2(1-2) ईश्वर हमारा आश्रय और सामर्थ्य है। वह संकट में सदा हमारा सहचर है। 3इसलिए हम नहीं डरते-चाहे पृथ्वी काँप उठे, चाहे पर्वत समुद्र के गर्त में डूब जायें, 4चाहे सागर की प्रचण्ड लहरें फेन उगले और पर्वत उनकी टक्कर से हिल जायें 5एक नदी की धाराएँ ईश्वर के नगर को सर्वोच्च ईश्वर के पवित्र निवासस्थान को आनन्द प्रदान करती हैं। 6ईश्वर उस नगर में रहता है, वह कभी पराजित नहीं होगा। ईश्वर प्रातःकाल उसकी सहायता करेगा। 7राष्ट्रों में खलबली मची हुई है, राज्य डग-मगाते हैं। प्रभु की वाणी सुन कर पृथ्वी पिघलती है 8विश्वमण्डल का प्रभु हमारे साथ है, याकूब का ईश्वर हमारा गढ़ है। 9आओ! प्रभु के महान कार्यों का मनन करो वह पृथ्वी पर अपूर्व चमत्कार दिखाता है। 10वह पृथ्वी भर के युद्धों को शान्त करता वह धनुष को तोड़ता, भाले के टुकड़े-टुकड़े करता और युद्ध-रथों को अग्नि में भस्म कर देता है। 11"शान्त हो और जान लो कि मैं ही ईश्वर हूँ, मैं राष्ट्रों और पृथ्वी पर विजयी हूँ"। 12विश्वमण्डल का प्रभु हमारे साथ है, याकूब का ईश्वर हमारा गढ़ है।