1अपनी धन-सम्पत्ति पर भरोसा मत रखो और यह मत कहो, "मुझे किसी बात की कमी नहीं"। 2प्रबल नैसर्गिक प्रवृत्तियों से हार कर अपने हृदय की वासनाओें को पूरा मत करो। 3यह मत कहो, "मुझ पर किसी का अधिकार नहीं"; क्योंकि प्रभु तुम्हें अवश्य दण्ड देगा। 4यह मत कहो, "मैंने पाप किया, तो मेरा क्या बिगड़ा?" क्योंकि प्रभु बड़ा सहनशील है। 5क्षमा पाने की आशा में पाप-पर-पाप मत करते जाओे। 6यह मत कहो, "उसकी दया असीम है। वह मेरे असंख्य पाप क्षमा करेगा"। 7क्योंकि दया के अतिरिक्त उस में क्रोध भी है और उसका कोप पापियों पर भड़क उठता है। 8प्रभु के पास शीघ्र ही लौटा आओ, दिन-पर-दिन उस में विलम्ब मत करो; 9क्योंकि प्रभू का क्रोध अचानक भड़क उठेगा; दण्ड के दिन तुम्हारा विनाश होगा। 10पाप की कमाई पर भरोसा मत रखो, विपत्ति के दिन इस से तुम्हें कोई लाभ नहीं होगा। 11हर हवा में मत ओसाओ, हर मार्ग पर मत चलो; ऐसा दोमुँहा पापी करता है। 12अपनी धारणा पर दृढ़ रहो और अपनी प्रतिज्ञा पूरी करो। 13दूसरों की बात सुनने के लिए तत्पर रहो और सोच-विचार कर उत्तर दो। 14जानकारी होने पर अपने पड़ोसी को उत्तर दो। यदि नहीं है, तो मुँह पर हाथ रखो। 15बोलने से सम्मान और अपमान, दोनों मिलते हैं; जिह्वा मनुष्य के पतन का कारण बनती है। 16चुगलखोर मत बनो और किसी की बदनामी मत मरो; 17क्योंकि यदि चोर को लज्जित होना पड़ेगा, तो दोमुँहे को कठोर दण्ड मिलेगा।