1मिस्र के यहूदी भाइयों को नमस्कार। येरूसालेम और यहूदियों में रहने वाले यहूदी भाइयों की ओर से शांति और कुशलक्षेम की शुभकामनाएँ! 2ईश्वर आपका भला करे और अपने उस विधान का ध्यान रखे, जो उसने अपने भक्त सेवक इब्राहीम, इसहाक और याकूब के लिए निर्धारित किया था। 3वह आप सब को ऐसा मनोभाव प्रदान करे कि आप उसकी आराधना करते रहें और सारे हृदय और मन से उसकी आज्ञाओं का पालन करें। 4वह आपके हृदय में अपनी संहिता और आज्ञाओं के प्रति प्रेम भर दे, आप को शांति प्रदान करे, 5आपकी प्रार्थनाएँ स्वीकार कर ले, आप को क्षमा कर दे और विपत्ति के समय आपका त्याग न करें। 6हम इस समय आपके लिए यही प्रार्थना करते हैं। 7एक सौ उनहत्तरवें वर्ष, जब देमेत्रियस राज्य कर रहा था, हम यहूदियों ने आप को यह लिखा था: इन दिनों हम पर घोर विपत्तिया पड़ी हैं। यासोन और उसके अनुयायियों ने पवित्र देश और राज्य के विरुद्ध विद्रोह किया, 8मंदिर का फाटक जलाया और निर्दोष रक्त बहाया है। तब हमने प्रभु से प्रार्थना की और उसने हमारी सुनी। हमने होम-बलि और अन्न बलि चढायी, दीप जलाये और भेंट की रोटियाँ मंदिर में रख दी। 9अब हम आप को फिर पत्र लिखकर एक सौ अठासीवें वर्ष के किसलेव महीने में शिविर-पर्व मनाने का अनुरोध करते हैं। 10अरिस्तोबूलस को (जो अभ्यंजित याजकों के वंशज तथा राजा पतोलेमेउस के गुरू है) और मिस्र के निवासियों तथा यूदाह और परिषद का नमस्कार। आप स्वस्थ और सानंद रहें। 11ईश्वर ने घोर विपत्तियों से हमारी रक्षा की और वह राजा के विरुद्ध हमारा सहायक रहा, इसलिए हम उसके बहुत कृतज्ञ हैं। 12उसने स्वयं उन लोगों को भगा दिया, जो पवित्र नगर पर आक्रमण करने आये थे। 13उस सेना का सेनापति एक ऐसी सेना ले कर, जो अजेय-जैसी लगती थी, फारस गया था और वहाँ ननैया देवी के मंदिर पुजारियों द्वारा टुकडे-टुकडे कर दिया गया। 14अन्तियोख देवी के साथ विवाह करने के बहाने अपने सहचारों के साथ वहाँ आया। उसने सोचा कि इस तरह दहेज रूप में मंदिर की भारी संपत्ति उनके हाथ आ जायेगी। 15ननैया के पुजारियों ने मंदिर की सम्पत्ति निकाल कर प्रदर्शित की और अंतियोख ने थोड़े ही लोगों के साथ मंदिर के क्षेत्र में प्रवेश किया। उसके प्रवेश करते ही पुजारियों ने द्वार बंद कर दिया। 16फिर वे छत का गुप्त दरवाजा खोल कर उन पर पत्थर फेंकने लगे और सेनापति को और उसके आदमियों को मार गिराया। इसके बाद उन्होंने अन्तियोख के टुकडे-टुकडे कर और उसके सिर काट कर उन्हें बाहर खडे लोगों के सामने फेंक दिया। 17ईश्वर सदा-सर्वदा धन्य है। उसने विधर्मियों को मृत्यु के हवाले कर दिया। 18किसलेव मास के पच्चीसवें दिन हम मंदिर के शुद्धीकरण का उत्सव मना रहे हैं। आप को इसकी सूचना देना हमने उचित समझा, जिससे आप शिविर-पर्व और उस अग्नि का स्मरणोत्सव मनायें, जो उस समय प्रकट हुई, जब मंदिर और वेदी के निर्माता नहेम्या बलिदान चढ़ाते थे। 