1इम्मेर का पुत्र, याजक पशहूर, प्रभु के मन्दिर का प्रमुख निरीक्षक था। उसने यिरमियाह की यह भवियवाणी सुन कर 2उसे पिटवाया और मन्दिर के बेनयामीन नामक ऊपरी के फाठक के काठ में डलवाया। 3जब पशहूर ने दूसरे दिन यिरमियाह को काठ से निकलवाया, तो यिरमियाह ने उस से कहा, “अब से प्रभु तुम को ’पशहूर’ नहीं, बल्कि ’मागोर’ (चारों ओर आतंक) कह कर पुकारेगा; 4क्योंकि प्रभु यह कहता हैः "तुम अपने और अपने मित्रों के लिए आतंक के कारण बनोगे। वे अपने शत्रुओं की तलवारों से मारे जायेंगे और यह तुम स्वयं अपनी आँखों से देखोगे। मैं यूदा के सब लोगों को बाबुल के राजा के हवाले कर दूँगा; वह उन्हें बाबुल में निर्वासित करेगा और उन्हें तलवार के घाट उतारेगा। 5मैं इस नगर की समस्त सम्पत्ति उनके शत्रुओं के हाथ में दूँगा- इसके परिश्रम का सारा फल, इसकी सब बहुमूल्य वस्तुएँ और यूदा के राजाओं के सारे ख़जाने। वे यह लूटेंगे और बाबुल ले जायेंगे 6और तुम पशहूर! तुम अपने घर के सब लोगों के साथ बन्दी बना कर बाबुल ले जाये जाओगे। वहाँ तुम्हारी मृत्यु हो जायेगी और तुम्हारा दफ़न किया जायेगा- तुम और तुम्हारे सभी मित्र, जिन्हें तुमने झूठी भवियवाणियाँ सुनायी हैं’।“ 7प्रभु! तूने मुझे राज़ी किया और मैं मान गया। तूने मुझे मात कर दिया और मैं हार गया। मैं दिन भर हँसी का पात्र बना रहता हूँ। सब-के-सब मेरा उपहास करते हैं। 8जब-जब मैं बोलता हूँ, तो मुझे चिल्लाना और हिंसा तथा विध्वंस की घोषणा करनी पड़ती हैं। ईश्वर का वचन मेरे लिए निरंतर अपमान तथा उपहास का कारण बन गया हैं। 9जब मैं सोचता हूँ, मैं उसे भुलाऊँगा, मैं फिर कभी उसके नाम पर भविय वाणी नहीं करूँगा“ तो उसका वचन मेरे अन्दर एक धधकती आग जैसा बन जाता है, जो मेरी हड्डी-हड्डी में समा जाती है। मैं उसे दबाते-दबाते थक जाता हूँ और अब मुझ से नहीं रहा जाता। 10मैंने बहुतों को यह फुसफुसाते हुए सुना है- “चारों ओर आतंक फैला हुआ हैं। उस पर अभियोग लगाओ! हम उस पर अभियोग लगायें“। जो पहले मेरे मित्र थे, वे सब इस ताक में रहते हैं कि मैं कोई ग़लती कर बैठूँ और कहते हैं, “वह शायद भटक जायेगा और हम उस पर हावी हो कर उस से बदला लेंगे''। 11परन्तु प्रभु एक पराक्रमी शूरवीर की तरह मेरे साथ हैं। मेरे विरोधी ठोकर खा कर गिर जायेंगे। वे मुझ पर हावी नहीं हो पायेंगे और अपनी हार का कटु अनुभव करेंगे। उनका अपयश सदा बना रहेगा। 12विश्वमण्डल के प्रभु! तू धर्मी की परीक्षा करता और मन तथा हृदय की थाह लेता है। मैं अपने को तुझ पर छोड़ता हूँ। मैं दूखूँगा कि तू उन लोगों से क्या बदला लेता है। 13प्रभु का गीत गाओ! प्रभु की स्तुति करो! क्योंकि वह दरिद्रों के प्राणों को दुष्टों के हाथ से छुडाता है। 14जिस दिन मैं पैदा हुआ, वह अभिशप्त हो जिस दिन मेरी माता ने मुझे जन्म दिया, उसे आशीर्वाद न मिले। 15अभिशप्त हो वह व्यक्ति, जिसने मेरे पिता से कहते हुए उसे आनन्दित किया, “तुम को एक पुत्र पैदा हुआ है।“ 16वह व्यक्ति उन नगरों-जैसा बने, जिनका प्रभु ने बिना दया किये विनाश किया है। उसे प्रातः चीत्कार सुनाई पड़े और दिन में लड़ाई का नारा। 17प्रभु ने मुझे गर्भ में क्यों नहीं मारा, जिससे मेरी माता मेरी कब्र बन जाती और मैं उसके गर्भ में सदा पड़ा रहता? 18मैं अपनी माता के गर्भ से क्यों निकला, जिससे मैं कष्ट और दुःख ही सहता रहूँ और प्रतिदिन लज्जा का अनुभव करूँ?