1इसके उत्तर में शूही बिलदद ने कहाः 2तुम कब तक ऐसी बातें करते रहोगे? तुम्हारे शब्द प्रचण्ड वायु-जैसे हैं। 3क्या ईश्वर न्याय भ्रष्ट करता है? क्या सर्वशक्तिमान् अन्याय करता है? 4तुम्हारे पुत्रों ने उसके विरुद्ध पाप किया और उसने उन्हें पाप का दण्ड दिया। 5यदि तुम ईश्वर की शरण जाओगे, यदि तुम सर्वशाक्तिमान् से प्रार्थना करोगे, 6और यदि तुम निर्दोष और निष्कपट हो, तो वह तुम्हारी रक्षा करेगा और तुम्हें न्याय दिलायेगा। 7तुम्हारा भविष्य इतना उज्ज्वल होगा कि तुम्हारी पिछली दशा बहुत साधारण लगेगी। 8पुरानी पीढ़ियों से पूछो, पूर्वजों के अनुभव पर ध्यान दो। 9हम तो कल के हैं और कुछ नहीं जानते। हमारा जीवन पृथ्वी पर छाया की तरह बीतता है। 10किंतु वे तुम्हें शिक्षा देंगे और समझायेगे; वे अपने अनुभव की चर्चा करेंगे। 11क्या पटेर कछार के बिना उग सकती है? क्या सरकण्डा पानी के बिना पनप सकता है? 12हरा सरकण्डा कट जाने से पहले भी अन्य घासों की अपेक्षा जल्दी सूख जाता है। 13यही हाल उन सब का होता है, जो ईश्वर को भूल जाते है। इसी प्रकार विधर्मी की आशा नष्ट हो जाती है। 14उसका भरोसा तन्तु की तरह है और उसकी आशा मकड़ी के जाले की तरह। 15वह अपने घर का भरोसा रखता, किंतु टिक नहीं पाता। वह उस पर हाथ रखता, किंतु वह ढह जाता है। 16वह पौधे की तरह धूप में हरा-भरा है, उसकी टहनियाँ पूरी वाटिका में फैली हैं, 17उसकी जड़े पत्थरों से भी चिपकती हैं। वह चट्टानों के बीच भी पनपता है, 18किंतु जब वह उखाड़ा जाता, तो उनका पुराना स्थान उसे अस्वीकार कर देता है। 19देखो, उसका भाग्य यही है, उसके स्थान पर दूसरे पौधे उग जाते हैं। 20देखो, ईश्वर न तो निर्दोष व्यक्ति का परित्याग करता और न विधर्मी को सहारा देता है। 21तुम्हारे चेहरे पर फिर हँसी खिल उठेगी और तुम्हारे होंठ आनंद के गीत गायेंगे। 22तुम्हारे शत्रु लज्जित होंगे और दुष्टों के तम्बू उखड़ जायेंगे।