1जब प्रभु ने सियोन के निर्वासितों को लौटाया, तो हमें लगा कि हम स्वप्न देख रहे हैं। 2हमारे मुख पर हँसी खिल उठी, हम आनन्द के गीत गाने लगे। गैर-यहूदी आपस में यह कहते थे: "प्रभु ने उनके लिए अपूर्व कार्य किये हैं"। 3उसने वास्तव में हमारे लिए अपूर्व कार्य किये हैं और हम आनन्दित हो उठे। 4प्रभु! मरुभूमि की नदियों की तरह हमारे निर्वासितों को लौटा दे। 5जो रोते हुए बीज बोते हैं, वे गाते हुए लुनते हैं; 6जो बीज ले कर जाते हैं, जो रोते हुए जाते हैं, वे पूले लिये लौटते हैं, वे गाते हुए लौटते हैं।