1प्रभु ने मूसा से कहा, 2''इस्राएलियों को आदेश दो कि वे प्रत्येक चर्मरोगी और प्रत्येक व्यक्ति को, जो स्राव से पीड़ित अथवा जो शव का स्पर्ष करने के कारण अपवित्र हो गया है, शिविर से बाहर कर दें। 3ऐसे लोगों को - चाहे पुरुष हों या स्त्रियाँ - बाहर कर दो। उन्हें शिविर से बाहर कर दो, जिससे शिविर अपवित्र न हो जाये, जिस में मैं तुम लोगों के बीच निवास करता हूँ।'' 4इस्राएलियों ने ऐसा ही किया और उन्हें शिविर से बाहर कर दिया। प्रभु ने मूसा को जैसा कह दिया था, इस्राएलियों ने वैसा ही किया। 5प्रभु ने मूसा से कहा, 6''इस्राएलियों से कहो कि यदि कोई पुरुष या स्त्री किसी के साथ अन्याय करता है और इस प्रकार ईश्वर के साथ विश्वासघात करता है, तो वह दोषी है। 7वह अपना पाप स्वीकार करे और अपने द्वारा की गयी हानि की पूरी क्षतिर्पूति करे और उस में पाँचवाँ हिस्सा जोड़ कर उस व्यक्ति को दे, जिसके साथ उसने अन्याय किया। 8यदि उस व्यक्ति का कोई निकट सम्बन्धी न हो, जिसे क्षतिर्पूति का द्रव्य दिया जा सके, तो वह द्रव्य प्रभु का है और वह याजक को क्षतिपूर्ति-यज्ञ के साथ दे दिया जाये। 9''जो चढ़ावे इस्राएली याजक के पास ले जाते हैं, उन सब का एक भाग याजक का होगा। 10हर एक का चढ़ावा चढ़ाने वाले का है, किन्तु वह याजक को जो देता है, वह याजक का होगा।'' 11प्रभु ने मूसा से कहा, 12''इस्राएलियों से कहो कि यदि किसी पुरुष की पत्नी पथभ्रष्ट हो कर उसके साथ विश्वासघात करते हुए 13परपुरुष के साथ प्रसंग करे और उसके पति को इसकी जानकारी न हो, क्योंकि दोष लगाने वाले साक्षी के अभाव के कारण उसका व्यभिचार छिपा रह गया 14और यदि पति को ईर्ष्या के कारण अपनी पत्नी पर सन्देह हो गया और वह पथभ्रष्ट हो- अथवा यदि वह ईर्ष्या के कारण अपनी पत्नी पर संदेह और वह निर्दोष हो- 15तो वह अपनी पत्नी को याजक के पास ले आये और उसके लिए चढ़ावे के रूप में दो सेर जौ का मैदा भी ले आये। वह उस चढ़ावे पर न तो तेल डाले और न लोबान ही रखे; क्योंकि वह ईर्ष्या की अन्न-बलि, पाप का स्मरण दिलाने वाला चढ़ावा है। 16''याजक स्त्री को प्रभु के सामने उपस्थित करने के लिए ले आये। 17वह मिट्टी के एक पात्र में आशिष का जल भरे और तम्बू के फ़र्ष की थोड़ी-सी धूल जल में डाल दे। 18इसके बाद याजक उस स्त्री को प्रभु के सामने खड़ा करे, उसके सिर के बाल खोल दे और उसके हाथ में पाप का स्मरण दिलाने वाला चढ़ावा, ईर्ष्या की अन्न-बलि रख दे और अपने हाथ में कड़वा शाप लाने वाला जल लिये रहे। 19तब याजक स्त्री को शपथ खिलाते हुए उस से कहे, यदि तुम्हारे साथ किसी परपुरुष का प्रसंग नहीं हुआ, यदि तुम पति के रहते पथभ्रष्ट और अपवित्र नहीं हुई हो, तो यह शाप लाने वाला कड़वा जल तुम्हारी कोई हानि नहीं करे। 20परन्तु यदि तुम पति के रहते हुए पथभ्रष्ट और अपवित्र हो गयी हो, क्योंकि परपुरुष का तुम्हारे साथ प्रसंग हुआ है- 21अब याजक यह कहते हुए स्त्री को अभिशाप की शपथ खिलाये - 'तो प्रभु तुम्हारा नाम अपने लोगों में घृणास्पद और अभिशप्त बना दे; वह तुम्हारी जाँघे धुलाये और तुम्हारा पेट फुला दे। 22यह शाप लाने वाला जल तुम्हारे अन्दर जा कर तुम्हारा पेट फुलाये और तुम्हारी जाँघें धुला दे। इस पर स्त्री कहे, 'ऐसा ही हो।' 23इसके बाद याजक एक काग़ज पर अभिशाप के ये शब्द लिख कर उन्हें कड़वे जल से धोये 24और वह अभिशाप लाने वाला कड़वा जल स्त्री को पिलायें, जिससे वह जल उसके शरीर में जा कर असह्य पीड़ा उत्पन्न करे। 25तब याजक ईर्ष्या की अन्न-बलि स्त्री के हाथ से ले ले और वेदी के पास जा कर उसे हिला-हिला कर प्रभु को अर्पित करे। 26वह उस में से समूची अन्न-बलि के प्रतीक के रूप में मुट्ठी-भर ले कर उसे वेदी पर जलाये। इसके बाद वह स्त्री को वह जल पिला दे। 27यदि उसने अपराध किया और अपने पति के साथ विश्वासघात किया, तो वह शाप लाने वाला जल, जो याजक उसे पिलाता है, उस में असह्य पीड़ा उत्पन्न करेगा। स्त्री का पेट फूल जायेगा, उसकी जाँघें धुल जोयेंगी और उसका नाम उसके लोगों में अभिशप्त हो जायेगा। 28यदि उस स्त्री ने अपराध नहीं किया और उसका आचरण निर्दोष रहा, तब उसे कुछ नहीं होगा और वह गर्भ धारण कर सकेगी। 29''यह ईर्ष्या की विधि है, जब कोई स्त्री पथभ्रष्ट और पति के रहते अपवित्र हो जाती है 30अथवा यदि पति के मन में ईर्ष्या उत्पन्न हो जाती है, क्योंकि वह अपनी पत्नी पर सन्देह करता हैं। वह उसे प्रभु के सामने उपस्थित करेगा और याजक उसके साथ वही करेगा, जो यहाँ लिखा है। 31पुरुष को अपराध नहीं लगता, पर स्त्री अपने अपराध का फल भोगेगी।''