1मुझे प्रभु की वाणी यह कहते हुए सुनाई पड़ी: 2“मानवपुत्र! क्या तुम न्याय करोगे? क्या हत्यारे नगर का तुम न्याय करोगे? तो उसे अपने सभी वीभत्स कर्म बतला दो। 3कहो, ‘प्रभु-ईश्वर यह कहता हैः धिक्कार उस नगर को, जो अपने यहाँ रक्त बहाता है, जिससे उसका समय समीप आ जाये और देवमूर्तियों का निर्माण कर अपने को अपवित्र बनाता है! 4तुम अपने द्वारा बहाये हुए रक्त के कारण दोषी और अपने द्वारा निर्मित देवमूर्तियों द्वारा अपवित्र हो गये हो; तुमने अपना अन्त निकट बुला लिया है, तुम्हारा अन्त-समय आ गया है। इसलिए मैंने तुम को राष्ट्रों के लिए निन्दनीय और सभी देशों के लिए उपहास का पात्र बना दिया है। 5तुम्हारे निकट और दूर के राष्ट्र तुम्हारे अपयश और अशान्ति के कारण तुम्हारी हँसी उड़ायेंगे। 6“तुम्हारे यहाँ रहने वाले इस्राएल के पदाधिकारियों में से प्रत्येक अपनी-अपनी शक्ति भर रक्त बहाने पर तुला हुआ है। 7तुम्हारे यहाँ माता-पिता का अपमान होता है। प्रवासियों को सताया जाता है और अनाथों तथा विधवाओं के साथ अन्याय किया जाता है। 8तुमने मेरी पवित्र वस्तुओं का अनादर किया है और मेरे विश्राम-दिवसों की पवित्रता भंग की है। 9तुम्हारे यहाँ ऐसे लोग हैं, जो रक्त बहाने के लिए झूठे दोष मढ़ते हैं और जो पहाड़ी पूजास्थानों में प्रसाद खातें हैं। तुम्हारे यहाँ ऐसे लोग हैं, जो व्यभिचार करते हैं। 10तुम्हारे यहाँ लोग पिता की शय्या अपवित्र करते हैं; वे तुम्हारे यहाँ रजस्वला स्त्रियों को बाध्य करते हैं। 11कोई अपने पड़ोसी की पत्नी का शील भंग करता है; कोई अपनी पुत्रवधु को भ्रष्ट करता है; कोई अपने ही पिता की सन्तान, अपनी बहन के साथ बलात्कार करता है। 12तुम्हारे यहाँ लोग हत्या करने के लिए घूस लेते हैं: तुम ब्याज लेते, सूदखोरी करते और अपने पड़ोसियों से पैसा ऐंठते हो। प्रभु-ईश्वर कहता हैः तुमने मुझ को भुला दिया है। 13“मैं तुम्हारे अन्याय से उपार्जित लाभ और तुम्हारे यहाँ बहाये गये रक्त पर तालियाँ बजाऊँगा। 14क्या उन दिनों, जब मैं तुम से हिसाब लूँगा, तुम्हारा साहस बना रहेगा या तुम्हारे हाथ दृृढ़ रह सकेंगे? यह मैं प्रभु ने कहा है और मैं इसे पूरा करूँगा। 15मैं तुम्हें राष्ट्रों में बिखेर दूँगा और देश-देश में तितर-बितर कर दूँगा और तुम्हें अपनी अपवित्रता से मुक्त कर दूँगा। 16तुम राष्ट्रों के सामने अपने पापों के कारण अपवित्र बन जाओगे और तब तुम यह समझोगे कि मैं ही प्रभु हूँ।“ 17मुझे प्रभु की वाणी यह कहते हुए सुनाई पड़ी: 18“मानवपुत्र! इस्राएल का घराना मेरी दृष्टि में धातुमल हो गया है; वे सभी भट्टी में गलायी गयी चाँदी, काँसे, राँगे, लोहे और सीसे का मल हो गये हैं। 19अतः प्रभु-ईश्वर कहता हैः तुम सभी धातुमल हो गये हो, इसीलिए मैं तुम्हें येरूसालेम में एकत्रित करूँगा। 20जैसे लोग भट्टी में चाँदी, काँसा, लोहा, सीसा और राँगा एकत्रित कर उन्हें गलाने के लिए आग सुलगाते हैं, वैसे ही मैं अपने क्रोध और रोष में तुम को एकत्रित करूँगा और उस में डाल कर गलाऊँगा। 21में तुम्हें एकत्रित करूँगा, तुम को अपने क्रोध की आग से फूँकूँगा और तुम उस में गल जाओगे। 22जैसे भट्टी में चाँदी गलायी जाती है, वैसे तुम भी उस में गलाये जाओगे और तब तुम यह जान जाओगे कि मैं, प्रभु, ने तुम पर अपना क्रोध बरसाया है।“ 23मुझे प्रभु की वाणी यह कहते हुए सुनाई पड़ी: 24“मानवपुत्र! उस से यह कहो, ’तुम एक ऐसा देश हो, जिस पर न तो मेरे कोप के दिन पानी पड़ा है और न वर्षा हुई है।’ 25उसके पदाधिकारी अपने शिकार को फाड़ते समय गरजने वाले सिहं की तरह हैं। उन्होंने नर-भक्षण किया है। उन्होंने उनका धनकोष और बहुमूल्य पदार्थ छीने हैं। उन्होंने उसके यहाँ अनेक स्त्रियों को विधवा बनाया है। 26उसके याजकों ने मेरा विधान भंग किया है और मेरी पवित्र वस्तुओं को अपवित्र किया है। उन्होंने पवित्र और लौकिक में भेद नहीं किया है। उन्होंने अशुद्ध और शुद्ध की शिक्षा नहीं दी है। उन्होंने मेरे विश्राम-दिवसों की अवहेलना की है और इस से मेरे नाम को अपवित्र किया है। 27उसके यहाँ के पदाधिकारी भेड़ियों के सदृश हैं। वे अपने शिकार को फाड़ते, खून बहाते और अनुचित लाभ के लिए हत्या करते है। 28उनके नबी उन पर सफ़ेदी पोतते हैं, जो उनके लिए झूटे दिव्य दृश्य देखते और झूठे शकुन विचारते हुए यह बोलते हैं, ’प्रभु-ईश्वर यह कहता है’, जब कि प्रभु ने नहीं कहा है। 29इस देश के लोगों ने पैसा ऐंठा है, दूसरों का धन छीना है; उन्होंने निर्धन और अभावग्रस्त लोगों पर अत्याचार किया है तथा प्रवासियों का अन्यायपूर्ण शोषण किया है। 30मैंने एक ऐसे व्यक्ति की खोज की, जो मोरचाबन्दी करे और जो मेरे सामने दीवार पर खड़ा हो कर उसकी रक्षा करे; किन्तु मुझे ऐसा कोई नहीं मिला। 31इसलिए मैंने उन पर क्रोध बरसाया है; अपनी कोपाग्नि में उन्हें भस्म कर दिया है; मैंने उनके आचरण का बदला उनके सिर चुकाया है। यह प्रभु की वाणी है।“