1(1-2) पत्नियो! आप अपने पतियों के अधीन रहें। यदि उन में कुछ व्यक्ति अब तक सुसमाचार स्वीकार नहीं करते, तो वे आपका श्रद्धापूर्व तथा पवित्र जीवन देख कर शब्दों के कारण नहीं, बल्कि अपनी पत्नियों के आचरण के कारण विश्वास की ओर आकर्षित हो जायेंगे। 3आप लोगों का श्रृंगार बाहरी केश-प्रसाधान, स्वर्ण आभूषण तथा सुन्दर वस्त्र नहीं हो। 4वह हृदय के अभ्यन्तर का, विनम्र तथा शान्त स्वभव का अनश्वर अलंकरण हो, जो ईश्वर की दृष्टि में महत्व रखता है। 5प्राचीन काल में ईश्वर पर भरोसा रखने वाली तथा अपने पतियों के अधीन रहने वाली पवित्र स्त्रियां इसी तरह अपना श्रृंगार करती थीं। 6उदाहरण के लिए, सारा इब्राहीम का आज्ञापालन करती और उन्हें ’स्वामी’ कह कर पुकारती थी। जब आप भलाई करती रहेंगी और किसी आशंका से नहीं घबरायेंगी, तो आप उनकी सुपुत्रियां सिद्ध होंगी। 7पतियो! आप भी अपनी पत्नी का ध्यान रखें और उसे ’अबला’ समझ कर तथा अपने साथ अनन्त जीवन के अनुग्रह की उत्तराधिकारी जान कर उसका समुचित आदर करें। यदि आप ऐसा करेंगे, तो आपकी प्रार्थनाओं में कोई बाधा नहीं होगी। 8अन्त में यह आप सब-के-सब एक-मत, सहानुभूतिशील, भ्रातृप्रेमी, दयालु तथा विनम्र बनें। 9आप बुराई के बदले बुराई न करें और गाली के बदले गाली नहीं, बल्कि आशीर्वाद दें। आप यही करने बुलाये गये हैं, जिससे आप विरासत के रूप में आशीर्वाद प्राप्त करें; 10क्योंकि जो जीवन को प्यार करता और सुख-शान्ति देखना चाहता है, वह न तो अपनी जीभ को बुराई बोलने दे और न अपने होंठों को कपटपूर्ण बातें। 11वह बुराई से दूर रहे, भलाई करे और शान्ति के मार्ग पर आगे बढ़ता रहे; 12क्योंकि प्रभु की कृपादृष्ष्टि धर्मियों पर बनी रहती है और उसके कान उनकी प्रार्थना सुनते हैं, किन्तु प्रभु कुकर्मियों से मुंह फेर लेता है। 13यदि आप भलाई करने में लगे रहेंगे, तो कौन आपके साथ बुराई करेगा? 14और यदि आप को धार्मिकता के कारण दुःख सहना पड़ता है, तो आप धन्य हैं। आप उन लोगों से न तो डरें और न घबरायें। 15अपने हृदय में प्रभु मसीह पर श्रद्धा रखें। जो लोग आपकी आशा के आधार के विषय में आप से प्रश्न करते हैं, उन्हें विनम्रता तथा आदर के साथ उत्तर देने के लिए सदा तैयार रहें। 16अपना अन्तःकरण शुद्ध रखें। इस प्रकार जो लोग आप को बदनाम करते हैं और आपके भले मसीही आचरण की निन्दा करते हैं, उन्हें लज्जित होना पड़ेगा। 17यदि ईश्वर की यही इच्छा है, तो बुराई करने की अपेक्षा भलाई करने के कारण दुःख भोगना कहीं अच्छा है। 18मसीह भी एक बार पापों के प्रायश्चित के लिए मर गये, धर्मी अधर्मियों के लिए मर गये, जिससे वह हम लोगों को ईश्वर के पास ले जाये, वह शरीर की दृष्टि से तो मारे गये, किन्तु आत्मा द्वारा जिलाये गये। 19वह इसी रूप में कैदी आत्माओं को मुक्ति का सन्देश सुनाने गये। 20उन लोगों ने बहुत पहले ईश्वर के विरुद्ध विद्रोह किया था, जब वह धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा कर रहा था और नूह का जहाज़ बन रहा था। उस जहाज में थोड़े ही अर्थात् आठ व्यक्ति जल से बच गये है। 21यह बपतिस्मा का प्रतीक है, जो अब आपका उद्धार करता है। बपतिस्मा का अर्थ शरीर का मैल धोना नहीं, बल्कि शुद्ध हृदय से अपने को ईश्वर के प्रति समर्पित करना है। यह बपतिस्मा ईसा मसीह के पुनरुत्थान द्वारा हमारा उद्धार करता है। 22ईसा स्वर्ग गये और स्वर्ग के सभी दूतों को अपने अधीन कर ईश्वर के दाहिने विराजमान हैं।