1सारा समुदाय ये बातें सुन कर ज़ोर से चिल्लाने लगा और रात भर विलाप करता रहा। 2सभी इस्राएली मूसा और हारून के विरुद्ध भुनभुनाने लगे। सारे समुदाय ने उन से कहा, ''अच्छा होता कि हम मिस्र देश में ही मर गये होते या इसी उजाड़खण्ड में मर जाते। 3प्रभु हमें उस देश में क्यों ले जाना चाहता है? इसीलिए कि हम तलवार के घाट उतार दिये जायें और हमारी स्त्रियाँ और बच्चें शत्रुओं द्वारा लूट लिए जायें? हमारे लिए यही अच्छा होगा कि हम फिर मिस्र लौट जायें। 4वे आपस में कहने लगे, ''चलो, हम अपने लिए एक नेता चुन लें और फिर मिस्र लौट जायें।'' 5इस पर मूसा और हारून इस्राएलियों के सारे समुदाय के सामने मुँह के बल गिर पड़े। 6नून के पुत्र योशुआ और यफुन्ने के पुत्र कालेब ने, जो देश की टोह लेने वालों में थे, अपने वस्त्र फाड़ कर 7इस्राएलियों के सारे समुदाय से कहा, ''वह देश एक अनुपम देश है, जिसके निरीक्षण के लिए हम गये थे। 8यदि हम पर प्रभु की कृपा हुई, तो वह हमें उस देश में बसा देगा। सचमुच वह एक ऐसा देश है, जहाँ दूध और मधु की नदियाँ बहती हैं, 9परन्तु तुम प्रभु के विरुद्ध विद्रोह मत करो। उस देश के रहने वालों से मत डरो, क्योंकि हम उन्हें समाप्त कर देंगे। उनका कोई संरक्षक नहीं रहा। प्रभु हमारे साथ है, इसलिए उन से डरने का कोई सवाल नहीं उठता।'' 10इस पर सारा समुदाय उन्हें पत्थरों से मार डालने का उपक्रम करने लगा। तब प्रभु की महिमा दर्शन-कक्ष के ऊपर सब इस्राएलियों को दिखाई पड़ी 11और प्रभु ने मूसा से कहा, ''ये लोग कब तक मेरी निन्दा करते रहेंगे? मैंने इनके बीच कितने चमत्कार दिखाये; फिर भी वे मुझ में विश्वास नहीं करते। 12मैं इन पर महामारी भेज कर इनका विनाश करूँगा। फिर मैं तुम से एक ऐसा राष्ट्र उत्पन्न करूँगा, जो इन लोगों से महान् और शक्तिशाली होगा।'' 13इस पर मूसा ने प्रभु को उत्तर दिया, ''मिस्री जानते हैं कि तू बड़े सामर्थ्य के साथ इस्राएलियों को उनके देश से निकाल लाया है। 14उन्होंने इस देश के लोगों को भी यह बात बता दी है। उन्होंने यह भी सुना है कि तू, प्रभु! इस प्रजा के साथ रहता है; तू, प्रभु! इन्हें दर्शन देता है, तेरा बादल इनके ऊपर बना रहता है और कि तू दिन में बादल के खम्भे के रूप में और रात को अग्नि-स्तम्भ के रूप में इनके आगे-आगे चलता है। 15अब यदि तू इन लोगों का पूर्ण रूप से विनाश करेगा, तो वे राष्ट्र, जिन्होंने तेरी कीर्ति सुनी है, यह कहेंगे, 16प्रभु इन लोगों को उस देश में ले जाने में असमर्थ रहा, जिस में ले जाने का उसने शपथ खा कर वचन दिया था। इसलिए उसने उन्हें उजाड़खण्ड में ही मार डाला। 17इसलिए प्रभु! अपने सामर्थ्य का प्रदर्शन कर, जैसा कि तूने कहा है : 18प्रभु देर से क्रोध करता और अनुकम्पा का धनी है। वह अपराध और विरोध क्षमा करता है, किन्तु वह कोई पाप अनदेखा नहीं करता और पूर्वजों के अपराधों का दण्ड तीसरी-चौथी, पीढ़ी" तक उनकी सन्तति को देता है।" 19इसलिए तू अपनी महान् दया के अनुरूप इन लोगों का अपराध क्षमा कर, जैसा कि तू मिस्र से यहाँ तक करता आया है।'' 20इस पर प्रभु ने कहा, मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार कर उन्हें क्षमा करता हूँ। 21मेरे अस्तित्व की शपथ! समस्त पृथ्वी में व्याप्त प्रभु की महिमा की शपथ! 22जिन लोगों ने मेरी महिमा और मिस्र तथा मरूभूमि में मेरे चमत्कार देखे हैं, किन्तु जिन्होंने मेरी अवज्ञा करते हुए दस बार मेरी परीक्षा ली है, 23उन में एक भी उस देश के दर्शन नहीं करेंगे, जिसे मैंने शपथ खा कर उनके पूर्वजों को देने की प्रतिज्ञा की है। जिन्होंने मेरी निन्दा की है, उन में एक भी उस देश के दर्शन नहीं करेगा। 