1मेरा मन टूट गया है, मेरे दिन समाप्त हो रहे हैं, मेरी लिए कब्र ही बाकी है। 2मेरे निंदक मेरे चारों ओर खड़े हैं, उनका उपहास मुझे सोने नहीं देता। 3प्रभु! तू ही मेरे लिए जमानत दे, मेरे लिए ऐसा कोई भी नहीं करेगा। 4तूने उनकी बुद्धि कुण्ठित कर दी, इसलिए तू उन्हें विजय नहीं दिला। 5जो मनुष्य झूठ बोलकर अपने मित्र की सम्पत्ति हरता है, वह दोषी है और उसकी सन्तान दुःख में दिन काटेगी। 6मैं सब के लिए उपहास का पात्र बन गया हूँ लोग मेरे मुँह पर थूकते हैं। 7मेरी आँखें दुःख के कारण धुंधला गयी है। मेरे अंग घुल कर छाया मात्र हो गये हैं। 8धर्मी लोग यह देख कर दंग रह जाते हैं और निर्दोष के मन में पाखण्डी के प्रति क्षोम उत्पन्न होता है, 9फिर भी धर्मात्मा अपने मार्ग से नहीं भटकेगा; जिसने हाथ निर्दोष है, उसका बल बढ़ता ही जायेगा। 10तुम सब आओं और अपने तर्क फिर प्रस्तुत करो। तुम लोगों में एक बुद्धिमान् नहीं मिलेगा। 11मेरे दिन बीत चुके हैं, मेरी योजनाएँ और मेरे मन के सभी स्वप्न मिट गये हैं। 12किंतु वे रात को दिन में बदलते है। वे कहते हैं कि प्रकाश हाने वाला हैं, जबकि अंधकार छा जाता है। 13मुझे कोई आशा नहीं रही। अधोलोक मेरा आवास है, जहाँ मेर बिस्तर बिछाया गया है। 14मैं कब्र से बोला, "तू मेरा पिता है!" कीड़ों से, "तुम मेरी माँ या बहनें हो!" 15इसलिए कहाँ है मेरी आशा? मेरा सौभाग्य कौन देख सकता है? 16वे मेरे साथ अधोलोक में उतरेंगे। वे मेरे साथ मिट्टी में मिल जायेंगे।