1सर्वशाक्तिमान् न्याय का दिन क्यों नहीं निर्धारित करता? उसके भक्त उसके दिन क्यों नहीं देखते? 2दुर्जन खेतों के सीमा-पत्थर खिसकाते हैं और चुराये हए झुण्ड चराते हैं। 3वे अनाथों का गधा हाँक कर ले जाते हैं और विधवा के बैल को बंधक के रूप में रखते हैं। 4वे गरीब को मार्गों से भगाते हैं, देश के सभी दरिद्र छिपने को बाध्य हो जाते हैं, 5जिससे वे मुँह अंधेरे निकल कर भोजन की खोज में जंगली गधों की तरह उजाड़खण्ड में भटकते-फिरते हैं। उस से उनके बच्चों का निर्वाह होता है। 6वे रात को लुने हुए खेतों में सिल्ला बीनते और दुष्ट की दाखबारी में बचे हुए अंगूर तोड़ते हैं। 7वे कपड़ों के अभाव में रात को नंगे पड़े रहते हैं। जाडें में भी उनके पास ओढ़ने को कुछ नहीं। 8वे पर्वतों की वर्षा से भीगते और आश्रय के अभाव में चट्टान पर पड़े रहते हैं। 9दुर्जन पितृहीन बच्चों को उनकी माता की गोद से छीनते हैं और दरिद्र की संतान को बंधक के रूप में रखते हैं। 10गरीब कपड़ों के अभाव में नंगे घूमा करते हैं। वे दूसरों के पूले ढोते और स्वयं भूखे रहते हैं। 11वे दूसरों के यहाँ तेल पेरते और अंगूर रौंदते हुए भी प्यासे रहते हैं। 12शहरों में मरने वाले विलाप करते और घायल सहायता के लिए पुकारते हैं, किन्तु ईश्वर इस बात पर ध्यान नहीं देता। 13दुर्जन ज्योति के विरुद्ध विद्रोह करते, उसे पीठ दिखाते और उसकी उपेक्षा करते हैं। 14हत्यारा मुँह अँधेरे उठ कर दरिद्र का वध करता और रात को चारी करने जाता है। 15व्यभिचारी की आँखें झुटपुटे की राह देखती हैं। वह सोचता हैं, "मुझे कोई नहीं देख पायेगा" और वह अपने चेहरे पर परदा डालता है। 16वे अँधेरे में घरों में सेंध मारते और दिन में छिपे रहते हैं। वे प्रकाश में किनारा काटते हैं। 17भोर उनके लिए मृत्यु ही छाया-जैसा है। घोर अंधेरा उनका सखा है। 18वे पानी पर बहते तिनके के सदृश हैं। उनकी भूमि लोगों द्वारा अभिशप्त है और उनकी दाखबारी में कोई नहीं जाता। 19जिस तरह सूखी भूमि पर गरमी पिघली बर्फ सोख लेती है, उसी तरह अधोलोक पापी को निगलता है। 20उसकी माता उसे भुला देती है, उसे कीडे खा जाते हैं, उसे कोई नहीं याद करता। दुष्ट पेड़ की तरह काट दिया जाता है। 21उसने बांझ का शोषण किया और विधवा के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। 22किंतु जब ईश्वर उठता है, जो शक्तिशालियों को भी ले जाता है, तो उसे जीवित रहने की आशा नहीं। 23फिर भी ईश्वर उसे सुरक्षा में रहने देता, किंतु उसकी आँखों उसके आचरण का निरीक्षण करती रहती हैं। 24वह थोड़े समय तक फलता-फूलता और समाप्त हो जाता है। वह कटे हुए पौधे की तरह अचानक ढेर हो जाता है। वह अनाज की बाल की तरह कट जाता है। 25यदि ऐसा नहीं, तो कौन मुझे झूठा प्रभामिण करेगा और मेरे तर्कों का खण्डन करेगा?