधिक कष्ट दिया है; लेकिन तूने अपनी प्रजा का उद्धार करने के लिए कुछ भी नहीं किया।''