1धन्य हैं वे, जो निर्दोष जीवन बिताते हैं, जो प्रभु की संहिता के मार्ग पर चलते हैं! 2धन्य हैं वे, जो उसके आदेशों का पालन करते और उन्हें हृदय से चाहते हैं, 3जो अधर्म नहीं करते और उसके बताये हुए मार्ग पर चलते हैं! 4तूने इसलिए अपना विधान घोषित किया कि हम उसका पूरा-पूरा पालन करें। 5ओह! मैं तेरे आदेश पूरे करने में सदा दृढ़ बना रहूँ। 6यदि मैं तेरी आज्ञाओं का ध्यान करता रहूँगा, तो मुझे कभी हताश नहीं होना पड़ेगा। 7मैं तेरे न्यायसंगत निर्णयों का अध्ययन करते हुए निष्कपट हृदय से तेरा स्तुतिगान करता रहूँगा। 8मैं तेरे आदेशों का पालन करता हूँ, तू कभी मेरा परित्याग न कर। 9तेरी शिक्षा का पालन करने से ही नवयुवक निर्दोष आचरण कर सकता है। 10मैं सारे हृदय से तुझे खोजता रहा, मुझे अपनी आज्ञाओं के मार्ग से भटनके न दे। 11मैंने तेरी शिक्षा अपने हृदय में सुरिक्षत रखी, जिससे मैं तेरे विरुद्ध पाप न करूँ। 12प्रभु! तू धन्य है। मुझे अपनी संहिता की शिक्षा दे। 13मेरा कण्ठ तेरे सब नियमों का बखान करता रहा। 14धन-सम्पत्ति की अपेक्षा मुझे तेरे आदेशों के पालन से अधिक आनन्द मिला। 15मैं तेरी विधियों का मनन करूँगा, मैं तेरे मार्गों का ध्यान रखूँगा। 16तेरी संहिता मुझे अपार आनन्द प्रदान करती है, मैं तेरी शिक्षा कभी नहीं भुलाऊँगा। 17अपने सेवक को आशिष प्रदान कर, जिससे मैं जीवित रहूँ और तेरी शिक्षा का पालन करूँ। 18मेरी आँखों को ज्योति प्रदान कर, जिससे मैं तेरी संहिता की महिमा देख सकूँ। 19मैं पृथ्वी पर परदेशी हूँ, अपनी आज्ञाओं को मुझ से न छिपा। 20मेरी आत्मा सदा-सर्वदा तेरे नियमों के लिए तरसती है। 21तू उन घमण्डी शापितों को धमकाता है, जो तेरी आज्ञाओं से दूर भटक जाते हैं। 22मुझे अपमानित और तिरस्कृत न होने दें, क्योंकि मैंने तेरे आदेशों का पालन किया। 23चाहे शासक मिल कर मेरी निन्दा करें, किन्तु मैं, तेरा सेवक तेरी संहिता का मनन करता हूँ। 24तेरे आदेश मुझे अपार आनन्द प्रदान करते हैं, तेरा विधान मेरा परामर्शदाता है। 25मेरी आत्मा धूल में पड़ी हुई है, अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मुझे नवजीवन प्रदान कर। 26मैंने अपना आचरण तेरे सामने खोल कर रख दिया और तूने मुझे उत्तर दिया। अब मुझे अपनी संहिता की शिक्षा प्रदान कर। 27मुझे अपनी आज्ञाओं का मार्ग समझा और मैं तेरे अपूर्व कार्यों का मनन करूँगा। 28मेरी आत्मा दुःख के आँसू बहाती है; अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मुझे सान्त्वना दे। 29कपट के मार्ग से मुझे दूर रख और अपनी संहिता पर चलने की कृपा प्रदान कर। 30मैंने सत्य का मार्ग चुना और तेरे निर्णयों को हृदयंगम किया है। 31मैं तेरे आदेशों का पालन करता हूँ। प्रभु! मुझे निराश न होने दे। 32मैं तेरी आज्ञाओं के मार्ग पर चलता हूँ, क्योंकि तू मुझ में नवजीवन का संचार करता है। 