1जब अकेले आदि मानव, संसार के पिता की ही सृष्टि हुई थी, तो प्रज्ञा ने उसकी रक्षा की थी, उसके पतन के बाद उसका उद्धार किया था। 2और उसे समस्त सृष्टि पर शासन करने की शक्ति प्रदान की थी। 3जब एक अधर्मी मनुष्य अपने क्रोधावेष में उस से विमुख हो गया था, तो उसका विनाश हुआ, क्योंकि उसने क्रुद्ध हो कर अपने भाई की हत्या की थी। 4जब उसके कारण पृथ्वी पर जलप्रलय हुआ था, तो प्रज्ञा ने फिर उसकी रक्षा की थी और एक भंगुर लकड़ी पर धर्मी को बिठा कर पार कराया था। 5जब सर्वत्र फैली हुई दुष्टता के कारण राष्ट्रों में उलझन पैदा हुई थी, तो प्रज्ञा ने धर्मी को पहचान कर उसे ईश्वर की दृष्टि में अनिन्द्य बनाये रखा और उसे वात्सल्य पर विजय का सामर्थ्य प्रदान किया था। 6जब अधर्मी नष्ट हो रहे थे और पाँच नगरों पर आग बरस रही थी, तो प्रज्ञा ने भागने वाले धर्मी को बचाया था। 7उन लोगो की दुष्टता के साक्ष्य के रूप में अब तक वहाँ एक उजाड़भूमि विद्यमान है, जिस में से धुँआ उठता है, जहाँ वृक्ष अनिश्चित समय तक फल देते हैं और एक अविश्वासी आत्मा की स्मृति में नमक का खम्भा खड़ा है। 8जिन लोगों ने प्रज्ञा की उपेक्षा की थी, वे न केवल भलाई पहचानने में असमर्थ हो गये, बल्कि उन्होंने आने वाली पीढ़ियों के लिए अपनी मूर्खता का स्मारक छोड़ दिया था, जिससे उनका पाप गुप्त न रहे। 9किन्तु जो प्रज्ञा के अनुयायी बने, उसने उन्हें उनके कष्टों से मुक्त किया। 10प्रज्ञा धर्मी को सीधे मार्गों पर ले चली, जब वह अपने भाई के क्रोध से भाग रहा था। उसने उसे ईश्वर के राज्य के दर्शन कराये और पवित्रता का ज्ञान प्रदान किया। उसने उसे उसके कार्यों द्वारा सम्पन्न बनाया और उसके परिश्रम का प्रचुर पुरस्कार दिया। 11उसने लोभी शोषकों के विरुद्ध उसकी सहायता की और उसे धनी बनाया। 12उसने उसके शत्रुओं से उसकी रक्षा की और उसे फन्दा बिछाने वालों से बचा लिया। उसने उसे घोर संघर्ष में विजय दिलायी, जिससे वह समझ सके कि भक्ति सब से शक्तिशाली है। 13उसने बेचे हुए धर्मी का परित्याग नहीं किया, बल्कि उसे पाप से बचाया। 14वह उसके साथ कुएँ में उतरी और उसने बन्दीगृह में उसे अकेला नहीं छोड़ा बल्कि उसे देश का राजदण्ड दिलाया। उसने उस को अत्याचारियों पर अधिकार दिया। उसने उसके निन्दकों को झूठा सिद्ध किया और उसे अमर यष प्रदान किया। 15उसने एक पवित्र पूजा और निर्दोष प्रजाति को उस पर अत्याचार करने वाले राष्ट्र से मुक्त किया। 16उसने प्रभु के सेवक की आत्मा में प्रवेश किया और चमत्कारों एवं चिन्हों द्वारा विकट राजाओें का सामना किया। 17उसने सन्तों को उनके परिश्रम का पुरस्कार दिलाया। वह उन्हें एक आश्चर्यजनक मार्ग से ले चली। वह दिन में उनके लिए आच्छादन और में तारों की ज्योति बनी। 18उसने उन्हें लाल सागर के पार उतारा; वह उन्हें विशाल जलाशय के उस पार ले गयी। 19उसने उनके शत्रुओे को जल में बहा दिया और उन्हें गर्त की गहराई से निकाल कर ऊपर फेंक दिया। 20इसलिए धर्मियों ने दुष्टों को लूटा। प्रभु! उन्होंने तेरे पवित्र नाम की स्तुति की और एक स्वर से तेरी विजयी भुजा का गुणगान किया; 21क्योंकि प्रज्ञा ने गूँगों का मुख खोला और शिशुओं की जिह्वा को वाणी दी।