2(1-2) ईश्वर! मेरी रक्षा कर; जलप्रवाह मेरे गले तक आ रहा है। 3मैं दलदल के कीच में धँसता जा रहा हूँ; मेरे पैर नहीं टिक पाते। मैं गहरे जल में पड़ गया हूँ; लहरें मुझे डुबा कर ले जा रही हैं। 4मैं पुकारते-पुकारते थक गया हूँ; मेरा गला सूख गया है। अपने ईश्वर की राह देखते-देखते मेरी आँखें धुँधला रही हैं। 5जो अकारण मुझ से बैर करते हैं, उनकी संख्या मेरे सिर के बालों से भी अधिक है। जो मुझ पर झूठा अभियोग लगाते हैं, वे मुझ से शक्तिशाली हैं। जो चीज मैंने नहीं चुरायी, क्या मैं उसे लौटा सकता हूँ? 6ईश्वर! तू मेरी मूर्खता जानता है; मेरे अपराध तुझ से नहीं छिपे हैं। 7विश्वमण्डल के प्रभु-ईश्वर! जो तुझ पर भरोसा रखते हैं, वे मेरे कारण अपमानित न हों। इस्राएल के प्रभु-ईश्वर! जो तुझ पर भरोसा रखते हैं वे मेरे कारण अपमानति न हों। 8तेरे ही कारण लोग मेरा अपमान करते हैं और मेरा सिर लज्जा से झुक जाता है। 9तेरे ही कारण मेरे भाई मुझे पराया समझते हैं और मैं अपनी माता के पुत्रों में परेदशी जैसा बन गया हूँ; 10क्योंकि तेरे घर का उत्साह मुझे खा जाता है। तेरी निन्दा करने वाले मेरी निन्दा करते हैं। 11मैंने उपवास द्वारा अपना शरीर तपाया, इस से लोगों ने मेरी निन्दा की। 12मैंने टाट ओढ़ा और लोगों ने मुझ पर ताना मारा। 13नगर के फाटक पर बैठनेवाले मेरी चरचा करते हैं और मदिरा पीने वाले मेरे विषय में गीत गाते हैं। 14प्रभु! मैं तुझ से प्रार्थना करता हूँ; अब दया करने का समय आ गया है। ईश्वर! तेरी सत्यप्रतिज्ञता अपूर्व है; मुझे उत्तर दे, क्योंकि तू ही उद्धारक है। 15मुझे दलदल में धँसने से बचा; बैरियों से, गहरे जल से मेरा उद्धार कर। 16जलधारा मुझे डुुबा कर न ले जाये, अथाह गर्त मुझे निगलने न पायें, कब्र मुझ पर अपना मुँह बन्द न करे। 17प्रभु! तू सत्यप्रतिज्ञ है, मुझे उत्तर दे; तू दयासागर है, मुझ पर दयादृष्टि कर। 18अपने सेवक से अपना मुख और न छिपा; मैं संकट में हूँ, मुझे शीघ्र उत्तर दे। 19मेरे पास आ और मेरी रक्षा कर; शत्रुओं से मेरा उद्धार कर। 20तू जानता है कि वे किस तरह मुझे निन्दित, अपमानित और लज्जित करते हैं। मेरे सब विरोधी तेरे सामने हैं। 21मेरा हृदय अपमान के कारण टूट गया है; मैं अत्यन्त दुर्बल हो गया हूँ। मैं व्यर्थ ही सहानुभूति की आशा करता रहा; मैं दिलासा चाहता था, किन्तु वह नहीं मिला। 22उन्होंने मेरे भोजने में विष मिलाया और प्यास बुझाने के लिये मुझे सिरका पिला दिया। 23उनका भोजन उनके लिए फन्दा औैर उनके मित्रों के लिए जाल बन जाये। 24उनकी आँखें धुँधली पड़ जायें, जिससे वे न देख सकें। तू उनकी कमर झुकाये रख। 25तेरा क्रोध उन पर भड़क उठे; तेरे कोप की ज्वाला उन्हें ग्रस्त कर ले। 26उनका शिविर उजड़ जाये; उनके तम्बुओं में कोई निवास न करे; 27क्योंकि जिसे तूने मारा था, उन्होंने उस पर अत्याचार किया; जिसे तूने घायल किया था, उन्होंने उसे और दुःख दिया। 28उन्हें अपने पापों के लिए दोष-पर-दोष लगा, जिससे वे तुझ से पापमुक्ति न पा सकें। 29जीवन-ग्रन्थ से उसके नाम मिटा दिये जायें; उनके नाम धर्मियों के साथ न लिखे जायें। 30ईश्वर! मैं अभागा और दुःखी हूँ; तेरी सहायता मेरा उद्धार करे। 31मैं गीत गाते हुए ईश्वर के नाम को धन्य कहूँगा, मैं धन्यवाद देते हुए उसका गुणगान करूँगा। 32यह प्रभु को बैल की बलि से अधिक, सींग और खुर वाले सांड़ की बलि से अधिक प्रिय है। 33दीन-हीन यह देख कर आनन्दित हो उठते हैं। तुम, जो ईश्वर की खोज में लगे रहते हो, तुम्हारे हृदय में नवजीवन का संचार हो; 34क्योंकि प्रभु दरिद्रों की पुकार सुनता है, वह अपनी पराधीन प्रजा का परित्याग नहीं करता। 35आकाश और पृथ्वी, समुद्र और जलचारी जन्तुओं! प्रभु की स्तुति करो; 36क्योंकि ईश्वर सियोन का उद्धार और यूदा के नगरों का पुनर्निर्माण करेगा। वे देश में बस कर उसे अपने अधिकर में करेंगे। 37उसके सेवकों का वंश उसका उत्तराधिकारी होगा और उसके नाम के भक्त वहाँ निवास करेंगे।