33प्रभु! मुझे अपने विधान के मार्ग की शिक्षा प्रदान कर, मैं जीवन भर उस पर चलता रहूँगा। 34मुझे ऐसी शिक्षा दे, जिससे मैं सारे हृदय से तेरी संहिता का पालन करता रहूँ। 35मुझे अपनी आज्ञाओं के मार्ग पर ले चल; क्योंकि वे मुझे आनन्द प्रदान करती हैं। 36मेरे हृदय में धन-सम्पत्ति का नहीं, बल्कि अपने आदेशों का अनुराग रोपने की कृपा कर। 37संसार की माया से मेरी दृष्टि हटा, मुझे अपने मार्ग द्वारा नवजीवन प्रदान कर। 38अपने सेवक के लिए अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर और लोग तुझ पर श्रद्धा रखेंगे। 39मुझ से अपमान दूर कर, मैं उस से डरता हूँ; क्योंकि तेरे निर्णय कल्याणकारी हैं। 40मुझे तेरी आज्ञाएँ हृदय से प्रिय हैं; तू अपने न्याय के अनुरूप मुझे नवजीवन प्रदान कर। 41प्रभु! तेरा प्रेम मुझे मिलता रहे अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मेरा उद्धार कर। 42तब मैं अपने निन्दकों को निरुत्तर कर दूँगा। मैं तेरी प्रतिज्ञा पर निर्भर रहता हूँ। 43मेरे मुख को सत्य-वचन से वंचित न कर, क्योंकि मुझे तेरे नियमों का भरोसा है। 44मैं निरन्तर और सदा-सर्वदा तेरी संहिता का पालन करूँगा। 45मैं सहज रूप से आगे बढ़ता रहूँगा, क्योंकि मैं तेरी विधियों का मनन करता हूँ। 46मैं राजाओं के सामने तेरे आदेशों का बखान करूँगा। मुझे किसी प्रकार का संकोच नहीं होगा। 47तेरी आज्ञाएँ मुझे अपार आनन्द प्रदान करती हैं। मैं उन्हें सारे हृदय से चाहता हूँ। 48मैं तेरी आज्ञाओं को करबद्ध प्रणाम करता हूँ। मैं तेरी संहिता का मनन करूँगा। 49अपने सेवक से की हुई प्रतिज्ञा को स्मरण कर। इसके द्वारा तूने मुझे आशा प्रदान की। 50यह विपत्ति में मेरी सान्त्वना है, क्योंकि तेरी शिक्षा मुझे नवजीवन प्रदान करती है। 51घमण्डियों ने मुझ पर व्यंग्य किया, किन्तु मैं तेरी संहिता से विमुख नहीं हुआ। 52प्रभु! मैं तेरे प्राचीन नियमों का स्मरण करता हूँ, इन से मुझे सान्त्वना मिलती है। 53विधर्मी तेरी संहिता की उपेक्षा करते हैं, यह देख कर मुझे क्शोभ होता है। 54पृथ्वी पर मेरे अस्थायी निवास में तेरी संहिता मेरे भजनों का विषय बन गयी है। 55प्रभु! मैं रात को तेरा नाम स्मरण करता हूँ, जिससे मैं तेरी संहिता के अनुसार जीवन बिताऊँ। 56यही मेरे लिए उचित है कि मैं तेरे नियमों का पालन करूँ। 57प्रभु! मैंने कहा: मेरा भाग्य यह है कि मैं तेरी शिक्षा का पालन करूँ। 58मैं सारे हृदय से तुझ से प्रार्थना करता हूँ। अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मुझ पर कृपा दृष्टि कर। 59मैंने अपने आचरण का विचार किया। मैंने तेरे नियमों के अनुसार चलने का संकल्प किया। 60मैंने विलम्ब नहीं किया। मैं तेरी आज्ञाओं का पालन करने के लिए तत्पर रहा। 