1और मेदी राजा दारा को राज्य मिल गया, जो तब बासठ वर्ष का था। 2दारा ने अपने सम्पूर्ण राज्य पर एक सौ बीस क्षतप्रों को नियुक्त किया 3और उन पर तीन अध्यक्षों को, जिन में स्वयं दानिएल भी था, जिन को क्षतप्र उत्तरदायी हों, जिससे राजा को कोई क्षति न पहुँचे। 4अपनी अद्भूत प्रतिभा के कारण दानिएल अन्य क्षतप्रों और मन्त्रियों की अपेक्षा अधिक प्रतिष्ठित होने लगा, तथा राजा उसे समस्त राज्य के ऊपर नियुक्त करने की सोचने लगा। 5तब क्षतप्र और अध्यक्ष दानिएल के प्रशासनिक कार्यों को ठुकराने का बहाना ढूँढ़ने लगे, किन्तु उस से शिकायत का कोई आधार या कोई दोष नहीं मिला। दानिएल ईमानदार था; उस में कोई त्रुटि या दोष नहीं मिला। 6अतः उन्होंने आपस में परामर्श कर लिया, "सिवा उसके धर्माचरण के हम दानिएल के व्यवहार में उस पर कोई आरोप नहीं कर पायेंगे।" 7ये अध्यक्ष और क्षतप्र राजा से मिलने का अच्छा मौका ढूँढ़ कर उस से बोले, "राजा दारा चिरायु हों! 8आपके राज्य के मन्त्री, अध्यक्ष, और क्षतप्र, दरबारी और राज्यपाल इस पर एकमत हैं कि आप एक आदेश और निषेधाज्ञा लागू करें कि अगले तीस दिनों के अन्दर यदि कोई महाराज के अतिरिक्त किसी अन्य देवता अथवा मनुष्य से प्रार्थना करे, तो महाराजा! आप उसे सिंहों के खंड्ड में डाल देंगे। 9राजा! यह निषेधाज्ञा तुरन्त लागू कर उसके प्रलेख पर हस्ताक्षर कर दें, जिससे कि वह अटल बने। मेदियों और फारसियों की विधियों की तरह जो रद्द नहीं की जा सकती, उसे भी नहीं बदला जा सकता।" 10अतः राजा दारा ने प्रलेख और निषेधाज्ञा पर हस्ताक्षर कर उसे जारी कर दिया। 11जब दानिएल को पता चला कि निषेधाज्ञा पर हस्ताक्षर हो चुके हैं, तो वह अपने घर चला गया। वहाँ अपने कोठे में येरूसालेम की ओर खुलने वाली खिड़कियाँ थीं। वहाँ अपने रिवाज के अनुसार वह प्रतिदिन तीन बार घुटनों के बल अपने ईश्वर की धन्यवाद की प्रार्थना पढ़ता था। 12कुछ लोगों ने दानिएल के यहाँ पहुँचने पर उसे अपने ईश्वर से प्रार्थना और अनुनय-विनय करते पाया। 13वे राजा से मिलने गये और उसे राजकीय निषेधाज्ञा का स्मरण दिलाते हुए बोले, "राजा! क्या आपने यह निषेधाज्ञा नहीं निकाली कि तीस दिनों तक जो कोई आप को छोड़ कर किसी भी देवता अथवा मनुष्य से प्रार्थना करेगा, वह सिंहों के खड्ड में डाल दिया जायेगा?" राजा ने उत्तर दिया, "यह मेदियों और फारसियों के अपरिवर्तनीय कानून के अनुसार सुनिश्चित है।'' 14इस पर उन्होंने राजा से कहा, "दानिएल- यूदा के निर्वासितों में से एक- आपके द्वारा घोषित निषेधाज्ञा की परवाह नहीं करता। वह दिन में तीन बार अपने ईश्वर से प्रार्थना करता है।" 15राजा को यह सुन कर बहुत दुःख हुआ। उसने दानिएल को बचाने को निश्चत किया और सूर्यास्त तक कोई रास्ता खोज निकालने का प्रयत्न किया। 16किन्तु उन लोगों ने यह कहते हुए राजा से अनुरोध किया, "राजा! स्मरण रखिए कि मेदियों और फारसियों के कानून के अनुसार राजा द्वारा घोषित कोई भी निषेधाज्ञा अथवा आदेश अपरिवर्तनीय है"।। 17इस पर राजा ने दानिएल को ले आने और सिंहों के खड्ड में डालने का आदेश दिया। उसने दानिएल से कहा, "तुम्हारा ईश्वर, जिसकी तुम निरन्तर सेवा करते हो, तुम्हारी रक्षा करे"। 18एक पत्थर खड्ड के द्वार पर रखा गया और राजा ने उस पर अपनी अंगूठी और अपने सामन्तों की अंगूठी की मुहर लगायी, जिससे कोई भी दानिएल के पक्ष में हस्तक्षेप न कर सके। 19इसके बाद राजा अपने महल चला गया; उसने उस रात को अनशन किया और अपनी उपपत्नियों को नहीं बुलाया। उसे नींद नहीं आयी और वह सबेरे, 20पौ फटते ही उठा, और सिंहों के खड्ड की ओर जल्दी-जल्दी चल पड़ा। 21खड्ड के निकट आ कर उसने दुःख भरी आवाज़ में दानिएल को पुकार कर कहा, "दानिएल! जीवन्त ईश्वर के सेवक! तुम जिस ईश्वर की निरन्तर सेवा करते हो, क्या वह तुम को सिंहों से बचा सका?" 22दानिएल ने राजा को उत्तर दिया, "राजा! आप सदा जीते रहें! 23मेरे ईश्वर ने अपना दूत भेज कर सिंहों के मुँह बन्द कर दिये। उन्होंने मेरी कोई हानि नहीं की, क्योंकि मैं ईश्वर की दृष्टि में निर्दोष था। 24राजा! मैंने आपके विरुद्ध भी कोई अपराध नहीं किया।" राजा आनन्दित हो उठा और उसने दानिएल को खड्ड से बाहर निकालने का आदेश दिया। इस पर दानिएल को खड्ड से बाहर निकाला गया; उसके शरीर पर कोई घाव नहीं था क्योंकि उसने अपने ईश्वर पर भरोसा रखा था। 25जिन लोगों ने दानिएल पर अभियोग लगाया था, राजा ने उन्हें बुला भेजा और उन को अपने पुत्रों तथा पत्नियों के साथ सिंहों के खड्ड में डाल देने का आदेश दिया। वे खड्ड के फर्श तक भी नहीं पहुँचे थे कि सिंहों न उन पर टूट कर उनकी सब हाड्डियाँ तोड़ डाली 26इसके बाद राजा ने पृथ्वी भर के लोगों, राष्ट्रों और भाषा-भाशियों को लिखा, 27"आप लोगों को शांति मिले! मेरी राजाज्ञा यह है कि मेरे राज्य क्षेत्र समस्त क्षेत्र के लोग दानिएल के ईश्वर पर श्रद्धा रखें और उससे डरेंः क्योंकि वह सदा बना रहने वाला जीवन्त ईश्वर है, उसका राज्य कभी नष्ट नहीं किया जायेगा और उसके प्रभुत्व का कभी अंत नहीं होगा। 28वह रक्षा करता और बचाता है, वह स्वर्ग और पृथ्वी पर चिह्न और चमत्कार दिखाता है, उसने दानिएल को सिंहों के पंजों से छुडाया है।" 29इस प्रकार दानिएल दारा और सीरूस के शासनकाल में फलता-फूलता रहा।