1समस्त पृथ्वी! ईश्वर का जयकार करो! 2उसके प्रतापी नाम का गीत गाओ और उसकी महिमा का स्तुतिगान करो। 3ईश्वर से यह कहो: "तेरे कार्य अपूर्व हैं। तेरे अपार सामर्थ्य को देख कर तेरे शत्रु चाटुकारी करते हैं। 4समस्त पृथ्वी तुझे दण्डवत् करती है, वह तेरे नाम का स्तुतिगान करती है।" 5आओ! ईश्वर के कार्यों का ध्यान करो- उसने पृथ्वी पर अपूर्व कार्य किये हैं। 6उसने समुद्र को स्थल में बदल दिया। उन लोगों ने नदी को पैदल ही पार किया; इसलिए हम उसके नाम पर आनन्द मनायें। 7वह अपने सामर्थ्य द्वारा सदा शासन करता और राष्ट्रों पर दृष्टि दौड़ाता है, जिससे विद्रोही फिर सिर न उठायें। 8राष्ट्रों! हमारे ईश्वर को धन्य कहो, उच्च स्वर में उसका स्तृतिगान करो, 9जिसने हमें जीवन प्रदान किया, जिसने हमारे पैरों को फिसलने नहीं दिया। 10ईश्वर! तूने हमारी परीक्षा ली और चाँदी की तरह हमारा परिष्कार किया है। 11तूने हमें जाल में फँसाया और हमें बहुत कष्ट दिलाया। 12तूने हमारे साथ लद्दू जानवरों-सा व्यवहार होने दिया। हमने आग और पानी में प्रवेश किया; किन्तु तूने हमें निकाल कर सुख-चैन दिया। 13मैं होम-बलियाँ लिए तेरे मन्दिर में प्रवेश करता हूँ। मैं तेरे लिए वे मन्नतें पूरी करता हूँ, 14जो संकट के समय मेरे होंठों से निकलीं, जिनका मेरे मुख ने उच्चारण किया। 15मैं मेढ़ों की सुगन्धित बलि के साथ तुझे मोटे जानवरों की होम-बलि चढ़ाता हूँ। मैं साँड़ और बकरे चढ़ाता हूँ। 16प्रभु के समस्त श्रद्धालु भक्तों! आओं। मैं तुम्हें बताऊँगा कि उसने मेरे लिए क्या-क्या किया है। 17मैंने उसे ऊँचे स्वर से पुकारा और उसकी प्रशंसा में गीत सुनाया। 18यदि मेरे मन में बुराई होती, तो ईश्वर ने मेरी न सुनी होती। 19किन्तु ईश्वर ने वास्तव में मेरी सुनी, उसने मेरी प्रार्थना पर ध्यान दिया। 20धन्य है ईश्वर ! उसने मेरी प्रार्थना नहीं ठुकरायी; उसने मुझे अपने प्रेम से वंचित नहीं किया।