1प्रज्ञा दीन का सिर ऊँचा करती और उसे शासकों के बीच बैठाती है। 2सौन्दर्य के कारण किसी की प्रशंसा मत करो और रूप-रंग के कारण किसी की उपेक्षा मत करो। 3पंख वाले जीवों में मधुमक्खी छोटी है, किन्तु वह जो उत्पन्न करती है, वह सब से मधुर है। 4अपने वस्त्रों पर गौरव मत करो और सम्मान मिलने पर घमण्डी मत बनो; क्योंकि प्रभु के कार्य ही प्रशंसनीय हैं, यद्यपि वे मनुष्य से छिपे रहते हैं। 5कई तानाशाहों को भूमि पर बैठ जाना पड़ा और जिसका कोई ध्यान नहीं करता था, उसने किरीट धारण किया। 6कई शासकों को बहुत अपमानित किया गया और सुप्रसिद्ध व्यक्तियो को शत्रुओें के हवाले कर दिया गया है। 7जानकारी के अभाव में किसी को दोष मत दो; सोच-विचार करने के बाद ही किसी को डाँटो। 8सुनने के बाद ही उत्तर दो और बोलने वाले को मत टोको। 9जो मामला तुम से सम्बन्ध नहीं रखता, उसके विषय में झगड़ा मत करो और दुष्टों के विवाद में मत पड़ो। 10पुत्र! बहुत बातों के फेर में मत पड़ो: ऐसा करने पर तुम निर्दोष नहीं रहोगे। जिसका पीछा करोगे, उसे नहीं पकड़ पाओगे और जिस से भाग जाओगे, उस से नहीं बचोगे। 11कुछ लोग परिश्रम और संघर्ष करते हुए दौड़ते हैं, किन्तु तब भी पिछड़ जाते हैं। 12कुछ लोग कमजोर और निस्सहाय, साधनहीन और दरिद्र हैं, किन्तु प्रभु की कृपादृष्टि उन्हें प्राप्त है और वह उन्हें उनकी दयनीय दशा से ऊपर उठाता है। 13वह उनका सिर ऊँचा करता और इस पर बहुतों को आश्चर्य होता है। 14दुःख और सुख, जीवन और मृत्यु गरीबी और अमीरी- यह सब कुछ प्रभु के हाथ है। 15प्रज्ञा, अनुशासन, संहिता का ज्ञान, भा्रतृप्रेम और परोपकार का मार्ग यह सब प्रभु का वरदान है। 16भ्रम और अन्धकार पापियों का भाग्य है। जो बुराई को प्यार करते है, वे उसे बुढ़ापे तक नहीं छोड़ते। 17भक्तों को प्रभु के वरदान मिलते हैं; उसकी कृपादृष्टि उनका सदा पथप्रदर्शन करेगी। 18कुछ लोग परिश्रम और मितव्यय से धनी बनते हैं, किन्तु अन्त में उनका यह भाग्य होगा: 19वे कहेंगे, "मुझे शान्ति प्राप्त हो गयी है। अब मैं अपनी सम्पत्ति का उपभोग करूँगा"; 20जब कि वे नहीं जानते कि उनकी घड़ी कब आयेगी। वे मर जायेंगे और अपनी सम्पत्ति दूसरों के लिए छोड़ देंगे। 21कर्तव्यपालन में दृढ़ बने रहो और बुढ़ापे तक अपना काम करते जाओ। 22पापी के कर्मो पर आश्चर्य पत करो; प्रभु पर भरोसा रखते हुए अपना काम करते जाओ ; 23क्योंकि प्रभु सुगमता से किसी दरिद्र को अचानक धनी बना सकता है। 24प्रभु का आशीर्वाद धर्मी का पुरस्कार है; उसका आशीर्वाद क्षण भर में फलता है। 25यह मत कहो, "मुझे और क्या चाहिए? मुझे और कौन सुख मिल सकता है?" 26यह मत कहो, "मुझे किसी बात की कमी नहीं, भविष्य में मुझ पर कौन विपत्ति आ सकती है?" 27सुख के दिनों में दुःख और दुःख के दिनों में सुख भुलाया जाता है। 28प्रभु आसानी से मृत्यु के दिन मनुष्य को उसके समस्त कर्मो का फल दे सकता है। 29घड़ी भर का दुःख समृद्धि को भुला देता है; मनुष्य का अन्त उसके कर्म प्रकट करता है। 30किसी को मृत्यु के पूर्व सौभाग्यशाली मत कहो; मृत्यु के समय ही मनुष्य को पहचाना जाता है। 31हर किसी को अपने घर में मत आने दो; क्योंकि कपटी मनुष्य के बहुत-से जाल होते हैं। 32अहंकारी का हृदय पिंजड़े में बन्द तीतर के सदृश है। वह गुप्तचर की तरह तुम्हारे पतन की ताक में रहता है। 33चुगलखोर अच्छाई को बुराई में बदल देता है। ओैर अच्छी-से-अच्छी बातों में भी दोष निकालता है। 34एक चिनगारी कोयले के ढेर में आग लगा सकती है। पापी रक्तपात की ताक में रहता है। 35दुष्ट से सावधान रहो, वह बुराई ही सोचता है; वह सदा के लिए तुम पर कलंक लगा सकता है। 36यदि परदेशी को अपने यहाँ ठहराओगे, तो वह तुम को परेशानी में डालेगा और तुम्हारे अपनों से विमुख करेगा।