61विधर्मियों ने मुझे अपने जाल में फँसा लिया, किन्तु मैंने संहिता को नहीं भुलाया। 62तेरे न्यायसंगत निर्णयों के कारण मैं आधी रात को उठ कर तेरी स्तुति करता हूँ। 63मैं तेरे श्रद्धालु भक्तों का सत्संग करता हूँ, जो तेरी आज्ञाओं का पालन करते हैं। 64प्रभु! पृथ्वी तेरी सत्यप्रतिज्ञता से परिपूर्ण है। मुझे अपनी संहिता की शिक्षा प्रदान कर। 65प्रभु! तूने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार अपने सेवक का उपकार किया है। 66मुझे विवेक और ज्ञान प्रदान कर; क्योंकि मुझे तेरी आज्ञाओं पर विश्वास है। 67मैं अपमानित होने से पहले भटक गया था। अब मैं तेरे आदेशों का पालन करता हूँ। 68तू भला है, हितकारी है। मुझे अपनी संहिता की शिक्षा प्रदान कर। 69घमण्डियों ने मुझ पर झूठे आरोप लगाये; किन्तु मैं सारे हृदय से तेरे विधान का पालन करता हूँ। 70उनकी बुद्धि जड़ और कुण्ठित है। तेरी संहिता मुझे अपार आनन्द प्रदान करती है। 71अच्छा हुआ कि मुझे अपमानित किया गया, मैंने तेरी आज्ञाओं का पालन करना सीखा। 72सोने-चाँदी की सहस्रों मुहरों की अपेक्षा मुझे तेरी संहिता कहीं अधिक वांछनीय है। 73तेरे हाथों ने मुझे बनाया और गढ़ा; मुझे सद्बुद्धि प्रदान कर और मैं तेरी आज्ञाओं का अध्ययन करूँगा। 74तेरे भक्त मुझे देख कर आनन्दित हैं; क्योंकि मुझे तेरी प्रतिज्ञा का भरोसा है। 75प्रभु! मैं मानता हूँ कि तेरे निर्णय न्यायसंगत हैं। यह उचित ही हुआ कि मुझे अपमानित किया गया। 76तेरा प्रेम मुझे सान्त्वना प्रदान करता रहे, जैसा कि तूने अपने सेवक से प्रतिज्ञा की है। 77तेरी असीम अनुकम्पा मुझे मिलती रहे, जिससे मैं जीवित रहूँ; क्येांकि तेरी संहिता मुझे परमप्रिय है। 78घमण्डियों ने मुझ पर झूठा आरोप लगाया, वे निराश हों। मैं तेरी आज्ञाओं का मनन करूँगा। 79तेरे श्रद्धालु भक्त मेरा साथ दें और वे भी, जो तेरा विधान जानते हैं। 80मैं तेरी संहिता के पालन में दृढ़ बना रहूँ। कहीं ऐसा न हो कि मुझे निराश होना पड़े। 81मैं तेरी मुक्ति के लिए तरसता रहता हूँ, मुझे तेरी प्रतिज्ञा का भरोसा है। 82मेरी आँखें तेरी प्रतिज्ञा की राह देखती रहती है। मैं कहता रहता हूँ: "तू मुझे कब सान्त्वना देगा?" 83मैं धुँए में सिकुड़ी हुई मशक-जैसा बन गया हूँ; किन्तु मैंने तेरी संहिता नहीं भुलायी। 84मेरी यह दशा कब तक रहेगी? तू कब मेरे अत्याचारियों का न्याय करेगा? 85घमण्डियों ने तेरी संहिता की उपेक्षा करते हुए मेरे लिए गड्ढ़ा खोदा। 86तेरी आज्ञाएँ विश्वसनीय हैं। मेरी सहायता कर; लोग मुझ पर अकारण अत्याचार करते हैं। 87पृथ्वी पर से मेरा अस्तित्व प्रायः मिट गया है; किन्तु मैंने तेरी आज्ञाओं का परित्याग नहीं किया। 88अपनी सत्यप्रतिज्ञता के अनुरूप मुझे नवजीवन प्रदान कर और मैं तेरी शिक्षा का पालन करता रहूँगा। 89प्रभु! तेरी प्रतिज्ञा सदा-सर्वदा बनी रहती है। वह आकाश की तरह चिरस्थायी है। 