1प्रभु-ईश्वर यह कहता है, “देखो, मैं अपने दूत भेजूँगा, जिससे वह मेरे लिए मार्ग तैयार करे। वह प्रभु, जिसे तुम खोजते हो, अचानक अपने मन्दिर आ जायेगा। देखो, विधान का वह दूत, जिस के लिए तुम तरसते हो, आ रहा है। 2कौन उसके आगमन के दिन का सामना कर सकेगा? जब वह प्रकट होगा, तो कौन टिकेगा? क्योंकि वह सुनार की आग और धोबी के खार के सदृश है। 3वह चाँदी गलाने वाले और शोधन करने वाले की तरह बैठ कर लेवी के पुत्रों को शुद्ध करेगा और सोने-चाँदी की तरह उनका परिष्कार करेगा। 4तब वे योग्य रीति से ईश्वर को भेंट चढ़ायेंगे और प्रभु-ईश्वर प्राचीन काल की तरह यूदा और यरूसलेम की भेंट स्वीकार करेगा। 5विश्वमण्डल का प्रभु कहता है: मैं अदालत में तुम्हारे प्रतिपक्षी के रूप में उपस्थित हो जाऊँगा; मैं इन सभी लोगों के विरुद्ध तुरन्त साक्य दे दूँगा: ओझाओं, व्यभिचारियों, झूठी शपथ खाने वालों, मज़दूरों को उचित मज़दूरी न देने वालों, विधवाओं और अनाथों को सताने वालों, प्रवासियों के अधिकार छीनने वालों और मुझ से न डरने वालों के विरुद्ध। 6मैं, प्रभु-ईश्वर, बदलता नहीं। इसलिए, याकूब की सन्तान! तुम्हारा विनाश नहीं हुआ। 7अपने पूर्वजों के समय से तुम मेरी विधियों की अवहेलना कर उनका पालन नहीं करते आये हो। तुम मेरे पास लौट आओ, तो मैं तुम्हारे पास लौटूँगा - यह विश्वमण्डल के प्रभु की वाणी है। तुम पूछोगे, ‘हम कैसे लौटें?’ 8क्या मनुष्य ईश्वर को ठग सकता है? फिर भी तुम मुझ को ठग रहे हो। तुम फिर पूछोगे, ‘हम किस प्रकार तुझे ठग रहे हैं?’ तुम दशमांश और भेंटों में मुझे ठग रहे हो?’ 9तुम पर, हाँ, तुम्हारे सारे राष्ट्र पर शाप लगा है, क्योंकि तुम मुझे धोखा दे रहे हो। 10तुम पूरा दशमांश और भेंटें भण्डार के पास लाओ, जिससे मेरे घर में भोजन रहे। विश्वमण्डल का प्रभु यह कहता है: इस में मुझे परख लो; मैं अपने बादलों को आज्ञा दूँगा और तुम पर भरपूर वर्षा की आशिष प्रदान करूँगा। 11मैं तुम्हारे लिए टिड्डियों को भी कड़ी आज्ञा दूँगा कि वे तुम्हारी भूमि की उपज नष्ट न करें, जिससे दाखबारियों की दाखलताएँ अच्छे फल देती रहें। 12विश्वमण्डल का प्रभु यह कहता है: सभी राष्ट्र तुम को धन्य कहेंगे, ‘क्योंकि तुम्हारा देश एक मनोहर देश होगा’। 13प्रभु कहता है: तुम लोगों ने मेरे विषय में कठोर शब्द कहे हैं। फिर भी तुम पूछते हो, ‘हमने आपस में तेरे विरुद्ध क्या कहा है?’ 14तुम लोगों ने यह कहा, ‘ईश्वर की सेवा करना व्यर्थ है। उसकी आज्ञाओं का पालन करने से और विश्वमण्डल के प्रभु के लिए टाट के कपड़े पहनने से हमें क्या लाभ? 15हम तो घमण्डियों को धन्य समझते हैं - जो बुराई करते हैं, वे फलते-फूलते हैं और जो ईश्वर की परीक्षा लेते हैं, उन्हें कोई हानि नहीं होती’। 16तब प्रभु-भक्तों ने आपस में बातें की। प्रभु ने ध्यान दे कर उनकी बातचीत सुनी और उसके सामने प्रभु-भक्तों और उसके नाम पर श्रद्धा रखने वालों के विषय में एक स्मारिका लिखी गयी। 17विश्वमण्डल का प्रभु कहता है: “जो दिन मैंने निश्चित किया, उस दिन वे मेरे अपने होंगे और जिस तरह कोई अपनी सेवा करने वाले पुत्र पर दया करता है, उसी तरह मैं भी उन पर दया करूँगा। 18तब तुम लोग धर्मी और विधर्मी, ईश्वर की सेवा करने और उसकी सेवा नहीं करने वाले, दोनों का भेद पहचानने लगोगे। 19(4:1) क्योंकि वह दिन आ रहा है। वह धधकती भट्टी के सदृश है। सभी अभिमानी तथा कुकर्मी खूँटियों के सदृश होंगे। विश्वमण्डल का प्रभु यह कहता है: वह दिन उन्हें भस्म कर देगा। उनका न तो डंठल रह जायेगा और न जड़ ही। 20(4:2) किन्तु तुम पर, जो मुझ पर श्रद्धा रखते हो, धर्म के सूर्य का उदय होगा और उसकी किरणें तुम्हें स्वास्थ्य प्रदान करेंगी। तब तुम उसी प्रकार उछलने लगोगे, जैसे बछड़े बाड़े से निकल कर उछलने-कूदने लगते हैं। 21(4:3) विश्वमण्डल का प्रभु यह कहता है: जिस दिन मैंने निश्चित किया, उस दिन तुम राख जैसे दुष्कर्मियों को पाँवों के नीचे रौंदोगे। 22(4:4) मेरे सेवक मूसा के विधि-विधान को स्मरण करो, जिसके द्वारा मैंने होरेब पर्वत पर समस्त इस्राएल के लिए रीतिरिवाज निर्धारित किये थे। 23(4:5)“देखो, उस महान् एवं भयानक दिन के पहले, प्रभु के दिन के पहले, मैं नबी एलियाह को तुम्हारे पास भेजूँगा। 24(4:6) वह पिता का हृदय पुत्र की ओर अभिमुख करेगा और पुत्र का हृदय पिता की ओर। कहीं ऐसा न हो कि मैं आ कर देश का सर्वनाश कर दूँ।“