स्तोत्र

अध्याय 12

2(1-2) प्रभु! रक्षा कर! एक भी भक्त नहीं रहा; मनुष्यों में सत्य का लोप हो गया है। 3लोग एक दूसरे से झूठ बोलते और कपटपूर्ण हृदय से चिकनी-चुपड़ी बातें करते हैं। 4प्रभु चाटुकारों और डींग मारने वालों का सर्वनाश करे, जो कहते हैं, 5"हम अपनी वाणी के बल पर विजयी होंगे। हम जो चाहेंगे, वही कहेंगे। हमारा प्रभु कौन है?" 6प्रभु कहता है, "मैं अब उठूँगा, क्योंकि असहाय सताये जाते हैं और दरिद्र आह भरते हैं। जो तिरस्कृत हैं, मैं उनका उद्धार करूँगा।" 7प्रभु की वाणी परिशुद्ध है। वह चाँदी के सदृश है, जो सात बार घड़िया में गलायी गयी है। 8प्रभु! तू ही हमें सुरक्षित रखेगा और इस पीढ़ी से हमारी रक्षा करता रहेगा। 9दुष्ट जन चारों ओर मंडराते हैं और मनुष्यों में नीचता का बोलबाला है।