90तेरी सत्यप्रतिज्ञता पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनी रहती है। तेरे द्वारा स्थापित पृथ्वी आज तक अचल है। 91तेरी इच्छा से सब कुछ बना हुआ है, क्योंकि विश्व तेरी आज्ञा मानता है। 92यदि तेरी संहिता से मुझे अपार आनन्द नहीं मिला होता, तो मैं अपनी विपत्ति में मर गया होता। 93मैं तेरी आज्ञाएँ कभी नहीं भुलाऊँगा; क्योंकि उनके द्वारा तूने मुझे नवजीवन प्रदान किया। 94मैं तेरा ही हूँ, मेरा उद्धार कर; क्योंकि मैं तेरे आदेशों का पालन करना चाहता हूँ। 95दुष्ट जन मेरा सर्वनाश करना चाहते थे; किन्तु मैं तेरी आज्ञाओं का मनन करता हूँ। 96मैंने देखा कि सब पूर्णताएँ ससीम हैं; किन्तु तेरी संहिता की सीमा नहीं। 97प्रभु! तेरी संहिता मुझे कितनी प्रिय है! मैं प्रतिदिन उसका मनन करता हूँ। 98तेरे आदेश सदा मेरे सामने रहते हैं, इसलिए मैं अपने शत्रुओं से अधिक समझदार हूँ। 99मैं तेरी शिक्षा का मनन किया करता हूँ, इसलिए मैं अपने शिक्षकों से अधिक बुद्धिमान् हूँ। 100मैंने तेरी आज्ञाओं का पालन किया है, इसलिए मैं वयोवृद्धों से अधिक विवेकशील हूँ। 101तेरे नियमों का पालन करने के लिए मैं कुमार्ग से दूर रहा हूँ। 102मैं तेरी आज्ञाओं के मार्ग से नहीं भटका हूँ; क्योंकि तूने स्वयं मुझे शिक्षा दी है। 103मुँह में टपकने वाले मधु की अपेक्षा तेरी शिक्षा मेरे लिए अधिक मधुर है। 104तेरी आज्ञाओं से मुझे विवेक मिला, इसलिए मैं असत्य के मार्ग से घृणा करता हूँ। 105तेरी शिक्षा मुझे ज्योति प्रदान करती और मेरा पथ आलोकित करती है। 106मैंने शपथ खायी और इसपर दृढ़ रहता हूँ कि मैं तेरे न्यायसंगत निर्णयों का पालन करूँगा। 107प्रभु! मेरा बहुत अधिक अपमान किया गया है, अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मुझे नवजीवन प्रदान कर। 108प्रभु! मेरी प्रार्थनाएं स्वीकार करने की कृपा कर, मुझे अपने नियमों की शिक्षा प्रदान कर। 109मैं निरन्तर हथेली पर जान रखता हूँ; लेकिन मैंने तेरी संहिता नहीं भुलायी है। 110विधर्मियों ने मेरे लिए जाल बिछाया है, किन्तु मैं तेरे आदेशों से नहीं भटका हूँ। 111तेरी शिक्षा मेरी सदा बनी रहने वाली विरासत है, इस में मेरा हृदय रमता है। 112मैं सदा, जीवन के अन्त तक, तेरे सपनों पर चलने के लिए दृढ़संकल्प हूँ। 113मैं कपटी व्यक्तियों से घृणा करता हूँ। 114तू ही मेरा आश्रय और ढाल है! मुझे तेरी प्रतिज्ञा का भरोसा है। 115दुष्टो! मुझ से दूर हटो! मैं अपने ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करूँगा। 116अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मुझे सँभाल और मैं जीवित रहूँगा, मुझे अपनी आशा से निराश न होने दे। 117मुझे सँभाल और मेरा उद्धार हो जायेगा, मैं तेरी संहिता का मनन करता रहूँगा। 