स्तोत्र

अध्याय 22

2(1-2) मेरे ईश्वर! मेरे ईश्वर! तूने मुझे क्यों त्याग दिया? तू मेरी पुकार सुन कर मेरा उद्धार क्यों नहीं करता? 3मेरे ईश्वर! मैं दिन में पुकारता हूँ और तू उत्तर नहीं देता; मैं रात में पुकारता हूँ और मुझे शान्ति नहीं मिलती, 4यद्यपि तू मन्दिर में विराजमान है। इस्राएल तेरा स्तुतिगान करता है। 5हमारे पूर्वजों को तेरा भरोसा था; उन्होंने तुझ पर भरोसा रखा और तूने उनका उद्धार किया। 6उन्होंने तेरी दुहाई दी और तूने उन्हें मुक्त किया। उन को तेरा भरोसा था और तूने उन्हें निराश नहीं होने दिया। 7परन्तु मैं मनुष्य नहीं, कीट हूँ; मनुष्यों द्वारा तिरस्कृत, लोगों द्वारा परित्यक्त। 8मुझे जो भी देखते हैं, मेरा उपहास करते हैं; वे सिर हिलाते हुए मेरी हंसी उड़ाते हैं। 9"उसने प्रभु पर भरोसा रखा, वही अब उसे बचाये; यह वह उसे प्यार करता है, तो वह उसे छुड़ाये"। 10तूने मुझे गर्भ से निकाला और माता की गोद में सुरक्षित रखा। 11मैं जन्म से ही तुझ अर्पित किया गया; माता के गर्भ से ही तू मेरा रक्षक है। 12मुझ से दूर न जा, क्योंकि विपत्ति निकट है और मेरा कोई सहायक नहीं। 13बहुत-से सांड़ मेरे चारों ओर खड़े हैं; बाशान प्रदेश के सांड़ मुझे घेर रहे हैं। 14वे भूखे और गरजते सिंह की तरह मुझे फाड़ खाने के लिए खड़े हैं। 15मैं पानी की तरह बह गया; मेरी सब हडिडयाँ जोड़ से उखड़ गयी हैं। मेरा हृदय मोम की तरह मेरे सीने में पिघल रहा है। 16मेरी शक्ति ठीकरे की तरह सूख गयी; मेरी जिह्वा तालू से चिपक गयी। वे मुझे मृत्यु की धूल में मिलाने जा रहे हैं। 17कुत्ते मुझे घेर रहे हैं; कुकर्मियों का दल मेरे चारों ओर खड़ा है। वे मेरे हाथ-पैर छेद रहे हैं। 18मैं अपनी एक-एक हड्डी गिन सकता हूँ। वे मुझे देखते और घूरते रहते हैं। 19वे मेरे वस्त्र आपस में बाँटते और मेरे कुरते पर चिट्ठी डालते हैं। 20प्रभु! मुझ से दूर न जा। तू मेरा बल है; शीघ्र ही मेरी सहायता कर। 21मेरी आत्मा को तलवार से बचा, मेरे प्राणों को कुत्तों के पंजों से। 22मुझे सिंह के जबड़े से छुड़ा, मेरे प्राणों की जंगली सांडों के सींगों से। 23मैं अपने भाइयों के सामने तेरे नाम का बखान करूँगा, मैं सभाओं में तेरा स्तुतिगान करूँगा। 24प्रभु के श्रद्धालुु भक्तों! उसकी स्तुति करो। याकूब के वंशजों! उसकी महिमा गाओ। इस्राएल के सब वंशजों! उस पर श्रद्धा रखो; 25क्योंकि उसने दीन-हीन का तिरस्कार नहीं किया, उसे उसकी दुर्गति से घृणा नहीं हुई, उसने उस से अपना मुख नहीं छिपाया, उसने उसकी पुकार पर ध्यान दिया। 26मैं तुझ से प्रेरित हो कर भरी सभा में तेरा गुणगान करूँगा। मैं प्रभु-भक्तों के सामने अपनी मन्नतें पूरी करूँगा। 27जो दरिद्र हैं, वे खा कर तृप्त हो जायेंगे; जो प्रभु की खोज में लगे हैं, वे उसकी स्तुति करेंगे। उनका हृदय सदा-सर्वदा जीवित रहे। 28समस्त पृथ्वी प्रभु का स्मरण करेगी और उसकी ओर अभिमुख हो जायेगी। सभी राष्ट्र उसे दण्डवत् करेंगे; 29क्योंकि प्रभु ही राजा है। वही राष्ट्रों का शासन करता है। 30पृथ्वी के सभी शासक उसी के सामने नमस्तक होंगे। सभी मनुष्य उसी की आराधना करेंगे। मैं उसके लिए जीवित रहूँगा। 31मेरा वंश उसकी सेवा करता रहेगा। वह आने वाली पीढ़ी के लिए प्रभु के कार्यों का बखान करेगा 32और जिन लोगों का अब तक जन्म नहीं हुआ, उनके लिए प्रभु का नाम घोषित करेगा।