1प्रभु! तू ही मेरा ईश्वर है। मैं तेरी महिमा और तेरे नाम की स्तुति करूँगा; क्योंकि तूने निष्ठापूर्वक अपनी प्राचीन प्रतिज्ञाओं के अनुसार चमत्कारपूर्ण कार्य सम्पन्न किये हैं। 2तूने नगर को मलवे का ढेर और किलाबन्द स्थान को खँडहर बना दिया। विदेशियों का क़िला अब नगर नहीं रहा, उसका फिर कभी पुनर्निर्माण नहीं होगा। 3इसलिए वह शक्तिशाली राज्य तेरी स्तुति करेगा, अत्याचारी राष्ट्रों का नगर तेरा सम्मान करेगा। 4तू दुर्बल की चारदीवारी है, विपत्ति में दरिद्र का सहारा, आँधी-पानी से रक्षा-स्थान अैर तेज धूप से बचने की छाया; क्योंकि अत्याचारियों का गर्जन दीवार से टकराने वाली आँधी और सूखी भूमि पर तेज धूप-जैसा था। 5जिस तरह बादल की छाया गरमी को मन्द करती है, उसी तरह तू बर्बर जातियों का कोलाहल शान्त कर देता है। तू निरंकुश शासकों के विजय-गीत पर रोक लगाता है। 6विश्वमण्डल का प्रभु इस प्रर्वत पर सब राष्ट्रों के लिए एक भोज का प्रबन्ध करेगाः उस में रसदार मांस परोसा जायेगा और पुरानी तथा बढ़िया अंगूरी। 7वह इस पर्वत पर से सब लोगों तथा सब राष्ट्रों के लिए कफ़न और शोक के वस्त्र हटा देगा, 8श्वह सदा के लिए मृत्यु समाप्त करेगा। प्रभु-ईश्वर सबों के मुख से आँसू पोंछ डालेगा। वह समस्त पृथ्वी पर से अपनी प्रजा का कलंक दूर कर देगा। प्रभु ने यह कहा है। 9उस दिन लोग कहेंगे - “देखो! यही हमारा ईश्वर है। इसका भरोसा था। यह हमारा उद्धार करता है। यही प्रभु है, इसी पर भरोसा था। हम उल्लसित हो कर आनन्द मनायें, क्योंकि यह हमें मुक्ति प्रदान करता है।“ 10इस पर्वत पर प्रभु का हाथ बना रहेगा, किन्तु जिस तरह तिनके खाद के ढेर में रौंदे जाते हैं, उसी तरह मोआब प्रभु द्वारा रौंदा जायेगा। 11जिस तरह डूबने वाला हाथ-पैर मारता है, उसी तरह मोआब अपनी बाँहें हिलायेगा, किन्तु प्रभु घमण्डी मोआब को नीचा दिखायेगा। और उसके हर प्रयत्न को निष्फल कर देगा। 12वह तुम्हारी चारदीवारीके ऊँचे किलों को गिरा कर मिट्टी में मिला देगा।