24मेरे सेवक कालेब का मनोभाव उन से भिन्न था। वह मेरा सच्चा अनुयायी बना रहा। मैं उसे वह देश पहुँचा दूँगा, जहाँ वह गया है और उसके वंशजों को वह देश विरासत के रूप में मिलेगा। 25अमालेकी और कनानी लोग तराइयों में रहते हैं ; इसलिए कल तुम मुड़ कर लाल समुद्र की ओर उजाड़खण्ड जाओ।'' 26प्रभु ने मूसा और हारून से यह कहा, 27''मैं कब तक इस दुष्ट समुदाय की शिकायतें सहन करता रहूँ? मैं इस्राएलियों से अपनी शिकायतें सुन चुका हूँ। 28उन्हें यह बता दो - प्रभु कहता है, “अपने अस्तित्व की शपथ! मैंने तुम लोगों को जो बातें कहते सुना है, उन्हीं के अनुसार मैं तुम्हारे साथ व्यवहार करूँगा। 29यहाँ इस मरूभूमि में तुम्हारे शव पड़े रहेंगे, क्योंकि तुम लोगों ने मेरी शिकायत की है। जितने लोगों के नाम जनगणना के समय लिखे गये थे और जिनकी आयु बीस के ऊपर है, 30उन में एक भी उस देश में प्रवेश नहीं करेगा, जहाँ मैंने हाथ उठा कर तुम्हें बसाने की शपथ ली है। यफुन्ने का पुत्र कालेब और नून का पुत्र योशुआ इसके एकमात्र अपवाद हैं। 31परन्तु मैं तुम्हारे छोटे बच्चों को वहाँ पहुँचा दूँगा, जिनके विषय में तुमने कहा था कि वे शत्रुओं की लूट में आ जायेंगे। वे उस देश के दर्शन करेंगे, जिसकी तुमने अवहेलना की है। 32परन्तु तुम्हारे शरीर इसी अजाड़खण्ड में धराषायी हो जायेंगे। 33तुम्हारे पुत्र चरवाहे होकर चालीस वर्ष तक उजाड़खण्ड में मारे-मारे फिरेंगे और इस प्रकार तुम्हारे विश्वासघात का फल तब तक भुगतेंगे, जब तक तुम्हारे शरीर उजाड़खण्ड में ढेर न हो जायें। 34तुम लोगों ने चालीस दिन तक उस देश का निरीक्षण किया। उनका हर दिन एक वर्ष गिना जायेगा। इसके अनुसार तुम्हें चालीस वर्ष तक अपने अपराधों का फल भुगतना पड़ेगा और तुम जान जाओगे कि मेरा विरोध करने का फल क्या होता है। 35मैं प्रभु यह कह चुका हूँ। इस दुष्ट समुदाय ने मेरा विरोध किया है। मैं इसके साथ यही व्यवहार करूँगा। यह इस मरूभूमि में समाप्त हो जायेगा। ये लोग सब-के-सब यहाँ मर जायेंगे।'' 36जिन लोगों को मूसा ने देश का भेद लेने भेजा था और जिन्होंने लौटने पर उस देश के विषय में झूठ बोलते हुए सारे समुदाय को उसके विरुद्ध भुनभुनाने के लिए उकसाया था, 37जो लोग उस देश के विषय में झूठ बोले थे, वे प्रभु के सामने महामारी से मर गये। 38जो लोग उस देश की टोह लगाने गये थे, उन में केवल नून का पुत्र योशुआ और यफुन्ने का पुत्र कालेब जीवित रह गये। 39जब मूसा ने ये बातें सब इस्राएलियों को सुनायीं, तब लोगों ने बहुत शोक मनाया। 40वे दूसरे दिन बड़े सबेरे उठ कर उस पहाड़ी प्रान्त की और चल पड़े और बोले, ''हमने पाप किया है, जिसके विषय में प्रभु ने प्रतिज्ञा की, हम उस स्थान पर जाने के लिए तैयार हैं।'' 41किन्तु मूसा ने उत्तर दिया, ''तुम प्रभु का आदेश भंग क्यों करते हो? तुम इस में सफल नहीं होगे।'' 42प्रभु तुम्हारे साथ नहीं है। इसलिए उधर मत जाओ, नहीं तो तुम्हारे शत्रु तुम्हें पराजित करेंगे। 43वहाँ अमालेकी और कनानी तुम्हारा सामना करेंगे और तुम तलवार के घाट उतार दिये जाओगे। तुम प्रभु से विमुख हो गये हो, इसलिए प्रभु तुम्हारे साथ नहीं होगा।'' 44लोगों ने पहाड़ी प्रदेश की ओर प्रस्थान किया, यद्यपि प्रभु के विधान की मंजूषा और मूसा शिविर में रह गये। 45तब पहाड़ी प्रदेश के रहने बाले अमालेकियों और कनानियों ने उतर कर उन्हें पराजित किया और होरमा तक भगा दिया।