2(1-2) ईश्वर! हम तुझे धन्यवाद देते हैं। हम तेरा नाम लेते हुए और तेरे अपूर्व कार्यों का बखान करते हुए तुझे धन्यवाद देते हैं। 3“निर्धारित समय आने पर मैं स्वयं निष्पक्षता से न्याय करूँगा। 4पृथ्वी अपने सब निवासियों के साथ ढह जायेगी। क्या मैंने उसके खम्भों को स्थापित नहीं किया? 5मैंने घमण्डियों से कहाः घमण्ड मत करो, और दुष्टों से: अपना सिर मत उठाओ, 6अपना सिर उतना ऊँचा मत उठाओ; ईश्वर के सामने धृष्टता मत करो।" 7क्योंकि न तो पूर्व से, न पश्चिम से और न मरुभूमि से उद्धार सम्भव है। 8ईश्वर ही न्यायकर्ता है; वह एक को नीचा दिखाता और दूसरे को ऊँचा उठाता है। 9तिक्त उफनती मदिरा से भरा, प्रभु के हाथ में एक प्याला है। वह उस में से उँड़ेलता है- पृथ्वी के सब दुष्ट जनों को उसे तलछट तक पीना है। 10मैं सदा इसकी घोषणा करता रहूँगा, मैं याकूब के ईश्वर की स्तुति करूँगा। 11मैं सब दुष्टों का सिर झुकाऊँगा, किन्तु धर्मी का सिर ऊँचा उठाया जायेगा।