1''तुम अपने लिए देवमूर्तियाँ न बनाओ, न मूतियाँ और न स्तम्भ। तुम पूजा करने के लिए अपने देश में उत्कीर्ण पत्थर नहीं स्थापित करोगे। 2तुम मेरे विश्राम दिवस मनाओगे और मेरे पवित्र स्थान का सम्मान करोगे। मैं प्रभु हूँ। 3यदि तुम मेरी विधियों के अनुसार आचरण करोगे और मेरे आदेशों का पालन करोगे। 4तो मैं समय पर तुम को वर्षा प्रदान करूँगा, जिससे भूमि फसल और मैदान के पेड़ फल उत्पन्न करें। 5तुम्हारे यहाँ अंगूर तोड़ने के समय तक दँवरी होती रहेगी और तुम बोने के समय तक अंगूर तोड़ते रहोगे। तुम भरपेट रोटी खा कर तृप्त रहोगे और देश में सुरक्षित जीवन बिताओगे। 6मैं देश भर में शान्ति बनाये रखूँगा, जिससे तुम निर्भय हो कर सुख की नींद सो सको। मैं तुम्हारे देश में हिंसक जानवरों को निकालूँगा और युद्व की तलवार उसका विनाश नहीं करेगी। 7तुम अपने शत्रुओं को भगा दोगे और उन्हें तलवार के घाट उतारोगे। 8तुम्हारे पाँच उनके सौ को और तुम्हारे सौ उनके दस हजार को भगा देंगे। तुम अपने शत्रुओं को तलवार के घाट उतारोगे। 9मेरी कृपादृष्टि तुम पर बनी रहेगी। मैं तुम को सन्तान प्रदान करूँगा और तुम्हारी संख्या बढ़ाऊँगा और तुम्हारे लिए निर्धारित विधान बनाये रखूँगा। 10तुम पिछली फसल खाते रहोगे और नयी फसल रखने के लिए तुम को उसे निकालना पड़ेगा। 11मैं तुम्हारे बीच निवास करूँगा और तुम से विमुख नहीं हो जाऊँगा। 12मैं तुम्हारे बीच चलूँगा, मैं तुम्हारा ईश्वर होऊँगा और तुम मेरी प्रजा होगे। 13मैं प्रभु तुम्हारा वही ईश्वर हूँ, जो तुम्हें मिस्र देश से निकाल लाया है, जिससे तुम मिस्रियों के दास नहीं बने रहो। मैंने तुम्हारी दासता के बन्धन तोड़े हैं, जिससे तुम अपना सिर ऊँचा रख सको। 14परन्तु यदि तुम मेरी नहीं सुनोगे और मेरे सब आदेशों का पालन नहीं करोगे, 15मेरे निर्णयों को अस्वीकार करोगे, मेरी विधियों से घृणा करोगे, मेरे सब आदेशों के अनुसार आचरण नहीं करोगे और इस प्रकार मेरा विधान भंग करोगे, 16तो मैं तुम्हारे साथ ऐसा व्यवहार करूँगा : तुम्हारे ऊपर घोर विपत्तियाँ ढाहूँगा। क्षयरोग और तीव्र ज्वर तुम्हारी आँखों की ज्योति धुँधली और तुम्हारी जीवन-शक्ति क्षीण कर देंगे। तुम्हारे बीज बोना व्यर्थ जायेगा, क्योंकि तुम्हारे शत्रु तुम्हारी फ़सल खा जायेंगे। 17मैं तुम पर अप्रसन्न हो जाऊँगा, जिससे तुम्हारे शत्रु तुम्हें पराजित करेंगे। तुम्हारे बैरी तुम पर शासन करेंगे। तुम उस समय भी भागोगे, जब कोई तुम्हारा पीछा नहीं करेगा। 18यदि तुम इस पर भी मेरी नहीं सुनोगे, तो मैं तुम्हारे पापों के कारण तुम्हें सात बार दण्ड दूँगा। 19मैं तुम्हारा घमण्ड और बल तोड़ दूँगा। मैं तुम्हारे ऊपर का आकाश लोहे-जैसा और तुम्हारे देश की भूमि काँसे-जैसी बना दूँगा। 20तुम्हारा परिश्रम व्यर्थ जायेगा, क्योंकि भूमि तुम को अनाज नहीं देगी और देश के वृक्ष फल नहीं देंगे। 21यदि इस पर भी तुम मेरी नहीं सुनोगे और मेरे विरुद्ध आचरण करते रहोगे, तो मैं तुम्हारे पापों के कारण तुम्हारी विपत्तियों को सतगुना बढ़ाऊँगा। 22मैं तुम्हारे पास हिंसक जानवर भेजूँगा, जो तुम्हारे बाल-बच्चों को छीन लेंगे, तुम्हारे पशुओं को फाड़ेंगे और तुम्हारी जनसंख्या इतनी कम करेंगे कि तुम्हारी सड़कें सूनी हो जायेंगी। 23यदि इस पर भी तुम शिक्षा नहीं ग्रहण करोगे और मेरा विरोध करते रहोगे, 24तो मैं तुम्हारा विरोध करूँगा और तुम्हारे पापों के लिए सतगुना दण्ड दूँगा। 