1अन्धकार में भटकने वाले लोगों ने एक महती ज्योति देखी है, अन्धकारमय प्रदेश में रहने वालों पर ज्योति का उदय हुआ है। 2तूने उन लोगों का आनन्द और उल्लास प्रदान किया है। जैसे फ़सल लुनते समय या लूट बाँटते समय उल्लास होता है, वे वैसे ही तेरे सामने आनन्द मना रहे हैं। 3उन पर रखा हुआ भारी जूआ, उनके कन्धों पर लटकने वाली बहँगी, उन पर अत्याचार करने वाले का डण्डा- यह सब तूने तोड़ डाला है, जैसा कि मिदयान के दिन हुआ था। 4सैनिकों के सभी भारी जूते और समस्त रक्त-रंजित वस्त्र जला दिये गये हैं। 5यह इस लिए हुआ कि हमारे लिए एक बालक उत्पन्न हुआ है, हम को एक पुत्र मिला है। उसके कन्धों पर राज्याधिकार रखा गया है और उसका नाम होगा- अपूर्व परामर्शदाता, शक्तिशाली ईश्वर, शाश्वत पिता, शान्ति का राजा। 6वह दऊद के सिंहासन पर विराजमान हो कर सदा के लिए शन्ति, न्याय और धार्मिकता का साम्राज्य स्थापित करेगा। विश्वमण्डल के प्रभु का अनन्य प्रेम यह कार्य सम्पन्न करेगा। 7प्रभु ने याकूब के विरुद्ध एक सन्देश भेजा है, वह इस्राएल में चरितार्थ होगा। 8एफ्ऱईम की सारी जनता और समारिया के सभी निवासी, उनका अनुभव करेंगे, जो अपने घमण्ड और अहंकार में कहते हैं, 9“ईंट की दीवारें गिर गयी हैं, हम पत्थरों से उनका पुनर्निर्माण करेंगे; गूलर के पेड़ कट गये हैं, हम उनकी जगह देवदार लगायेंगे“। 10किन्तु प्रभु ने उनके विरोधियों को भड़काया और उनके शत्रुओं को उनके विरुद्ध खड़ा किया है, जिससे वे इस्राएल को फाड़ कर खा जायेंः 11पूर्व में अरामियों को ओर पश्चिम में फ़िलिस्तयों को। फिर भी उसका क्रोध शान्त नहीं होता, उसका हाथ उठा रहता है। 12किन्तु ये लोग अपने को मारने वाले की ओर नहीं अभिमुख हुए हैं; उन्होंने सर्वशक्तिमान् प्रभु की शरण नहीं ली। 13इसलिए प्रभु ने एक ही दिन इस्राएल का सिर और पूँछ, खजूर और सरकण्डा, दोनों को काटा है। 14नेता और प्रतिष्ठित लोग सिर हैं, झूठी शिक्षा देने वाले नबी पूँछ हैं। 15इस प्रजा के पथप्रदर्शकों ने उसे भटकाया और भटकायी हुई प्रजा नष्ट हो गयी है। 16प्रभु उसके युवकों पर प्रसन्न नहीं होगा, वह उसके अनाथों और विधवाओं पर दया नहीं करेगा; क्योंकि सब-के-सब अधर्मी और अपराधी हैं, सभी व्यक्ति मूर्खतापूर्ण बातें करते हैं। फिर भी उसका क्रोध शान्त नहीं होता, उसका हाथ उठा रहता है। 17दुष्टता उस आग की तरह जलती है, जो कँटीले झाड़-झंखाड़ भस्म कर देती और जंगल की झाडियाँ जला कर घुएँ के बादलों में उड़ा देती है। 18सर्वशक्तिमान् प्रभु का क्रोध देश को झुलसाता है। प्रजा आग का शिकार बनती है। कोई अपने भाई पर दया नहीं करता । 19लोग दाहिनी ओर से छीन कर खाते हैं और तृप्त नहीं होते। सभी अपने पड़ोसी को खाते हैं। 20मनस्से एफ्ऱेईम को खाता है और एफ्ऱेईम मनस्से को। वे मिल कर यूदा पर टूट पड़ते हैं। फिर भी उसका क्रोध शान्त नहीं होता, उसका हाथ उठा रहता है।