118जो तेरी संहिता से दूर भटकते हैं, तू उनका तिरस्कार करता है; क्योंकि उनका कपटपूर्व व्यवहार व्यर्थ है। 119पृथ्वी के सब दुर्जनों को तू कूड़ा-करकट समझता है; इसलिए मैं तेरे नियमों को हृदय से चाहता हूँ। 120तेरे सामने मेरा शरीर आतंक से काँपता है; मुझे तेरे निर्णयों का भय बना रहता है। 121मैंने न्याय और धार्मिकता का आचरण किया है; मुझे मेरे अत्याचारियों के हाथ न पड़ने दे। 122अपने सेवक की सुख-शान्ति की रक्षा कर, जिससे घमण्डी मुझ पर अत्याचार न करें। 123तेरी मुक्ति और तेरी न्यायसंगत प्रतिज्ञा की पूर्ति के लिए मेरी आँखें तरसती रहती हैं। 124अपनी सत्यप्रतिज्ञता के अनुरूप अपने सेवक से व्यवहार कर और मुझे अपनी संहिता की शिक्षा प्रदान कर। 125मैं तेरा सेवक हूँ; मुझे विवेकशील बना और मैं तेरे आदेशों का ज्ञान प्राप्त करूँगा। 126प्रभु! हस्तक्षेप करने का समय आ गया है। तेरी संहिता का उल्लंघन किया जाता है। 127सोने, परिष्कृत सोने की अपेक्षा मुझे तेरी आज्ञाएँ अधिक प्रिय हैं। 128मैं तेरे सभी नियम न्यायसंगत मानता और असत्य के सब मार्गों से घृणा करता हूँ। 129तेरे नियम अपूर्व हैं, इसलिए मैं उनका पालन करता हूँ। 130तेरी शिक्षा की व्याख्या ज्योति प्रदान करती है; वह अशिक्षितों को भी विवेकशील बनाती है। 131मैं आह भर कर बड़ी उत्सुकता से तेरी आज्ञाओं के लिए तरसता रहता हूँ। 132मुझ पर दयादृष्टि कर, जैसा कि तू अपने भक्तों के लिए करता आया है। 133अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मेरे कदमों को दृढ़ता प्रदान कर। किसी भी बुराई का मुझ पर अधिकार न होने दे। 134मुझे मनुष्यों के अत्याचार से मुक्त कर, जिससे मैं तेरी आज्ञाओं का पालन करूँ। 135अपने सेवक पर दयादृष्टि कर; मुझे अपने आदेशों की शिक्षा प्रदान कर। 136मेरी आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगी, क्योंकि लोग तेरी संहिता का पालन नहीं करते। 137प्रभु! तू न्यायी है; तेरे निर्णय सही हैं। 138न्याय के अनुसार और पूरी सच्चाई से तूने अपने आदेशों की घोषणा की है। 139जब मेरे विरोधी तेरी शिक्षा भुलाते हैं, तो मेरा धर्मोत्साह मुझे खा जाता है। 140तेरी शिक्षा पूर्ण रूप से विश्वसनीय है, तेरा सेवक उसे प्यार करता है। 141दीन-हीन और तिरस्कृत होने पर भी मैंने तेरे नियमों को नहीं भुलाया। 142तेरा न्याय चिरस्थायी न्याय है, तेरी संहिता मूर्तिमान् सत्य है। 143मैं संकट और दुःख से घिरा हुआ हूँ। तब भी तेरी आज्ञाएँ मुझे आनन्द प्रदान करती हैं। 144तेरे निर्णय न्याययुक्त और चिरस्थायी हैं। मुझे विवेक प्रदान कर और मैं जीवित रहूँगा। 145प्रभु! मैंने सारे हृदय से तुझे पुकारा, मेरी सुन। मैं तेरी संहिता का पालन करूँगा। 146मैंने तेरी दुहाई दी, मेरा उद्धार कर और मैं तेरे आदेशों का पालन करूँगा। 147मैं भोर से पहले तुझे पुकारता हूँ। मुझे तेरी प्रतिज्ञा का भरोसा है। 