स्तोत्र

अध्याय 64

2(1-2) ईश्वर! संकट में मेरी पुकार सुन। शत्रु के आतंक से मेरे प्राणों की रक्षा कर। 3दुष्टों के षड़यन्त्र से, कुकर्मियों के अत्याचार से मेरी रक्षा कर। 4उन्होंने अपनी जिह्वा को तलवार की तरह तेज किया और अपने विषैले शब्दों का निशाना बाण की तरह बाँधा है। 5वे छिप कर धर्मी मनुष्य को मारते हैं। वे अचानक मारते हैं और किसी से नहीं डरते। 6वे बुराई करने के लिए एक दूसरे को प्रोत्साहन देते हैं। वे जाल छिपाने के लिए आपस में परामर्श करते और कहते हैं: "हमें कौन देखेगा?" 7वे कुकर्मों की योजना बनाते हैं और अपना कुचक्र छिपाये रखते हैं। मनुष्य का हृदय अपने अन्तरतम में अथाह है। 8किन्तु ईश्वर ने उन पर बाण छोड़ा है, वे अचानक घायल हो गये हैं। 9उनकी जिह्वा ने उनका विनाश किया है। उन्हें देख कर सब अपना सिर हिलाते हैं। 10और भयभीत हो जाते हैं। वे ईश्वर के इस कार्य की घोषणा करते और इस से शिक्षा ग्रहण करते हैं। 11धर्मी प्रभु में आनन्द मनाये, वह उसकी शरण जाये। इस से सब निष्कपट लोग अपने को धन्य मानेंगे।