1“याकूब! मेरे सेवक! इस्राएल! मैंने तुम्हें चुना है। मेरी बात सुनो! 2जिसने तुम को बनाया है, जिसने माता के गर्भ में तुम्हें गढ़ा है, जो तुम्हारी सहायता करता है, वही प्रभु यह कहता है- याकूब! मेरे सेवक! तुम मत डरो! इस्राएल! मैंने तुम्हें चुना है। 3मैं प्यासी भूमि पर पानी बरसाऊँगा। मैं सूखी धरती पर नदियाँ बहाऊँगा। मैं तुम्हारे वंशजों को अपना आत्मा और तुम्हारी सन्तति को अपना आशीर्वाद प्रदान करूँगा। 4वे जलस्रोतों के किनारे लगे मजनूँ वृक्षों की तरह, जलाशय के तट की घास की तरह लहलहा उठेंगे। 5एक कहेगा, ’मैं प्रभु का हूँ’, तो दूसरा अपने को याकूब कह कर पुकारेगा। कोई तीसरा अपने हाथ पर लिखेगा, ’मैं प्रभु का हूँ’ और उसका उपनाम इस्राएल होगा। 6“इस्राएल का प्रभु-ईश्वर और उद्धारक, विश्वमण्डल का प्रभु यह कहता हैः प्रथम और अन्तिम मैं हूँ। मेरे सिवा कोई ईश्वर नहीं। 7मेरे समान कौन है? वह आ कर मेरे सामने इसका पूरा-पूरा वर्णन प्रस्तुत करे कि मानवजाति की सृष्टि के समय से क्या-क्या हुआ और क्या-क्या होने वाला है। वह भविय की घोषणा करे। 8“तुम भयभीत न हो, मत डरो। क्या मैंने बहुत पहले यह नहीं बताया और इसकी भवियवाणी नहीं की? क्या तुम मेरे साक्षी नहीं हो? क्या मेरे सिवा कोई ईश्वर है? मैं दूसरी चट्टान नहीं जानता, कोई है ही नहीं।“ 9जो मूर्तियाँ बनाते है, उनका कोई महत्त्व नहीं। जिन देवताओं पर उन्हें विश्वास है, उन से कोई लाभ नहीं। उनके समर्थक कुछ नहीं देख सकते, कुछ नहीं जानते और उन्हें लज्जित होना पड़ेगा। 10वह कौन है, जो ऐसा देवता बनाता या मूर्ति ढालता है, जिस से कोई लाभ नहीं? 11उसके उपासकों को लज्जित होना पड़ेगा; उसके शिल्पकार मात्र मनुष्य हैं। वे सब आ कर मेरे सामने आ जायें- वे भय-भीत हो कर कलंकित होंगे। 12लोहार लोहे की मूर्ति बनाते समय उसे अंगारों पर रखता, हथौड़े से पीटता और मजबूत बाँहों से उसे गढ़ता है। काम करते-करते उसे भूख लगती है और वह कमजोर हो जाता है। यदि वह पानी नहीं पीता, तो बेहोश हो जाता। 13बढ़ई लकड़ी पर डोरी रख कर उस पर निशान लगाता, छेनी से उसे आकार-प्रकार देता और परकार से मापता है। वह उस को मनुष्य के नमूने पर गढ़ता है और मन्दिर में रखने के उद्देश्य से उसे सुन्दर मानव आकृति देता है। 14वह अपना लगाया हुआ देवदार, तिर्जा, बलूत या कोई अन्य वृक्ष काटता अथवा अपना रोपा हुआ कोई चीड़ जिसे वर्षा ने बढ़ाया है। 15यह मनुष्य के लिए ईंधन बन जाता। लोग इसे जला कर तापते हैं अथवा चूल्हे में रख कर रोटी सेंकते। इसी लकड़ी से वे देवता बना कर उसकी उपासना करते अथवा मूर्ति बना कर उसकी दण्डवत् करते हैं। 16वे आधी लकड़ी जलाते, उस पर माँस पका कर अपनी भूख मिटाते और आग सुलगा कर तापते हुए कहते हैं- “अहा गरमी कितनी अच्छी लगती है“। 17शेष लकड़ी से एक ईश्वर, अपनी देवमूर्ति बना कर उसे दण्डवत् करते और उसकी उपासना करते हैं। वे यह कहते हुए उस से प्रार्थना करते हैं, “मेरा उद्धार कर, क्योंकि तू ही मेरा ईश्वर है“। 18ऐसे लोग न तो जानते और न समझते हैं; उनकी आँखें अन्धी हैं, इसलिए वे नहीं देखते; उनके हृदय पर परदा लगा है, इसलिए उन में विवेक नहीं है। 19कोई नही समझता और यह कहते हुए विचार नहीं करता, “मैंने आधी लकड़ी जलायी, चूल्हे पर रोटी सेंकी और माँस पका कर खाया; क्या शेष लकड़ी से घृणित मूर्ति बना कर मुझे उसे दण्डवत् करना चाहिए?“ 20वह ईंधन पर भरोसा रखता है! उसका अविवेकी मन उसे भटकाता है। वह अपने जीवन की रक्षा नहीं कर सकेगा, फिर भी वह यह नहीं सोचता, “जो मेरे हाथ में है, क्या वह धोखा नहीं?“ 21“याकूब! इस बात पर विचार करो। इस्राएल! तुम मेरे सेवक हो। इस बात पर विचार करो। मैंने तुम को गढ़ा और अपना सेवक बनाया। इस्राएल! तुम मेरे साथ विश्वासघात नहीं करोगे। 22मैंने बादल की तरह तुम्हारे अपराध, कोहरे की तरह तुम्हारे पाप मिटा दिये। मेरे पास लौटो, क्योंकि मैं तुम्हारा उद्धारक हूँ।“ 23आकाश! जयकार करो, क्योंकि प्रभु ने यह कार्य सम्पन्न किया। पृथ्वी की गहराइयो! जयघोष करो! पर्वतो, वन और वृक्षों! उल्लसित हो कर गाओ! क्योंकि प्रभु ने याकूब का उद्धार किया, उसने इस्राएल में अपनी महिमा प्रकट की है। 24जिसने तुम्हारा उद्धार किया और तुम को माता के गर्भ में गढ़ा है, वही प्रभु यह कहता है: “मैं प्रभु हूँ। मैंने सब कुछ बनाया है, मैंने ही आकाश ताना है, मैंने ही पृथ्वी को फैलाया है। 25मैं झूठे नबियों की वाणी को व्यर्थ करता और शकुन विचारने वालों को मूर्ख बनाता हूँ। मैं ज्ञानियों को नीचा दिखाता और उनकी विद्या निरर्थक सिद्ध करता हूँ। 26मैं अपने सेवक की वाणी सच प्रमाणित करता और अपने दूतों की योजनाएँ सफल बनाता हूँ। मैं येरूसालेम के विषय में कहता कि वह बसाया जाये और यूदा के नगरों के विषय में कि उनका पुनर्निर्माण हो। जो उजाड़ा गया, मैं उसे फिर बनवाऊँगा। 27मैं विशाल समुद्र से कहता-’सूख जा’ और नदियों से- मैं तुम्हें सुखा दूँगा’। 28मैं सीरुस के विषय में कहता हूँ - ’वह मेरा चरवाहा है, वह यह कहते हुए मेरी इच्छा पूरी करेगा- येरूसालेम का पुनर्निर्माण हो; मन्दिर फिर उठाया जाये।“