1अपना यह उपदेश समाप्त कर ईसा गलीलिया से चले गये और यर्दन के पार यहूदिया प्रदेश पहुँचे। 2एक विशाल जनसमूह उनके पीछे हो लिया और ईसा ने वहाँ लोगों को चंगा किया। 4ईसा ने उत्तर दिया, "क्या तुम लोगों ने यह नहीं पढ़ा कि सृष्टिकर्ता ने प्रारंभ से ही उन्हें नर-नारी बनाया। 5और कहा कि इस कारण पुरुष अपने माता-पिता को छोडे़गा और अपनी पत्नी के साथ रहेगा, और वे दोनों एक शरीर हो जायेंगे? 6इस तरह अब वे दो नहीं, बल्कि एक शरीर है। इसलिए जिसे ईश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग नहीं करे।" 7उन्होंने ईसा से कहा, "तब मूसा ने पत्नी का परित्याग करते समय त्यागपत्र देने का आदेश क्यों दिया? 8ईसा ने उत्तर दिया, "मूसा ने तुम्हारे हृदय की कठोरता के कारण ही तुम्हें पत्नी का परित्याग करने की अनुमति दी, किन्तु प्रारम्भ से ऐसा नहीं था। 9मैं तुम लोगों से कहता हूँ कि व्यभिचार के सिवा किसी अन्य कारण से जो अपनी पत्नी का परित्याग करता और किसी दूसरी स्त्री से विवाह करता है, वह भी व्यभिचार करता है।" 10शिष्यों ने ईसा से कहा, "यदि पति और पत्नी का सम्बन्ध ऐसा है, तो विवाह नहीं करना अच्छा ही है"। 11ईसा ने उन से कहा "सब यह बात नहीं समझते, केवल वे ही समझते हैं जिन्हें यह वरदान मिला है; 12क्योंकि कुछ लोग माता के गर्भ से नपुंसक उत्पन्न हुए हैं, कुछ लोगों को मनुष्यों ने नपुंसक बना दिया है और कुछ लोगों ने स्वर्गराज्य के निमित्त अपने को नपुंसक बना लिया है। जो समझ सकता है, वह समझ ले।" 13उस समय लोग ईसा के पास बच्चों को लाते थे, जिससे वे उन पर हाथ रख कर प्रार्थना करें। शिष्य लोगों को डाँटते थे, 14परन्तु ईसा ने कहा, "बच्चों को आने दो और उन्हें मेरे पास आने से मत रोको, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन-जैसे लोगों का है"। 15और वह बच्चों पर हाथ रख कर वहाँ से चले गये। 16एक व्यक्ति ईसा के पास आ कर बोला, "गुरुवर! अनन्त जीवन प्राप्त करने के लिए मैं कौन-सा भला कार्य करूँ?" 17ईसा ने उत्तर दिया, "भले के विषय में मुझ से क्यों पूछते हो? एक ही तो भला है। यदि तुम जीवन में प्रवेश करना चाहते हो, तो आज्ञाओं का पालन करो।" 18उसने पूछा, "कौन-सी आज्ञाएं?" ईसा ने कहा, "हत्या मत करो; व्यभिचार मत करो; चोरी मत करो; झूठी गवाही मत दो; 19अपने माता-पिता का आदर करो; और अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो"। 20नवयुवक ने उन से कहा, "मैने इन सब का पालन किया है। मुझ में किस बात की कमी है?" 21ईसा ने उसे उत्तर दिया, "यदि तुम पूर्ण होना चाहते हो, तो जाओ, अपनी सारी सम्पत्ति बेच कर गरीबों को दे दो और स्वर्ग में तुम्हारे लिए पूँजी रखी रहेगी, तब आकर मेरा अनुसरण करो।" 22यह सुन कर वह नव-युवक बहुत उदास हो कर चला गया, क्योंकि वह बहुत धनी था। 23तब ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, "मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ - धनी के लिए स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना कठिन होगा। 24मैं यह भी कहता हूँ कि सूई के नाके से हो कर ऊँट का निकलना अधिक सहज है, किन्तु धनी का ईश्वर के राज्य में प्रवेश करना कठिन है।" 25यह सुनकर शिष्य बहुत अधिक विस्मित हो गये और बोले, "तो फिर कौन बच सकता है।" 26उन्हें स्थिर दृष्टि से देखते हुए ईसा ने कहा, "मनुष्यों के लिए तो यह असम्भव है। ईश्वर के लिए सब कुछ सम्भव है।" 27तब पेत्रुस ने ईसा से कहा, "देखिए, हम लोग अपना सब कुछ छोड़ कर आपके अनुयायी बन गये हैं। तो, हमें क्या मिलेगा?" 28ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, "मैं तुम, अपने अनुयायियों से यह कहता हूँ - मानव पुत्र जब पुनरुत्थान में अपने महिमामय सिहांसन पर विराजमान होगा, तब तुम लोग भी बारह सिंहासनों पर बैठ कर इस्राएल के बारह वंशों का न्याय करोगे। 29और जिसने मेरे लिए घर, भाई-बहनों, माता-पिता, पत्नी, बाल-बच्चों अथवा खेतों को छोड दिया है, वह सौ गुना पायेगा और अनन्त जीवन का अधिकारी होगा। 30बहुत-से लोग, जो अगले हैं, पिछले हो जायेंगे और जो पिछले हैं, अगले हो जायेंगे।