148तेरी शिक्षा का मनन करने के लिए मेरी आँखें रात के पहरों में खुली रहीं। 149अपनी सत्यप्रतिज्ञता के अनुरूप मेरी सुन। प्रभु! अपने निर्णय के अनुसार मुझे नवजीवन दे। 150तेरी संहिता की उपेक्षा करने वाले दुष्ट अत्याचारी मेरे निकट आ रहे हैं। 151प्रभु! तू भी तो निकट है। तेरी सब आज्ञाएँ विश्वसनीय हैं। 152मैं बहुत पहले से यह जानता हूँ कि तूने सदा के लिए अपनी शिक्षा स्थापित की है। 153मेरी विपत्ति पर दृष्टि डाल और मेरा उद्धार कर; क्योंकि मैंने तेरी संहिता को नहीं भुलाया। 154मेरे पक्ष का समर्थन कर और मेरी रक्षा कर; अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मुझे नवजीवन प्रदान कर। 155मुक्ति विधर्मियों से दूर है; क्योंकि उन्होंने तेरी संहिता की उपेक्षा की। 156प्रभु! तेरी कृपा असीम है; अपने निर्णय के अनुसार मुझे नवजीवन दे। 157मेरे अत्याचारी और विरोधी अनेक हैं, किन्तु मैं तेरी संहिता से विमुख नहीं हुआ। 158विश्वासघातियों को देख कर मुझे घृणा होती है; क्योंकि उन्होंने तेरी शिक्षा का पालन नहीं किया। 159देख कि मैं तेरे आदेशों से कितना अनुराग करता हूँ। प्रभु! अपनी सत्यप्रतिज्ञता के अनुरूप मुझे नवजीवन दे। 160तेरी शिक्षा सत्य पर आधारित है, तेरे न्याय का प्रत्येक निर्णय अपरिवर्तनीय है। 161शासकों ने मुझ पर अकारण अत्याचार किया, किन्तु मेरा हृदय केवल तेरी शिक्षा का उल्लंघन करने से डरता है। 162मैं तेरी प्रतिज्ञा के कारण वैसे ही आनन्दित हूँ, जैसे कोई, बड़ा खजाना मिलने पर आनन्दित है। 163मैं सारे हृदय से असत्य से घृणा करता हूँ, तेरी संहिता ही मुझे परमप्रिय है। 164तेरे न्यायमुक्त निर्णयों के कारण मैं दिन में सात बार तेरी स्तुति करता हूँ। 165तेरी संहिता के प्रेमियों को अपार शान्ति प्रिय है, वे कभी विचलित नहीं होते। 166प्रभु! तुझ से मुक्ति का भरोसा है; मैं तेरी आज्ञाओं का पालन करता रहा। 167मैं तेरे आदेशों को पूरा करता रहा, मैं उन को बहुत प्यार करता हूँ। 168तू मेरा आचरण जानता है; तू जानता है कि मैं तेरी संहिता का पालन करता आया हूँ। 170मेरी विनती तेरे पास पहुँचे, अपने वचन के अनुसार मेरा उद्धार कर। 171मेरा कण्ठ तेरा स्तुतिगान करता रहे, क्योंकि तू मुझे अपनी संहिता की शिक्षा देता है। 172मेरी वाणी तेरे आदेशों का स्तुतिगान करती रहे, क्योंकि तेरी सब आज्ञाएँ न्यायमुक्त हैं। 173तेरा हाथ मेरी सहायता के लिए तत्पर रहे, क्योंकि मैंने तेरे नियम चुने हैं। 174प्रभु! मुझे तुझ से मुक्ति का भरोसा है; मुझे तेरी संहिता से अपार आनन्द मिलता है। 175मैं तेरी स्तुति करने के लिए जीवित रहूँ। तेरी आज्ञाएँ मेरा पथप्रदर्शन करती रहें। 176मैं खोयी हुई भेड़ की तरह भटक रहा हूँ, अपने सेवक को खोज ले; क्योंकि मैंने तेरी आज्ञाएँ नहीं भुलायीं।