1जिन बातों के विषय में आप लोगों ने लिखा है, उन पर मेरा विचार यह है। स्त्री से संबंध नहीं रखना पुरुष के लिए उत्तम है, 2किन्तु व्यभिचार की आशंका के कारण हर पुरुष की अपनी पत्नी हो और हर स्त्री का अपना पति। 3पति अपनी पत्नी के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करे और स्त्री अपने पति के प्रति। 4पत्नी का अपने शरीर पर अधिकार नहीं, वह पति का है और उसी प्रकार पति का भी अपने शरीर पर अधिकार नहीं, वह पत्नी का है। 5आप लोग एक दूसरे को उस अधिकार से वंचित नहीं करें और यदि ऐसा करें, तो दोनों की सहमति से और कुछ समय के लिए जिससे प्रार्थना का अवकाश मिले और इसके बाद पहले-जैसे रहें। कहीं ऐसा न हो कि शैतान असंयम के कारण आप को प्रलोभन में डाल दे। 6मैं यह आदेश के रूप में नहीं, बल्कि अनुमति के रूप में कह रहा हूँ। 7मैं तो चाहता हूँ कि सब मनुष्य मुझ-जैसे हो, किन्तु ईश्वर की ओर से हर एक को अपना-अपना वरदान मिला है- एक को यह, दूसरे को वह। 8मैं अविवाहितों और विधवाओं से यह कहता हूँ - यदि वे मुझ-जैसे रहें, तो यह उनके लिए उत्तम है। 9यदि वे आत्म संयम नहीं रख सकते, तो विवाह करें; क्योंकि वासना से जलने की अपेक्षा विवाह करना अच्छा है। 10विवाहितों को मेरा नहीं, बल्कि प्रभु का यह आदेश है कि पत्नी अपने पति से अलग न हो 11और यदि वह अलग हो जाये, तो उसे या तो अविवाहित रहना चाहिए या अपने पति से मेल करना चाहिए। पति भी अपनी पत्नी का परित्याग नहीं करे। 12दूसरे लोगों से प्रभु का नहीं, बल्कि मेरा कहना यह है- यदि किसी भाई की पत्नी हमारे धर्म में विश्वास नहीं करती और अपने पति के साथ रहने को राजी हैं, तो वह भाई उसका परित्याग नहीं करे 13और यदि किसी स्त्री का पति हमारे धर्म में विश्वास नहीं करता और वह अपनी पत्नी के साथ रहने का राजी है, तो वह स्त्री अपने पति का परित्याग नहीं करे; 14क्योंकि विश्वास नहीं करने वाला पति अपनी पत्नी द्वारा पवित्र किया गया है और विश्वास नहीं करने वाली पत्नी अपने मसीही पति द्वारा पवित्र की गयी है। नहीं तो आपकी सन्तति दूषित होती, किन्तु अब वह पवित्र ही है। 15यदि विश्वास नहीं करने वाला साथी अलग हो जाना चाहे, तो वह अलग हो जाये। ऐसी स्थिति में विश्वास करने वाला भाई या बहन बाध्य नहीं है। ईश्वर ने आप को शान्ति का जीवन बिताने के लिए बुलाया है। 16क्या जाने, हो सकता है कि पत्नी अपने पति की मुक्ति का कारण बन जाये और पति अपनी पत्नी की मुक्ति का कारण। 17सामान्य नियम यह है कि हर एक व्यक्ति जिस स्थिति में ईश्वर द्वारा बुलाया गया है, उसी में बना रहे और उसे प्रभु से जो वरदान मिला है, उसी के अनुरूप जीवन बिताये। मैं सभी कलीसियाओं के लिए यही नियम निर्धारित करता हूँ। 18यदि बुलाये जाने के समय किसी का ख़तना हो चुका हो, तो वह इस बात को छिपाने की चेष्टा न करे और यदि बुलाये जाने के समय उसका ख़तना नहीं हुआ तो, वह अपना ख़तना नहीं कराये। 19न तो ख़तने का कोई महत्व है और न उसके अभाव का। महत्व ईश्वर की आज्ञाओं के पालन का है। 20हर एक व्यक्ति जिस स्थिति में बुलाया गया था, वह उसी में रहे। 