19जब हमारे पूर्वज फारस में निर्वासित किये जा रहे थे, तो उस समय के भक्त याजकों ने चुपके से वेदी की अग्नि को सूखे कुँए की एक ऐसी गुफा में छिपा दिया, जिसका पता किसी को नहीं चल सका, 20बहुत वर्ष बाद ईश्वर को यह उचित जान पड़ा कि फारस के राजा द्वारा वापस भेजे हुए नहेम्या ने उन याजकों के वंशजों को बुला भेजा, जिन्होंने आग छिपायी थी और उसे ले आने का आदेश दिया। लेकिन उन्होंने आ कर कहा कि हमें वहाँ आग नहीं, बल्कि गंदला पानी मिला, 21जब बलिदान की पूरी सामग्री रखी जा चुकी, तो नहेम्या ने याजकों से कहा कि वे लकडी और उस पर रखे हुए चढ़ावों पर वह पानी उँडेलें। 22उन्होंने वैसा ही किया। कुछ देर बाद बादलों के हट जाने से हट जाने से सूर्य प्रकट हुआ और वेदी पर से आग की लपटें ज़ोरों से उठने लगीं। सब लोग आश्यर्च करने लगे। 23जिस समय होमबलि जल रही थी, याजक और सभी लोग प्रार्थना कर रहे थे। योनातान पहले प्रार्थना सुनाते थे और अन्य लोग नहेम्या के साथ उसके शब्द दोहराते थे। 24प्रार्थना इस प्रकार थी: "प्रभु! प्रभु-ईश्वर! सब के सृष्टा! भीषण, शक्तिशाली, न्यायी और करूणामय! तू ही राजा, तू ही भला है। 25तू ही दाता है, तू ही न्यायी है, सर्वशक्तिशाली और शाश्वत है। तू सभी विपत्तियों से इस्राएल की रक्षा करता है। तूने हमारे पूर्वजों को चुना और पवित्र किया। 26तू अपनी समस्त प्रजा इस्राएल के लिए चढ़ाया हुआ यह बलिदान स्वीकार कर। तू अपनी विरासत सुरक्षित रख और उसे पवित्र कर। 27हमारे निर्वासितों को एकत्र कर। जो गैर-यहूदी राष्ट्रों में दास हैं, उन्हें मुक्त कर। जो तिरस्कृत और उपेक्षित हैं, उन पर दयादृष्टि कर, जिससे गै़र-यहूदी राष्ट्र जान जायें कि तू हमारा ईश्वर है। 28जो लोग हम पर अत्याचार करते और घमण्ड के आवेश में हमारा अपमान करते हैं, तू उन्हें दण्डित कर। 29जैसा मूसा ने कहा था, तू अपनी प्रजा को फिर इस पवित्र भूमि पर स्थापित कर।" 30इसके बाद याजक भजन गाते थे। 31जब होम-बलि जल चुकी थी, तो नहेम्या ने बचा हुआ पानी बडे़ पत्थरों पर उँड़ेलने का आदेश दिया। 32जैसे ही ऐसा किया गया, पत्थरों से एक ज्वाला निकली, जो होम-बलि की वेदी से उठने वाली प्रखर ज्योति में विलीन हो गयी। 33इस घटना की चर्चा फैल गयी। फारसियों के राजा को भी बताया गया कि उस स्थान पर, जहाँ याजकों ने आग छिपा रखी थी, वहाँ वह पानी मिला था, जिस से नहेम्या और उसके साथियों ने होम-बलि की सामग्री का शुद्धीकरण किया था। 34इस पर राजा ने घटना की जाँच कराने के बाद वह स्थान घेर दिया और उसे पवित्र घोषित किया। 35राजा को उस स्थान से बहुत आमदनी होती थी और उस में से वह उन लोगों को एक बड़ा हिस्सा देता, जिन्हें उसने उस स्थान की देखरेख का प्रबंध सौंपा था। 36नहेम्या के आदमियों ने उस द्रव का नाम ’नफ़थार’ रखा, जिसका अर्थ है- शुद्धीकरण। प्रायः लोग इसे ’नफ़थाय’ कहते हैं।