1पुत्र! क्या तुमने पाप किया है? तो फिर ऐसा मत करो और अपने पुराने पापों के लिए क्षमा माँगो। 2साँप के सामने की तरह पाप से दूर भाग जाओ। यदि पास आओगे, तो वह तुम को काटेगा। 3उसके दाँत सिंह के दाँतो-जैसे हैं; वे मनुष्य की आत्माओें का विनाश करते हैं। 4प्रत्येक अपराध दुधारी तलवार-जैसा हैः उसके घाव का इलाज नहीं होता। 6दरिद्र की प्रार्थना सीधे ईश्वर के कान तक पहुँचती है; उसे शीघ्र ही न्याय दिलाया जायेगा। 7जो सुधार नापसन्द करता, वह पापी के मार्ग पर चलता है; किन्तु जो प्रभु पर श्रद्धा रखता, वह हृदय से पश्चात्ताप करेगा। 8सब लोग डींग मारने वाले को पहचानते हैं; किन्तु समझदार व्यक्ति अपनी गलतियाँ जानता है। 9जो पराये धन से अपना घर बनाता है, वह मानो अपने मकबरे के लिए पत्थर बटोरता है। 10पापियों की सभा सन की गठरी-जैसी है। उसका अन्त प्रज्वलित आग में होता है। 11पापियों का मार्ग प्रशस्त है, उस में रोड़े नहीं है, किन्तु वह मृतकों के निवास के गर्त में ले जाता है। 12संहिता के पालनकर्ता की बुद्धि स्थिर है। 13प्रज्ञा प्रभु पर श्रद्धा की परिपूर्णता है। 14जो बुद्धिमान् नहीं है, वह सुशिक्षित नहीं बना सकता। 15किन्तु एक ऐसी बुद्धिमानी होती है, जो बुराई से भरी हुई है और जहाँ कटुता है, वहाँ बुद्धिमानी नहीं। 16प्रज्ञ का ज्ञान बाढ़ की तरह बढ़ता है और उसका परामर्श संजीवन जल का स्त्रोत है। 17मूर्ख का हृदय टूटे घड़े के सदृश है; उस में कोई भी ज्ञान नहीं ठहर पाता। 18जब समझदार व्यक्ति ज्ञान की बात सुनता, तो वह उसकी प्रशंसा करता और अपनी ओर से उस में कुछ जोड़ देता है; किन्तु लम्पट उसे सुन कर नापसन्द करता और उसे अपनी पीठ पीछे फेंक देता है। 19मूर्ख बकवाद यात्रा में बोझ-जैसी है, किन्तु बुद्धिमान् की बातें मनोहर हैं। 20लोग सभा में बुद्धिमान् की सम्मति को महत्व देते और उसके षब्दों पर विचार करते हैं। 21मूर्ख की दृष्टि में प्रज्ञा टूट-फूटे मकान जैसी है। बेसमझ का ज्ञान है- बेसिर-पैर की बातें। 22मूर्ख के लिए अनुशासन पैरों में बेड़ियों जैसा या दाहिने हाथ में हथकड़ियों-जैसा है। 23मूर्ख खिलखिला कर हँसता है, किन्तु समझदार अधिक-से-अधिक मुस्कराता है। 24प्रज्ञ के लिए अनुशासन सोने आभूषण जैसा या दाहिनी बाँह में भुजबन्द-जैसा है। 25मूर्ख किसी के घर निधड़क घुस जाता, किन्तु समझदार सविनय खड़ा रहता है। 26मूर्ख द्वार पर घर के अन्दर झाँकता, किन्तु सभ्य मनुष्य बाहर खड़ा रहता है। 27असभ्य द्वार पर कान लगा कर सुनता, किन्तु समझदार व्यक्ति उसे लज्जा की बात समझता है। 28गप्पी के होंठ बकवाद करते हैं, किन्तु समझदार व्यक्ति के शब्द तराजू पर तोले हुए हैं। 29मूर्खों का हृदय उनकी जीभ पर बसता है, किन्तु ज्ञानियों की जीभ उनके हृदय में बसती है। 30जब दुष्ट अपने विरोधी को कोसता, तो वह अपने केा कोसता है। 31चुगलखोर अपने को दूषित करता और अपने को पड़ोस में घृणा का पात्र बना लेता है।