प्रवक्ता

अध्याय 43

1स्वच्छ नक्षत्रमण्डल और महिमामय आकाश हमारी आँखों के सामने कितने रमणीय हैं! 2सूर्य उदित होते ही मानो कहता है: सर्वोच्च प्रभु की सृष्टि कितनी श्रेष्ठ है! 3दोपहर के समय वह पृथ्वी को झुलसाता है; उसका प्रखर ताप कौन सह सकता है? 4धातु गलाने वाली भट्टी की आग तेज है; पर्वतों को जलाने वाला सूर्य उस से तीन गुना गर्म है। वह भस्म करने वाला धूआँ उगलता है और उसकी प्रखर किरणें चकाचैंधउत्पन्न करती हैं। 5वह प्रभु महान् है, जिसने उसकी सृष्टि की है और जिसके आदेश पर वह तेजी से परिक्रमा करता है। 6चन्द्रमा निश्चित समय पर प्रकाश देता और काल और ऋतु निर्धारित करता है। 7चन्द्रमा के आधार पर पर्व निर्धारित होते हैं। उसका प्रकाश बढ़ता और घटता है। 8चन्द्रमा के अनुसार महीने का नाम रखा जाता है। उसकी वृद्धि और ह्रास अद्भुत हैं। 9वह नभोमण्डल के नक्षत्रों की ध्वजा है और आकाश के शिखर पर शोभायमान है। 10तारे आकाश की शोभा बढ़ाते हैं; वे प्रभु की ऊँचाईयों के चमकते अलंकार है। 11वे परमपावन प्रभु की आज्ञा के अनुसार पंक्तिबद्ध है और अपने जागरण में कभी नहीं थकते। 12इन्द्रधनुष को देख कर उसके सृष्टिकर्ता को धन्य कहो। उसकी भव्यता कितनी रमणीय है! 13वह आकाश में प्रकाशमान् वृत्त खींचता है। सर्वोच्च प्रभु के हाथों ने उसे ताना है। 14वह अपने आदेश द्वारा हिम गिराता और अपने निर्णय के अनुसार बिजली चमकाता है। 15वह अपने भण्डार खोलता और पक्षियों की तरह बादल उड़ जाते हैं। 16वह अपने सामर्थ्य द्वारा बादलों को सघन करता और ओले नीचे गिरते हैं। बिजली की कड़क पृथ्वी को कँपाती है। 17पर्वत उसे देख कर थर्रा उठते हैं। उसके आदेश पर दक्षिणी हवा, 18उत्तर की आँधी और बवण्डर आता है। 19वह उतरने वाले पक्षियों की तरह हिम गिराता और वह टिड्डी दल की तरह छा जाता है। 20वह अपने श्वेत सौन्दर्य से आँख में चकाचैंध उत्पन्न करता और उतरने पर हृदय को मुग्ध कर देता है। 21प्रभु नमक की तरह पृथ्वी पर पाला गिराता है, जो जम कर काँटों की तरह नुकीला हो जाता है। 23लू पर्वतों को खा जाती, मरुभूमि को झुलसाती और हरियाली को आग की तरह जलाती है। 24बादल शीघ्र ही सब में नवजीवन का संचार करते हैं और ओस ग्रीष्म के बाद सब को आनन्दित करती है। 25प्रभु ने अपनी योजना के अनुसार महासागर को शान्त किया और उस में टापू लगा दिये। 26समुद्र पर यात्रा करने वाले उसकी जोखिमों का वर्णन करते और हम सुनकर आश्चर्यचकित हो जाते हैं। 27ये हैं प्रभु के महान् और अद्भुत कार्य, हर प्रकार के जीव-जन्तु और भीमकाय जलचर। 28उसके सामर्थ्य से उसका दूत सकुशल विचरता है और उसके आदेश के अनुसार सब सुसंघटित हैं। 29हम कहाँ तक कहें! उसके महान् कार्यों का अन्त नहीं। हम अन्त में यह कहते हैं: "वहीं सब कुछ है!" 30हम उसकी महिमा का वर्णन करने में असमर्थ हैं; क्योंकि वह अपने कार्यों से कहीं अधिक महान् है। 31प्रभु भीषण और अत्यधिक महान् है, उसका सामर्थ्य आश्चर्यजनक है। 32(32-33) शक्ति भर प्रभु की महत्ता गाओ, क्योंकि वह तुम्हारी स्तुति के परे है। उसकी महिमा श्लाघ्य हैं। 34पूरी शक्ति लगा कर उसकी स्तुति करते जाओ। तुम उसका पूरा-पूरा वर्णन नहीं कर पाओगे। 35किसने उसे देखा, जो उसका वर्णन कर सके? कौन उसके महत्व के अनुसार उसकी महिमा कर सकता है? 36जो दिखता, उस से कहीं अधिक अप्रकट है; क्योंकि हमने उसके कार्यों में से कुछ को ही देखा है। 37प्रभु ने सब कुछ बनाया है और भक्तों को प्रज्ञा का वरदान दिया है।