25मैं विधानभंग के कारण तुम्हारे पास तलवार भेजूँगा। यदि तुम नगरों में शरण लोगे, तो मैं वहाँ तुम्हारे बीच महामारी भेजूँगा और तुम अपने शत्रुओं के हवाले कर दिये जाओगे। 26मैं तुम्हारी रोटी इतनी कम कर दूँगा कि दस-दस स्त्रियाँ एक ही चूल्हें पर रोटियाँ बनायेंगी और तुम्हें तौल-तौल कर रोटियाँ देंगी, जिन्हें खा कर भी तुम तृप्त नहीं होगे। 27यदि इस पर भी तुम मेरी बात नहीं मानोगे और मेरा विरोध करते जाओगे, 28तो मैं कुद्ध हो कर तुम्हारा विरोध करूँगा और तुम को तुम्हारे पापों के लिए सतगुना दण्ड दूँगा। 29तब तुम अपने पुत्रों और अपनी पुत्रियों का मांस खाओगे। 30मैं तुम्हारे पहाड़ी पूजा-स्थानों का विनाश करूँगा, तुम्हारी धूप-वेदियाँ तोड़ दूँगा और तुम्हारी ध्वस्त देवमूर्तियों पर तुम्हारे शवों के ढेर लगाऊँगा। मैं तुम से घृणा करूँगा। 31मैं तुम्हारे चढ़ावों की सुगन्ध अस्वीकार करूँगा। 32मैं देश को इस प्रकार उजाड़ बना दूँगा कि तुम्हारे शत्रु, जो वहाँ बसने आयेंगे, विस्मित हो जायेंगे। 33मैं तुम्हें राष्ट्रों में बिखेर दूँगा और तुम्हारे विरुद्ध तलवार खींचूँगा। तुम्हारा देश उजाड़ और तुम्हारे नगर खँड़हर हो जायेंगे। 34''जब तक देश उजाड़ पड़ा रहेगा और तुम अपने शत्रुओं के यहाँ निवास करोगे, तब तक देश अपने विश्राम-वर्ष मनायेगा। तब देश विश्राम करेगा और अपने विश्राम-वर्ष मनायेगा। 35जितने समय तक देश उजाड़ पड़ा रहेगा, वह विश्राम करेगा और इस प्रकार उन विश्राम-दिवसों की कसर पूरी करेगा, जब उसे तुम्हारे रहते समय विश्राम नहीं मिला था। 36तुम लोगों में जो बच गये होंगे, मैं उन्हें उनके शत्रुओं के देश में इतना भयभीत कर दूँगा कि वे पवन द्वारा छितराये पत्तों की खड़खड़ाहट सुन कर भाग खड़े होंगे, मानो कोई तलवार लिये उनका पीछा कर रहा हो। वे मुँह के बल गिरेंगे, यद्यपि कोई उनका पीछा नहीं करता होगा। 37वे एक दूसरे पर गिरते-पड़ते भागेंगे, मानो वे तलवार से भाग रहे हों, यद्यपि कोई उनका पीछा नहीं करता। तुम अपने शत्रुओं का सामना नहीं कर पाओगे। 38तुम राष्ट्रों में नष्ट हो जाओंगे। तुम्हारे शत्रुओं का देश तुमको खा जायेगा। 39तुम में जो शेष रहेंगे, वे अपने और अपने पूर्वजों के पापों के कारण अपने शत्रुओं के देश में क्षीण होते जायेंगे। 40तब वे स्वीकार करेंगे कि उन्होंने और उनके पूर्वजों ने पाप किया, मेरे साथ विश्वासघात और बैर किया, 41जिससे मैंने भी उन से बैर किया और उन्हें उनके शत्रुओं के देश में निर्वासित किया। जब उनका पापी हृदय इस प्रकार विनम्र हो जायेगा और वे अपने अपराधों के लिए प्रायश्चित करेंगे, 42तो मैं याकूब, इसहाक और इब्राहीम के लिए निर्धारित अपने विधान का और देश का स्मरण करूँगा। 43परन्तु इस से पहले उनका देश से निर्वासित किया जाना आवश्यक है, जिससे देश उनकी अनुपस्थिति में अपने विश्राम-दिवस मनाये और वे अपने पापों के लिए प्रायश्चित करें; क्योंकि उन्होंने मेरे आदेशों का तिरस्कार किया और मेरी विधियों को अस्वीकार किया। 44लेकिन जब वे अपने शत्रुओं के देश में रहेंगे, तब भी मैं उनका इस तरह परित्याग नहीं करूँगा और उन से इतनी घृणा नहीं करूँगा कि मैं उनका सर्वनाश होने दूँ और उनके लिए निर्धारित विधान भंग करूँ। मैं प्रभु तुम्हारा ईश्वर हूँ। 45मैं उनके पूर्वजों को राष्ट्रों के देखते-देखते मिस्र से निकाल लाया। मैं उनके लिए निर्धारित विधान का स्मरण करूँगा और मैं, प्रभु उनका अपना ईश्वर होऊँगा। 46यही वे आदेश, विधियाँ नियम हैं, जिनके द्वारा प्रभु ने, मूसा के माध्यम से सीनई पर्वत पर इस्राएलियों के साथ अपना सम्बन्ध निर्धारित किया।