1यिशय के धड़ से एक टहनी निकलेगी, उसकी जड़ से एक अंकुर फूटेगा। 2प्रभु का आत्मा उस पर छाया रहेगा, प्रज्ञा तथा बुद्धि का आत्मा, सुमति तथा धैर्य का आत्मा, ज्ञान तथा ईश्वर पर श्रद्धा का आत्मा। 3वह प्रभु पर श्रद्धा रखेगा। वह न तो जैसे-तैसे न्याय करेगा, और न सुनी-सुनायी के अनुसार निर्णय देगा। 4वह न्यायपूर्वक दीन-दुःखियों के मामलों पर विचार करेगा और निष्पक्ष हो कर देश के दरिद्रों को न्याय दिलायेगा। वह अपने शब्दों के डण्डे से अत्याचारियों को मारेगा और अपने निर्णयों से कुकर्मियों का विनाश करेगा। 5वह न्याय को वस्त्र की तरह पहनेगा और सच्चाई को कमरबन्द की तरह धारण करेगा। 6तब भेड़िया मेमने के साथ रहेगा, चीता बकरी की बगल में लेट जायेगा, बछड़ा तथा सिंह-शावक साथ-साथ चरेंगे और बालक उन्हें हाँक कर ले चलेगा। 7गाय और रीछ में मेल-मिलाप होगा और उनके बच्चे साथ-साथ रहेंगे। सिंह बैल की तरह भूसा खायेगा। 8दुधमुँहा बच्चा नाग के बिल के पास खेलता रहेगा और बालक करैत की बाँबी में हाथ डालेगा। 9समस्त पवित्र पर्वत पर न तो कोई बुराई करेगा और न किसी की हानि; क्योंकि जिस तरह समुद्र जल से भरा है, उसी तरह देश प्रभु के ज्ञान से भरा होगा। 10उस दिन यिशय की सन्तति राष्ट्रों के लिए एक चिह्न बन जायेगी। सभी लोग उनके पास आयेंगे और उसका निवास महिमामय होगा। 11उस दिन प्रभु, पत्रोस, कूश, एलाम, शिनआर, हमात और समुद्र के द्वीपों से अपनी प्रजा के अवशेष का उद्धार करने दूसरी बार अपना हाथ बढ़ायेगा। 12वह राष्ट्रों को संकेत देने एक झण्ड़ा फहरायेगा और इस्राएल के निर्वासितों को एकत्र करेगा। वह यूदा के बिखरे हुए लोगों को पृथ्वी के चार कोनों से एकत्र करेगा। 13एफ्ऱईम की ईर्ष्या समाप्त हो जायेगी और यूदा के शत्रु मिटा दिये जायेंगे। न तो एफ्ऱईम यूदा से फिर ईर्ष्या करेगा और न यूदा एफ्ऱईम से शत्रुता करेगा। 14वे पश्चिम में फ़िलिस्तयों पर टूट पडे़ंगे और मिल कर पूर्व के लोगों को लूटेंगे। वे एदोम एवं मोआब पर अधिकार करेंगे और अम्मोनी उनके अधीन हो जायेंगे। 15प्रभु मिस्र की खाड़ी सुखायेगा। वह फ़रात नदी पर प्रचण्ड लू भेज कर उसे सात धाराओं में विभाजित कर देगा और लोग उसे सूखे पैर पार करेंगे। 16इस प्रकार अस्सूर में मेरी शेष प्रजा के लिए एक मार्ग प्रशस्त किया जायेगा, जिस तरह इस्राएल के लिए हुआ था, जब वह मिस्र से निकला था।