1मुझे प्रभु की यह वाणी सुनाई पड़ी, 2“मानवपुत्र! यह कहो, ’इस्राएल का प्रभु-ईश्वर कहता हैः अन्त! देश के चारों कोनों पर अन्त आ गया है! 3अब तुम्हारा अन्त है और मैं तुम पर अपना कोप बरसाऊँगा। तुम्हारे आचरण के अनुसार तुम्हारा न्याय करूँगा और तुम्हारे वीभत्स कर्मों के लिए तुम्हें दण्ड दूँगा। 4तुम न तो मेरी दृष्टि से बच सकोगे और न ही मैं तुम पर दया दिखलाऊँगा; क्योंकि मैं तुम्हारे बीच के वीभत्स कर्मों और साथ ही पापपूर्ण आचरण के लिए तुम्हें दण्ड दूँगा। तुम तभी यह समझोगे कि मैं ही प्रभु हूँ।’ 5“प्रभु-ईश्वर यह कहता हैः विपत्ति-पर-विपत्ति! देखो, वह आ रही है। 6अन्त आ गया है, अन्त आ ही गया है। वह तुम्हारे विरुद्ध जाग उठा है। देखो, वह आ रहा है। 7इस देश के निवासियों! तुम्हारा विनाश तुम्हारे निकट आ गया है। वह समय आ गया है, वह दिन समीप है- विप्लव का, न कि पर्वतों पर प्रसन्न कोलाहल का दिन। 8मैं तुम पर अपना कोप बरसाऊँगा और तुम पर मेरा क्रोध शान्त हो जायेगा। मैं तुम्हारा न्याय तुम्हारे आचरण के अनुसार करूँगा और तुम्हारे सभी वीभत्स कर्मों का लेखा लूँगा। 9मैं तुम पर न तो दया दिखाऊँगा और न तुम मेरी दृष्टि से बच सकोगे। मैं तुम को तुम्हारे आचरण के अनुसार दण्ड दूँगा और तुम्हारे वीभत्स कर्म तुम्हारे यहाँ रह जायेंगे। तुम तभी यह समझोगे कि मैं, प्रभु, तुम पर आघात कर रहा हूँ। 10“देखो, वह दिन! देखो, वह आ रहा है! तुम्हारा अन्त आ गया है। डाली खिल रही है, घमण्ड फूल रहा है। 11हिंसा दुष्टता की लाठी बन गयी है। उनका कुछ भी शेष नहीं रहेगा- न तो उनकी समृद्धि और न उनकी सम्पत्ति। उन में कोई बड़प्पन नहीं रहेगा। 12वह समय आ गया है, वह दिन पास आ गया है। ख़रीदने वाला आनन्दित न हो, बेचने वाला शोक न मनाये; क्योंकि उनके समस्त समुदाय पर कोप भड़क गया है। 13बेचने वाले को जीवन भर वह वापस नहीं मिलेगा, जो उसने बेच दिया; क्योंकि उनके समस्त समुदाय पर कोप भड़क गया है, वह पीछे नहीं मुडे़गा और अपने पापों के कारण कोई अपने जीवन की रक्षा नहीं कर पायेगा। 14“वे तुरही बजा कर तैयार हो गये हैं; लेकिन उन में कोई भी युद्ध करने नहीं जा पायेगा; क्योंकि मेरा कोप उनके समस्त समुदाय पर भड़क उठा है। 15बाहर तलवार चल रही है, भीतर महामारी और अकाल है। जो देहात में है, वह तलवार से मारा जाता है और जो नगर में है, वह अकाल और महामारी का आहार बन गया है। 16जो बच कर भागंेगे, वे पहाड़ों पर घाटियों के कराहने वाले कबूतरों-जैसे हो जायेंगे। सभी अपने-अपने पापों के कारण मरेंगे। 17सब के हाथ शक्तिहीन हो जायेंगे और सब के घुटने शिथिल। 18वे कमर में टाट लपेटेंगे और उन पर आतंक छा जायेगा। सभी चेहरों पर लज्जा दिखाई देगी और उनके माथे पर गंजापन। 19वे अपनी चाँदी सड़कों पर फेकेंगे और अपना सोना उन्हें अपवित्र लगने लगेगा। प्रभु के कोप के दिन उनका चाँदी-सोना उनकी रक्षा नहीं कर पायेगा। इस से वे न तो अपनी भूख मिटा सकेंगे और न अपना पेट ही भर सकेंगे यही उनके पापों के कारण रहा है। 20वे झूठे अंहकार के लिए अपने सुन्दर आभूषणों का उपयोग करते थे तथा वे उस से अपनी वीभत्स मूर्तियाँ और घृणित वस्तुएँ बनाते थे। इसीलिए मैं उनके आभूषणों को उनके लिए अशुद्ध वस्तु बना दूँगा। 21मैं इसे लूट के रूप में विदेशियों के हाथ में और लूट के माल के रूप में पृथ्वी के दुष्टों को दे दूँगा। 22“मैं उन से अपना मुँह मोड़ लूँगा; वे मेरी अमूल्य निधि को अपवित्र कर देंगे। उस में लुटेरे प्रवेश करेंगे और उसे अपवित्र कर देंगे और 23वे लोगों का वध करेंगे; क्योंकि देश में हत्या का बोलबाला है और नगर में हिंसा की भरमार है। 24मैं उनके घरों पर अधिकार करने के लिए सब से बुरे राष्ट्रों को ले आऊँगा। मैं उनकी घमण्डभरी शक्ति को समाप्त कर दूँगा और उनके पवित्र स्थान अपवित्र किये जायेंगे। 25आतंक आ रहा है। वे शांति खोजेंगे, लेकिन वह नहीं मिलेगी। 26विपत्ति-पर-विपत्ति आयेगी, अफ़वाह-पर अफ़वाह फैलेगी। वे नबी से दिव्य दृश्य चाहेंगे। न तो याजक में उपदेश की क्षमता रहेगी और न नेताओं में परामर्श की। 27राजा शोक मनायेगा, राज्याधिकारी पर निराशा छा जायेगी। देश की जनता के हाथ आतंक से काँपेंगे। मैं उनका न्याय उनके आचरण के अनुसार और उनका निर्णय उनके निर्णयों के अनुसार करूँगा और वे यह समझ जायेंगे कि मैं ही प्रभु हूँ।“