1प्रभु ने मूसा से कहा, 2हारून और उसके पुत्रों को यह आदेश दो : यह होम-बलि की विधि है। होम-बलि रात भर, प्रातःकाल तक, वेदी की आग पर रहेगी और वह आग वेदी पर प्रज्वलित रखी जायेगी। 3याजक छालटी का वस्त्र और छालटी का जाँघिया पहने वेदी पर जलायी होम-बलि की राख एकत्र कर उसे वेदी की बगल में रखेगा। 4इसके बाद वह कपड़े बदल कर राख शिविर के बाहर किसी शुद्ध स्थान पर ले जायेगा। 5(५-६) वेदी की आग को प्रज्वलित रखना है। उसे कभी बुझने नहीं देना चाहिए। याजक प्रतिदिन सबेरे उस पर लकड़ी रखेगा, आग पर होम बलि सजायेगा और उस में शान्ति-बलियों की चरबी जलायेगा। 7अन्न-बलि की विधि इस प्रकार है। हारून का कोई पुत्र उसे वेदी के सामने प्रभु को चढ़ाये। 8याजक अन्न-बलि में से मुट्ठी भर तेल-मिश्रित मैदा निकाल कर उसे सारे चढ़ावे के प्रतीक के रूप में लोबान के साथ वेदी पर जलाये। यह सुगन्धयुक्त चढ़ावा है, जो प्रभु को प्रिय है। 9शेष भाग हारून और उसके पुत्र खा सकते हैं, किन्तु वह एक पवित्र स्थान पर - दर्शन कक्ष के आँगन में, खमीर के बिना खाया जाये। 10वह खमीर के साथ नहीं पकाया जा सकता है। मैं अपने चढ़ावों में से उन्हें यह भाग देता हूँ। यह प्रायश्चित बलि और क्षतिपूर्ति-बलि के समान परमपवित्र है। 11हारून के सब पुरुष वंशज इसे खा सकते हैं। प्रभु के चढ़ावों के इस अंश पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनका चिरस्थायी अधिकार है। जो इसका स्पर्श करता है, वह पवित्र हो जाता है। 12प्रभु ने मूसा से कहा, 13हारून के अभ्यंजन के दिन हारून और उसके पुत्र यह चढ़ावा अर्पित करेंगे - अन्न-बलि के रूप में प्रतिदिन एक सेर मैदा, आधा भाग प्रात : और आधा भाग सायंकाल। 14उस में तेल डाला जाये और वह तवे पर पकाया जाये। उसे टुकड़े-टुकड़े कर अन्न-बलि के रूप में चढ़ाया जाये। यह सुगन्धयुक्त चढ़ावा है, जो प्रभु को प्रिय है। 15हारून का वंशज जो अभ्यंजित याजक के रूप में उसका उत्तराधिकारी होगा, ऐसा ही करेगा। यह एक स्थ्रिस्थायी विधि है। यह चढ़ावा प्रभु के आदर में पूरा-का-पूरा भस्म कर दिया जायेगा। 16यह नियम याजक द्वारा अर्पित हर अन्न-बलि पर लागू है। वह नहीं खाया जा सकता। 17प्रभु ने मूसा से कहा, 18हारून और उसके पुत्रों से कहो : प्रायश्चित-बलि की विधि इस प्रकार है। जिस स्थान पर होम बलि के पशु का वध किया जाता है, वहीं प्रभु के सामने प्रायश्चित-बलि के प्शु का वध किया जाये। वह परमपवित्र है। 19जो याजक प्रायश्चित-बलि चढ़ाता है, वही उसे खाये। वह पवित्र स्थान पर, दर्शन-कक्ष के आँगन में उसे खाये। 20जो उसके मांस का स्पर्श करता है, वह पवित्र हो जाता है। यदि उसका रक्त किसी के वस्त्र पर लग जाये, तो उसे पवित्र स्थान पर ही धो दिया जाये। 21मिट्टी का वह बरतन तोड़ डाला जाये, जिस में उसे पकाया गया है। यदि वह किसी काँसे के बरतन में पकाया गया हो, तो उसे माँज कर पानी से धो देना चाहिए। 22याजकों के परिवारों में कोई भी पुरुष उसे खा सकता है। वह परमपवित्र है। 23परन्तु वह प्रायश्चित-बलि नहीं खायी जा सकती है, जिसका रक्त पवित्र-स्थान में प्रायश्चित-विधि सम्पन्न करने के लिए दर्शन कक्ष में लाया जाता है। वह अग्नि में जला दी जाये।