1आओ! हम आनन्द मनाते हुए प्रभु की स्तुति करें, अपने शक्तिशाली त्राणकर्ता का गुणगान करें। 2हम धन्यवाद करते हुए उसके पास जायें, भजन गाते हुए उसे धन्य कहें; 3क्योंकि हमारा प्रभु शक्तिशाली ईश्वर है, वह सभी देवताओं से महान् अधिपति है। 4वह पृथ्वी की गहराइयों को अपने हाथ से संभालता है, पर्वतों के शिखर उसी के है। 5समुद्र और पृथ्वी, जल और थल सब उसके बनाये हुए और उसी के हैं। 6आओ! हम दण्डवत् कर प्रभु की आराधना करें, अपने सृष्टिकर्ता के सामने घुटने टेकें; 7क्योंकि वही हमारा ईश्वर है और हम हैं- उसके चरागाह की प्रजा, उसकी अपनी भेड़ें। ओह! यदि तुम आज उसकी यह वाणी सुनो, 8अपना हृदय कठोर न कर लो, जैसा कि पहले मरीबा में, जैसा कि मस्सा की मरुभूमि में हुआ था। 9तुम्हारे पूर्वजों ने वहाँ मुझे चुनौती दी मेरा कार्य देख कर भी उन्होंने मेरी परीक्षा ली। 10वह पीढ़ी मुझे चालीस वर्षों तक अप्रसन्न करती रही और मैंने कहा, "उनका हृदय भटकता रहा है, वे मेरे मार्ग नहीं जानते"। 11तब मैंने क्रुद्ध होकर यह शपथ खायी: "वे मेरे विश्राम-स्थान में प्रवेश नहीं करेंगे"।