1राजा दारा के शासनकाल के चैथे वर्ष किसलेव नामक नौवें महीने के चैथे दिन जकर्या को प्रभु-ईश्वर की वाणी प्राप्त हुई। 2उस दिन बेतेल-निवासियों ने प्रभु-ईश्वर से प्रार्थना करने के लिए सरएसेर और रेगेम-मेलेक तथा उनके साथियों को भेज दिया। 3उन को विश्वमण्डल को प्रभु के याजकों से तथा नबियों से यह प्रश्न पूछना थाः "क्या अब भी मैं पाँचवें महीने में शोक मनाते हुए उपवास रखूँ, जैसा मैं पिछले कई वर्षों से करता आया हूँ?" 4तब मुझे विश्वमण्डल के प्रभु की यह वाणी प्राप्त हुई; 5"देश के सब निवासियों और याजकों से यह कह दोः इन सत्तर वर्षों में तुम जो पाँचवे और सातवें महीने में शोक मनाते हुए उपवास रखते आ रहे थे, क्या मेरे ही आदर में उपवास का व्रत रख रहे थे? 6और खाने-पीने में तुम लोग अपने ही लिए न खाते-पीते थे? 7जिस समय येरूसालेम और उसके पडोसी नगर शान्तिपूर्वक आबाद थे और नेगेब तथा निचले प्रदेश आबाद थे, उस समय नबियों के द्वारा प्रभु-ईश्वर से प्राप्त वचन तुम लोग नहीं जानते हो?" 8ज़कर्या को प्रभु-ईश्वर की यह वाणी प्राप्त हुईः 9"यह विश्वमण्डल के प्रभु का कथन हैः विधि-विधानों पर न्यायपूर्वक अमल करना और अपने भाइयों के साथ करुणा और दया का व्यवहार करना; 10विधवा, अनाथ, परदेशी और गरीब को न सताना, न एक दूसरे के प्रति दुर्भावना रखना" 11किन्तु उन्होंने ध्यान देने से इन्कार किया; उन्होंने ध्यान देने से इन्कार किया; उन्होंने पीठ दिखायी और नहीं सुनने के लिए कानों पर हाथ रख दिये। 12प्राचीन काल के नबी विश्वमण्डल के प्रभु की प्रेरणा से जो वचन और शिक्षा देते थे, उसे उन्होंने वज्र की तरह अपने हृदय कठोर बना कर नहीं सुनना चाहा। इससे विश्वमण्डल के प्रभु की क्रोधाग्नि प्रज्वलित हो उठी। 13अतः ऐसा हुआ कि वह उन को पुकारता रहा, किन्तु उन्होंने उसकी कुछ नहीं सुनी। वैसे ही, विश्वमण्डल के प्रभु ने निश्चय किया कि जब वे मुझे पुकारेंगे भी, तो मैं नही सुनूँगा। 14उलटे उसने उन्हें अपरिचित राष्ट्रों के बीच तितर-बितर कर दिया; और उनके चले जाने पर उनका देश उजड़ कर सुनसान और निर्जन हो गया। इस प्रकार उन्होंने सुख-समृद्धिपूर्ण देश को उजाड बना दिया।