2(1-2) प्रभु! मेरी प्रार्थना सुन; मेरी दुहाई तेरे पास पहुँचे। 3संकट के समय मुझ से अपना मुख न छिपा। मेरी पुकार पर ध्यान दे, मुझे शीघ्र उत्तर दे; 4क्योंकि मेरे दिन धुएँ की तरह लुप्त हो जाते हैं, मेरी हड्डियाँ अंगारों की तरह जलती हैं। 5मेरा हृदय कटी हुई घास की तरह सूख गया है, मैं भोजन करना भूल जाता हूँ। 6मेरे निरन्तर कराहते रहने से मेरा चमड़ा हड्डियों से चिपक गया है। 7मैं मरुभूमि के घुग्घू-जैसा, खंडहर के उल्लू की तरह हूँ। 8मुझे नींद नहीं आती; मैं छत पर एकाकी पक्षी-जैसा बन गया हूँ। 9मेरे शत्रु दिन भर मेरा अपमान करते और निन्दा करते हुए मुझे कोसते हैं। 10भोजन के नाम पर मैं राख खाता और अपने पेय में आँसू मिलाता हूँ। 11अपने प्रचण्ड क्रोध के कारण तूने मुझे उठा कर फेंक दिया। 12मेरे दिन सन्ध्या के प्रकाश जैसे हैं मैं घास की तरह झुलस रहा हूँ। 13प्रभु! तेरा सिंहासन अनन्त काल तक बना रहता है और तेरी स्तुति युग-युगों तक। 14तू उठ कर सियोन पर दया करेगा; क्योंकि उस पर अनुग्रह करने का समय यही है, निर्धारित समय आ गया है। 15तेरे सेवक उसके पत्थरों को प्यार करते और उसके खंडहरों पर तरस खाते हैं। 16राष्ट्र प्रभु के नाम पर श्रद्धा रखेंगे, पृथ्वी के सभी राजा उसकी महिमा का समादर करेंगे; 17क्योंकि प्रभु सियोन का पुनर्निर्माण करेगा और अपनी सम्पूर्ण महिमा में प्रकट हो जायेगा। 18वह दीन-दुःखियों की प्रार्थना सुनेगा। वह उनकी विनती का तिरस्कार नहीं करेगा। 19आने वाली पीढ़ी के लिए यह लिखा जाये, जिससे भावी सन्तति प्रभु की स्तुति करे। 20प्रभु ने ऊँचे पवित्र स्थान से झुक कर देखा। उसने स्वर्ग से पृथ्वी पर दृष्टि दौड़ायी, 21जिससे वह बन्दियों की कराह सुने और प्राणदण्ड पाने वालों को मुक्त करें। 22जब सभी प्रजातियाँ और राज्य प्रभु की सेवा करने के लिए एकत्र हो जायेंगे, 23तब सियोन में प्रभु के नाम की घोषणा और येरूसालेम में उसकी स्तुति होती रहेगी। 24जीवन के मध्यकाल में उसने मेरी शक्ति क्षीण कर दी; उसने मेरे दिन घटा कर कम कर दिये। 25मैंने कहा: "मेरे ईश्वर! जब तक मेरे दिन पूरे नहीं होंगे, तू मुझे यहाँ से उठाना नहीं"। तेरे वर्ष पीढ़ी दर पीढ़ी बने रहते हैं। 26तूने प्राचीन काल में पृथ्वी की नींव डाली; आकाश तेरे हाथों की कृति है। 27वे नष्ट हो जायेंगे, तू बना रहेगा। वे वस्त्र की तरह पुराने हो जायेंगे। तू परिधान की तरह उन्हें बदल देगा और वे फेंक दिये जायेंगे। 28किन्तु तू एकरूप रहता है; तेरे वर्षों का अन्त नहीं। 29तेरे सेवकों की सन्तति सुरक्षा में निवास करेगी और उसका वंश तेरे सामने बना रहेगा।