1"आकाश मण्ड़ल! ध्यान दो; मैं बोलूगा। पृथ्वी! मेरे शब्दों को सुनो। 2मेरी शिक्षा वृष्टि की तरह फैले, मेरी वाणी ओस की तरह उतरे - घासस्थली पर मूसलाधार वर्षा की तरह, फ़सलों पर बौछार की तरह। 3मैं प्रभु के नाम की स्तुति करूँगा। हमारे ईश्वर की महिमा घोषित करो। 4वह हमारी चट्टान है। उसके सभी कार्य अदोष हैं। और उसके सभी मार्ग न्यायपूर्ण; क्योंकि ईश्वर सत्य प्रतिज्ञ है, उसमें अन्याय नहीं, वह न्यायी और निष्कपट है। 5उन्होंने उसके विरुद्ध पाप किया, इसके कारण वे उसके पुत्र नहीं रहे। वह एक दुष्ट और भ्रष्ट पीढ़ी है। 6मूर्ख और अविवेकी प्रजा! क्या प्रभु के साथ ऐसा व्यवहार उचित है? क्या वह तुम्हारा पिता नहीं, जिसने तुम्हें उत्पन्न किया? उसने तुमको बनाया और जीवन दिया। 7प्राचीन काल को याद करो, युग-युगों के वर्षों पर ध्यान दो। अपने पिता से पूछो, वह तुम्हें बतायेगा। बड़ों से पूछो, वे तुम्हें समझायेंगे 8जब सर्वोच्च प्रभु ने राष्ट्रों के देश निर्धारित किये और मनुष्यों को पृथ्वी पर बिखेर दिया, तो उसने ईश्वर के पुत्रों की संख्या के अनुसार राष्ट्रों की सीमाओं का निर्धारण किया। 9ईश्वर की विरासत है उसकी अपनी प्रजा, याकूब है उसका दायभाग। 10उसने उन्हें मरूभूमि में, भयानक निर्जन स्थान में पाया। उसने उन्हें सँभाला और शिक्षा प्रदान की, आँखों की पुतली की तरह उनकी रक्षा की। 11गरूड़ जिस तरह अपने नीड़ की रखवाली करता और अपने बच्चों के ऊपर मँडराता है, उसी तरह उसने अपने पंखों को फैला कर उन्हें उठाया और अपनें पंखों पर ले गया। 12प्रभु ही अपनी प्रजा का पथप्रदर्षक रहा। उसका कोई और देवता नहीं था। 13उसने उसे देश की पहाड़ियों पर बसाया, जिससे वह, खेतों की उपज खाये। वह उसे चट्टान का मधु चटाता और कड़े पत्थरों का तेल देता है। 14वह उसे गायों का मक्खन, भेड़ो का दूध, मेमनों की चरबी बाशान के बछड़े और बकरे और साथ-साथ उत्तम गेहूँ देता है। तुम लोग अंगूर के रस की मदिरा पीते हो। 15यषुरून खा-पी कर मोटा हुआ और लात मारने लगा, मोटा और हष्ट-पुष्ट हो कर मस्त हो गया। उसने ईश्वर को भुला दिया जिसने उसे बनाया था। वह अपने उद्धार की चट्टान का तिरस्कार करने लगा। 16उन्होंने अन्य देवताओं की पूजा कर प्रभु को चिढ़ाया और घृणित कार्यों से उसकी कोपग्नि प्रज्वलित की। 17उन्होंने ऐसे असुरों की पूजा की, जो ईश्वर नहीं है; ऐसे देवताओं की जिन्हें वे कभी नहीं जानते थे; ऐसे देवताओं की जो अभी-अभी प्रकट हुए थे; ऐसे देवताओं की जिन पर उनके पूर्वज श्रद्धा नहीं रखते थे। 18जिस चट्टान से तुम्हारी उत्पत्ति हुई है, उसे तुम लोग भूल गये। तुमने अपने सृष्टिकर्ता ईश्वर को भुला दिया। 19ईश्वर ने यह देखा और उसने क्रुद्ध हो कर अपने पुत्र-पुत्रियों को त्याग दिया। 20उसने कहा, ’मैं उन से अपना मुँह मोड़ लूँगा और यह देखूँगा कि उनका क्या होगा; क्योंकि यह एक दुष्ट पीढ़ी है यह एक विश्वासघाती सन्तति है। 21ऐसे देवताओं को मान कर, जो ईश्वर नहीं हैं, उन्होंने मुझे चिढ़ाया। तुच्छ देवमूर्तियों की पूजा कर उन्होंने मेरा अनादर किया। इसलिए मैं ऐसे लोगों द्वारा उन्हें चिढ़ाऊँगा, जो मेरी प्रजा नहीं हैं। मैं एक तुच्छ राष्ट्र द्वारा उनका अनादर कराऊँगा; 22क्योंकि मेरे क्रोध के कारण एक ऐसी अग्नि प्रज्वलित हो उठी, जो अधोलोक के तेल तक फैला गयी। वह पृथ्वी और उसकी समस्त उपज भस्म कर देगी और पर्वतों की नींव जलायेगी। 23मैं उन पर विपत्ति पर विपत्ति ढ़ाहूँगा; मैं उन्हें अपने तीरों का निषाना बनाऊँगा। 24जब वे भुखमरी से दुर्बल हो गये होंगे, महामारी से अशक्त और ताऊन से आक्रान्त, तो मैं उनके विरुद्ध जंगली जानवरों के दाँत और पृथ्वी पर रेंगने वाले सर्पों का विष भेजूँगा। 25तलवार सड़कों पर उसकी सन्तति मिटा देगी। उनके घरों में आतंक बना रहेगा। नवयुवकों और नवयुवतियों का वध किया जायेगा। पके बाल वाले बूढ़े और दूधमुँहे बच्चे समान रूप से मारे जायेंगे। 