21आप बुलाये जाने के समय दास थे? तो इसकी चिन्ता न करें, और यदि आप स्वतन्त्र हो सकें, तो दास ही बना रहना अधिक उचित समझें;, 22क्योंकि प्रभु द्वारा बुलाये जाने के समय जो दास था, वह प्रभु द्वारा दास्यमुक्त है और उसी प्रकार प्रभु द्वारा बुलाये जाने के समय जो स्वतंत्र था, वह मसीह का दास है। 23आप लोग कीमत पर खरीदे गये हैं, अब मनुष्यों के दास न बने। 24भाइयो! हर एक व्यक्ति जिस स्थिति में बुलाया गया था, वह उसी में ईश्वर के सामने रहे। 25कुँवारियों के विषय में मुझे प्रभु की ओर से कोई आदेश नहीं मिला है, किन्तु प्रभु की दया से विश्वास के योग्य होने के नाते मैं अपनी सम्मति दे रहा हूँ। 26मैं समझता हूँ कि वर्तमान संकट में यही अच्छा है कि मनुष्य जिस स्थिति में है, उसी स्थिति में रहे। 27आपने किसी स्त्री से विवाह किया है? तो उस से मुक्त होने का प्रयत्न न करें। आपकी पत्नी का देहान्त हुआ है? तो दूसरी की खोज न करें। 28यदि आप विवाह करते हैं, तो इस में कोई पाप नहीं और यदि कुँवारी विवाह करती है, तो वह पाप नहीं करती। किन्तु ऐसे लोग अवश्य ही विवाहित जीवन की झंझटें मोल लेते हैं- इन से मैं आप लोगों को बचाना चाहता हूँ। 29भाइयो! मैं आप लोगों से यह कहता हूँ - समय थोड़ा ही रह गया है। अब से जो विवाहित हैं, वे इस तरह रहे मानो विवाहित नहीं हों; 30जो रोते है, मानो रोते नहीं हो; जो आनन्द मनाते हैं, मानो आनन्द नहीं मनाते हों; जो खरीद लेते हैं, मानो उनके पास कुछ नहीं हो; 31जो इस दुनिया की चीज़ों का उपभोग करते है, मानो उनका उपभोग नहीं करते हों; क्योंकि जो दुनिया हम देखते हैं, वह समाप्त हो जाती है। 32मैं तो चाहता हूँ कि आप लोगों को कोई चिन्ता न हो। जो अविवाहित है, वह प्रभु की बातों की चिन्ता करता है। वह प्रभु को प्रसन्न करना चाहता है। 33जो विवाहित है, वह दुनिया की बातों की चिन्ता करता है। वह अपनी पत्नी को प्रसन्न करना चाहता है। 34उस में परस्पर-विरोधी भावों का संघर्ष है जिसका पति नहीं रह गया और जो कुँवारी है, वे प्रभु की बातों की चिन्ता करती है। तो विवाहित है, वह दुनिया की बातों की चिन्ता करती हैं, और अपने पति को प्रसन्न करना चाहती है। 35मैं आप लोगों की भलाई के लिए यह कह रहा हूँ। मैं आपकी स्वतन्त्रता पर रोक लगाना नहीं चाहता। मैं तो आप लोगों के सामने प्रभु की अनन्य भक्ति का आदर्श रख रहा हूँ। 36यदि कोई समझता है कि उसे अपनी प्रबल प्रवृत्तियों के कारण अपनी मँगेतर युवती के साथ अशोभनीय व्यवहार करने का डर है और उसे इसके सम्बन्ध में कुछ करना आवश्यक मालूम पड़ता है, तो वह जो चाहता है, कर सकता है। वे विवाह करें- इस में कोई पाप नहीं। 37किन्तु जिसका मन सुदृढ़ है, जो किसी भी तरह बाध्य नहीं है और अपनी इच्छा के अनुसार चलने का अधिकारी है, यदि उसने अपने मन में यह संकल्प किया है कि वह अपनी मँगेतर युवती का कुँवारापन सुरक्षित रखेगा, तो वह अच्छा करता है। 38इस प्रकार जो अपनी मँगेतर युवती से विवाह करता है, वह अच्छा करता है और जो विवाह नहीं करता, वह और भी अच्छा करता है। 39जब तक किसी स्त्री का पति जीवित है, वह तब तक उस से बँधी रहती है। यदि पति मर जाता है, तो वह मुक्त हो जाती और जिसके साथ चाहे, विवाह कर सकती हैं- परन्तु केवल किसी मसीही से। 40फिर भी यदि वह वैसी ही रह जाये, तो यह और अच्छा करती है। यह मेरा विचार है और मुझे विश्वास है कि ईश्वर का मनोभाव मुझ में विद्यमान है।