स्तोत्र

अध्याय 85

2(1-2) प्रभु! तूने अपने देश पर कृपादृष्टि की, तूने याकूब को निर्वासन से वापस बुलाया। 3तूने अपनी प्रजा के अपराध क्षमा किये, तूने उसके सभी पापों को ढक दिया। 4तेरा रोष शान्त हो गया, तेरी क्रोधाग्नि बुझ गयी। 5हमारे मुक्तिदाता प्रभु! हमारा उद्धार कर। हम पर से अपना क्रोध दूर कर। 6क्या तू सदा हम से अप्रसन्न रहेगा? क्या तू पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपना क्रोध बनाये रखेगा? 7क्या तू लौट कर हमें नवजीवन नहीं प्रदान करेगा, जिससे तेरी प्रजा तुझ में आनन्द मनाये? 8प्रभु! हम पर दयादृष्टि कर! हमें मुक्ति प्रदान कर! 9प्रभु-ईश्वर जो कहता है, मैं वह सुनना चाहता हूँ। वह अपनी प्रजा को, अपने भक्तों को शान्ति का सन्देश सुनाता है, जिससे वे फिर कभी पाप नहीं करे। 10उसके श्रद्धालु भक्तों के लिए मुक्ति निकट है। उसकी महिमा हमारे देश में निवास करेगी। 11दया और सच्चाई, न्याय और शान्ति ये एक दूसरे से मिल गये। 12सच्चाई पृथ्वी पर पनपने लगी, न्याय स्वर्ग से दयादृष्टि करता है। 13प्रभु हमें सुख-शान्ति देता है और पृथ्वी अपनी फसल उत्पन्न करती है। 14न्याय प्रभु के आगे-आगे चलता है और शान्ति उसका अनुगमन करती है।