26मैंने कहा कि मैं उन्हें मिट्टी में मिला कर मनुष्यों में से उनकी स्मृति मिटा सकता हूँ; 27किन्तु तब उनके शत्रु शेखी मारते और उसका ग़लत अर्थ लगाते हुये कहते: ’यह हमारे बाहुबल की विजय है, इस में प्रभु ने हस्तक्षेप नहीं किया।’ 28वे एक नासमझ राष्ट्र हैं। उनमें विवेक का अभाव है। 29यदि वे बुद्धिमान् होते, तो यह बात समझते और उन्हें अपने भविष्य का ज्ञान होता। 30’यदि उनकी चट्टान ने उन्हें नहीं बेचा होता, यदि प्रभु ने उनका परित्याग नहीं किया होता, तो कैसे एक व्यक्ति एक हज़ार लोगों को खदेड सकता, कैसे दो व्यक्ति एक लाख लोगों को भगा सकते?’ 31हमारे शत्रुओं की चट्टान हमारी चट्टान जैसी नहीं हैं। हमारे शत्रु भी यह स्वीकार करते हैं। 32उनकी दाखलता सोदोम की दाखलताओं से, गोमोरा के खेतों से निकली है। उनकी अंगूर विष से भरे हुये हैं और उनके अंगूर गुच्छे कड़वे हैं। 33उनकी अंगूरी साँपो का विष, नाग का हलाहल है। 34क्या मैंने यह अपने पास नहीं रोक रखा है? क्या यह मेरे अन्तरतम में मुहरबन्द नहीं? 35जब उनके पैर फिसलेंगे, तो प्रतिशोध और बदला लेना मेरा अधिकार होगा, क्योंकि उन लोगों की विपत्ति का दिन निकट है और उनका सर्वनाश शीघ्र ही होगा। 36जब प्रभु देखेगा कि अपनी प्रजा कि सारी शक्ति शेष हो गई है। और उन मैं न कोई दास और न कोई स्वतन्त्र है, तब वह अपनी प्रजा को न्याय दिलायेगा और अपने सेवकों पर दया करेगा। 37तब वह कहेगा, ’अब कहाँ है उनके देवता? कहाँ है वह चट्टान, जिनके आश्रय में वह रहते थे? 38वे देवता, जो उनकी बलियों की चर्बी खाते और उनके अर्घों की अंगूरी पीते थे? जब वे उठकर तुम्हारी सहायता करें और तुम लोगों की रक्षा करें। 39अब समझो की मैं वही हूँ, मेरे सिवा और कोई देवता नहीं है। मैं ही जीवन और मरण का विधाता हूँ। मैं मारता भी हूँ और चंगा भी करता हूँ। मेरे हाथ से कोई किसी को छुड़ा नहीं सकता। 40मैं आकाश की ओर हाथ उठाकर कहता हूँः मैं अनन्त काल तक जीवित रहता हूँ 41जब मैं अपनी चमचमाती तलवार तेज़ कर चुका होऊँगा। और उसे न्याय करने के लिए हाथ में लूँगा तो मैं अपने विरोधियों का प्रतिकार करूँगा और अपने बैरियों को बदला चुकाऊँगा। 42मैं अपने बाणों को रक्त से मदोन्मत्त करूँगा और अपनी तलवार को मांस से तृप्त करूँगा: मृतकों और बन्दियों के रक्त से, शत्रु के झबरे सीरों के मांस से। 43राष्ट्रों! उसकी प्रजा का जयकार करो, क्योंकि वह अपने सेवकों के रक्त का बदला चुकायेगा। वह अपने शत्रुओं का प्रतिकार करेगा, वह अपने देश और अपनी प्रजा का शुद्धीकरण करेगा। 44मूसा ने नून के पुत्र योशुआ के साथ आकर यह भजन लोगों को सुनाया। 45जब मूसा इस्राएलियों के समस्त समुदाय को ये शब्द सुना चुका, 46तब वह उन से बोला, इन सब शब्दों को, जिन्हें मैंने आज तुम को सुनाया, अपने हृदय पर अंकित करो। अपने बच्चों को आदेश दो कि वे इस संहिता के सब शब्दों का सावधानी से पालन करें। 47ये तुम्हारे लिए निरे शब्द नहीं हैं, बल्कि इन पर तुम्हारा जीवन निर्भर है। इन का पालन करने से तुम दीर्घ काल तक उस देश में जीवित रहोगे, जिसे अपने अधिकार में करने तुम यर्दन पार करने वाले हो। 48उसी दिन प्रभु ने मूसा से कहा, 49"इस अबारीम पर्वतश्रेणी के नेबो पर्वत पर चढ़ो, जो मोआब देश में येरीखो के पूर्व में है और कनान देश को देखो, जिसे मैं इस्राएलियों के अधिकार में देता हूँ। 50उस पर्वत पर चढ़ने पर वहाँ तुम्हारी मृत्यु हो जायेगी और तुम अपने पूर्वजों से जा मिलोगे, जैसे तुम्हारे भाई हारून की मृत्यु होर पर्वत पर हुई थी और वह अपने पूर्वजों से जा मिला था; 51क्योंकि तुम दोनों ने इस्राएलियों के सामने मेरी पवित्रता का सम्मान नहीं किया। 52तुम वहाँ से देश तो देखोगे, किन्तु तुम उस देश में प्रवेश नहीं करोगे जिसे मैं इस्राएलियों को दे रहा हूँ।"