1प्रभु! मेरे जीवन के पिता और स्वामी! मुझे उनके वश में न पड़ने दे और उनके द्वारा मेरा पतन न होने दे। 2कौन मेरे विचारों पर कीड़ों का अंकुश लगायेगा और मेरे हृदय पर प्रज्ञा का अनुशासन, जिससे मेरे अपराधों की अनदेखी न हो और मुझे अपने पापों का दण्ड दिया जाये? 3कहीं ऐसा न हो कि मेरे अपराधों में वृद्धि हो, मेरे पापों की संख्या बढ़ती जाये, मैं अपने विरोधियों के हाथ पड़ूँ और मेरा शत्रु मुझ पर हँसे। 4प्रभु! मेरे जीवन के पिता और ईश्वर! मुझे उनके वश में न होने दे। 5मुझ में अहंकार न आने दे और लालच मुझ से दूर कर। 6मुझ पर पेटूपन और वासना का अधिकार न होने दे और मुझे प्रबल मनोवेगों का शिकार न बनने दे। 7पुत्रों! सुनो, किस प्रकार मुँह को वश में रखना चाहिए। जो इस शिक्षा का पालन करता है, वह कभी नहीं फँसेगा। 8पापी अपने होंठो का शिकार बनता है। निन्दक और घमण्डी का इसी कारण पतन होता है। 9अपने मुँह को शपथ खाने का आदी मत बनने दो: इस प्रकार बहुतों का पतन होता है। 10परमपावन ईश्वर का नाम मत लिया करो। नहीं तो पाप से नहीं बच सकोगे। 11जिस प्रकार वह नौकर कोड़ों की मार से नहीं बचेगा, जिस पर निरन्तर निगरानी रखी रहती है, उसी प्रकार वह व्यक्ति पाप से नहीं बच सकेगा, जो हर समय शपथ खाता और परमवान का नाम लेता है। 12जो व्यक्ति बार-बार शपथ खाता, वह अपराध करता जाता है और उसके घर पर से दण्ड नहीं हटेगा। 13यदि वह बिना सोचे-समझे शपथ खाता है, तो उसे पाप लगता है। यदि वह उसे तुच्छ समझता, तो वह दुगुना पाप करता है। 14यदि उसने अकारण शपथ खायी, तो वह निर्दोष नहीं माना जायेगा और उसके घर पर विपत्तियाँ आ पड़ेगी। 15एक ऐसी भाषा होती है, जो मृत्युदण्ड के योग्य है। वह याकूब की विरासत में सुनाई नहीं पडे़। 16भक्तजन ऐसी भाषा का प्रयोग नहीं करते और इस प्रकार पापों से दूषित नहीं होते। 17अपने मुँह को अश्लील बातों का आदी न बनने दो, क्योंकि इस प्रकार तुम शब्दों द्वारा पाप करते हो। 18जब तुम बड़े लोगों के बीच बैठे हो, तो अपने माता-पिता को याद रखो। 19कहीं ऐसा न हो कि तुम उनके सामने मूर्ख बनो। तब तुम चाहोगे कि तुम्हारा जन्म नहीं हुआ होता और अपने जन्म के दिन को अभिशाप देागे। 20जो अश्लील बातचीत का आदी बन गया है, वह जीवन भर सभ्य नहीं बनेगा। 21दो प्रकार के लोग पाप करते जाते हैं और तीसरे प्रकार के लोग अपने ऊपर ईश्वर का क्रोध बुलाते हैं। 22प्रबल बासना प्रज्वलित आग-जैसी है। वह भस्म हो जाने से पहले नहीं बुझती। 23जो मनुष्य अपना शरीर व्यभिचार को अर्पित करता, वह तब तक नहीं सँभलेगा, जब तक आग उसे जला न दे। 24व्यभिचारी को हर प्रकार का चारा मीठा लगता है। वह तब तक उसे नहीं छोड़ता, जब तक वह नहीं मरता। 25जो व्यक्ति व्यभिचार करता और मन-ही-मन कहता है, "मुझे कौन देखता है? 26मेरे चारों ओर अँधेरा है, मुझे दीवारें छिपा रही है। मुझे कोई नहीं देख सकता। चिन्ता की बात ही क्या है? सर्वोच्च प्रभु मेरे पापों पर ध्यान नहीं देगा।" 27वह नहीं समझता कि उसकी आँखें सब कुछ देखती हैं। वह मनुष्यों की आँखों से डरता 28और नहीं जानता कि प्रभु की आँखें सूर्य से कहीं अधिक प्रकाशमान हैं। वे मनुष्यों के सभी मार्ग देखतीं और गुप्त-से-गुप्त स्थानों तक पहुँचती हैं। 29प्रभु-ईश्वर सब वस्तुएँ उनकी सृष्टि से पहले जानता और उनके बनने के बाद भी उन्हें देखता रहता है। 30व्यभिचारी केा नगर के चैकों पर दण्ड दिया जायेगा और वह उस समय पकड़ा जायेगा, जब उसे उसकी कोई आशंका नहीं। 31वह सबों के सामने कलंकित होगा; क्येांकि उसे प्रभु पर श्रद्धा नहीं थी। 32उस स्त्री को भी वही दण्ड दिया जायेगा, जो अपने पति के साथ विश्वासघात करती और उसे ऐसा वारिस देती है, जो उसकी अपनी सन्तान न हो। 33उसने सर्वोच्च प्रभु की संहिता का उल्लंघन किया, अपने पति के साथ अन्याय किया, व्यभिचार के कारण दूषित हो गयी और परपुरुष की सन्तान को उत्पन्न किया। 34वह सभा के सामने प्रस्तुत की जायेगी और उसकी सन्तान दुःखी होगी। 35उसके पुत्र जड़ नहीं पकडेंगे और उसकी टहनियाँ फल नहीं उत्पन्न करेंगी। 36उसकी स्मृति अभिशप्त होगी और उसका कलंक सदा बना रहेगा। 37इस प्रकार बाद के लोग जान जायेगें कि प्रभु पर श्रद्धा से बढ़ कर कोई बात नहीं और उसकी आज्ञाओें के पालन से अधिक मधुर कुछ नहीं।