प्रवक्ता

अध्याय 29

1जो अपने पड़ोसी को उधार देता वह दयालु है। जो उसकी सहायता करता, वह आज्ञाओें का पालन करता है। 2पड़ोसी को ज़रूरत हो, तो उसे उधार दो। और समय पर अपने पड़ोसी के ऋण चुका दो। 3अपनी प्रतिज्ञा पूरी करो और पड़ोसी के प्रति ईमानदार रहो। इस प्रकार तुम को हर ज़रूरत में सहायता मिलेगी। 4अनेक लोग उधार को संयोग से मिला ख़ज़ाना समझते हैं और जिन्होंने उनकी सहायता की है, उन्हे कष्ट पहुँचाते हैं। 5ऐसे लोग उधार पाने से पहले देने वाले का हाथ चूमते और रुपये के कारण विनय से बात करते हैं, 6किन्तु लौटाने का समय आने पर विलम्ब करते, बहाना बनाते और असमर्थता प्रकट करते हैं। 7यदि वे लौटाते हैं, तो उधार देने वाला मुष्किल से आधा पायेगा और समझेगा कि मुझे संयोग से ख़ज़ाना मिला है। 8यदि वे नहीं लौटाते, तो देने वाला अपना पैसा खो देता और अकारण उन्हें शत्रु बना लेता है। 9वे उसकी निन्दा तथा भत्र्सना करेंगे और सम्मान के बदले उसका अपमान करेंगे। 10कुछ लोग उधार नहीं देते, वे दुष्ट नहीं हैं, किन्तु व्यर्थ धोखा खाने से डरते हैं। 11फिर भी तुम दरिद्र के प्रति उदार बनो और उसे देर तक अपने दान की प्रतीक्षा मत करने दो। 12आज्ञा का पालन करने के लिए दरिद्र की सहायता करो और उसे अपनी ज़रूरत में खाली हाथ मत जाने दो। 13अपने धन का त्याग भाई और मित्र के लिए कर दो और ज़मीन के नीचे उस में जंग न लगने दो। 14सर्वोच्च प्रभु की आज्ञा के अनुसार अपने धन का उपयोग करो और तुम सोने की अपेक्षा उस से अधिक लाभ उठाओगे। 15(15-17) अपनी भिक्षा दरिद्र के हृदय में संचित करो और वह हर प्रकार की बुराई से तुम्हारी रक्षा करेगी। 18वह पक्की ढाल और भारी भाले की अपेक्षा अधिक अच्छी तरह से तुम्हारे लिए शत्रु से लड़ेगी। 19भला आदमी पड़ोसी की ज़मानत देता, किन्तु निर्लज्ज व्यक्ति से धोखा खाता है। 20(20-21) अपने लिए ज़मानद देने वाले का उपकार मत भुलाओं; उसने तुम्हारे लिए अपने को अर्पित किया। 22जो अपनी ज़मानत देने वाले का धन गँवाता, वह पापी है 23और जो अपने उद्धारकर्ता का परित्याग करता, वह कृतघ्न है। 24जमानत ने बहुत-से धनियों का विनाश किया और उन्हें समुद्र की लहरों की तरह बहा दिया। 25उसने शक्तिशालियों को निर्वासित किया और उन्हें पराये राष्ट्रों में भटकाया। 26पापी प्रभु की आज्ञाओें का उल्लंघन करते हुए लाभ की आशा में ज़मानत देता और मुकदमा मोल लेता है। 27अपनी शक्ति के अनुसार अपने पड़ोसी की ज़मानत दो, किन्तु सावधान रहो कि कहीं धोखा न खाओ। 28जीवन की प्राथमिक आवश्यकताएँ जल, भोजन, वस्त्र हैं और उचित एकान्त के लिए अपना घर। 29पराये घर में दावत की अपेक्षा अपने घर में रूखा-सूखा भोजन अच्छा है। 30तुम्हारे पास बहुत हो या कम, उस से सन्तुष्ट रहो और तुम को परदेश में डाँट-फटकार नहीं सुननी पडे़गी। 31एक घर से दूसरे घर में भटकना और परदेशी होने के कारण मुँह नहीं खोल सकना- यह एक दयनीय जीवन है। 32तुम को दूसरों को खिलाना-पिलाना पड़ता है और वे तुम्हारा आभार नहीं मानेंगे, बल्कि तुम को कटु शब्द सुनने पड़ेंगे 33"परदेशी! आओ और मेज़ तैयार करो; यदि तुम्हारे पास कुछ हो, तो हमें खिला दो"। 34"परदेशी! चले जाओ, अपने से बड़े आदमी को जगह दो। मेरे भाई आ गये है। मुझे मकान की ज़रूरत है।" 35कोमल हृदय व्यक्ति के लिए ये दो बातें दुःखदायी हैं: परदेशी समझा जाना और ऋणदाता का अपमान।